गाड़ी को पार्किंग से निकलने ही नहीं देंगे कंडक्टर भाईजान

भाषा संस्कृति की आत्मा होती है. यह यूँ ही नहीं कहते. कोई भी भाषा संस्कृति और सभ्यता के सामूहिक अनुभवों की ही अभिव्यक्ति होती है.

लंदन के मौसम को देखते हुए एक शब्द लेते हैं – बर्फ.

सब तरफ बर्फ जमी है. आकाश से गिर रही है बर्फ. सड़क पर, कार के शीशे पर जमी हुई बर्फ.

हम सबको बर्फ कहते हैं. दूसरा कोई शब्द नहीं जानते. अगर संस्कृतनिष्ठ हिंदी के प्रेमी हैं तो एक तत्सम शब्द प्रयोग कर सकते हैं – हिम.

और कोई पर्यायवाची होंगे भी तो प्रचलन में नहीं हैं. और वे पर्यायवाची हिम की अलग अलग अवस्थाओं का वर्णन नहीं करते. क्योंकि बर्फ हमारे कलेक्टिव एक्सपीरियंस का भाग नहीं हैं.

हमारी सभ्यता मैदानों में विकसित हुई है. हिमालय पर हमारे इतने ज्ञानी ऋषि-मुनि रहते थे, पर वे भाषा को शब्द नहीं दे सके… सभ्यता नहीं बसी, तो भाषा में शब्द नहीं जन्मे.

अंग्रेज़ी में अलग अलग किस्मों की बर्फ के लिए अलग अलग शब्द हैं. स्नो, आइस, फ्रॉस्ट… आकाश से गिरती रूई के फाहों जैसी हल्की सफेद बर्फ को स्नो कहते हैं… जमी हुई बर्फ को आइस कहते हैं. आइस सख्त और पारदर्शी होती है.

कल सुबह ड्यूटी खत्म करके हॉस्पिटल से निकला तो बाहर बर्फ गिरनी बन्द थी. कारों के शीशे पर सफेदी नहीं थी. मुझे लगा, वाह! गनीमत है, स्नो नहीं है. कार का शीशा साफ करने का झंझट नहीं है. सुबह सुबह यह बहुत बड़ा सरदर्द होता है. हाथ जम जाता है.

नज़दीक पहुंचा तो देखा, शीशे पर आइस की एक मोटी परत चढ़ी थी. दूर से दिखाई नहीं देती. हटाना कठिन था.

कार से दो बोतलें निकालीं. हॉस्पिटल की पैंट्री से गर्म पानी लेकर आया, किसी तरह बर्फ पिघलाई, बची हुई बर्फ खुरच खुरच कर हटाई.

तीस मिनट लगे. कार से जमी हुई आइस हटाना स्नो हटाने से ज्यादा कठिन है. स्नो की मोटी परत दूर से बहुत ड्रामेटिक दिखाई देती है, पर हटाना ज्यादा कठिन नहीं है.

हमारी आंखों पर कुछ ऐसे ही बर्फ पड़ी है. मीडिया जब एक प्रचार शुरू करता है तो वह आकाश से पड़ती हुई ‘स्नो’ जैसा होता है.

धीरे धीरे हल्के हल्के गिरता हुआ वह हमारी छतों को, मैदानों को, पेड़ की डालों को, कार के शीशे को ढक लेता है. पर उस समय वह हल्का और सफेद होता है. दिखाई देता है, हटाना भी आसान होता है. पर आप उसे रात भर छोड़ देते हैं तो वह जम जाता है. आसानी से नहीं हटता.

अच्छा प्रचार आइस की तरह होता है. वह धीरे धीरे जमता है, दूर से दिखाई भी नहीं देता. पर उसे हटाना सबसे मुश्किल होता है. गर्म पानी डालना होता है, खुरच खुरच के हटाना होता है.

प्रचार की सफलता इस पर निर्भर करती है कि झूठ को जमने के लिए कितना वक्त मिला है.

ईसाई मिशनरियों का, वामपंथियों का प्रचार कुछ ऐसा ही है. उनके झूठों ने हमे ढक रखा है.

उनके झूठ जम कर आइस की परत हो गए हैं. उनका रंग कार के शीशे से मिल कर बिल्कुल पारदर्शी लगता है, पर आप सचमुच उसके पार देख नहीं सकते.

यूँ ही नहीं प्रधान सेवक की नज़र धुंधली हो रही… इन्हें सूफी में शांति का संदेश सुनाई देता है, ईसाई मिशनरी पद्म पुरस्कारों से सुशोभित हो रहे हैं, ज्ञात-ख्यात वामी मूर्धन्य पदों पर बैठे हैं… देश अज़ान की आवाज पर ठिठक जाता है.

अगर आपको सचमुच गाड़ी चलानी है, तो आप इस परत के दिखाई नहीं देने का स्वांग नहीं कर सकते. आपको बर्फ हटानी ही होगी, गर्म पानी डालना होगा, इसे पिघलाना खुरचना होगा.

वरना अगर सिर्फ गाड़ी का स्टीयरिंग पकड़ कर बैठना है, स्टीरियो पर गाने बजा कर सवारियों का मनोरंजन करना है, मन की बात सुनानी है… कहीं जाने वाने का मूड नहीं है, कहीं पहुंचने का प्लान नहीं है… तो बैठे रहिये. और कंडक्टर ज़फर भाई की सुनते रहिये… वह आपकी गाड़ी को पार्किंग से निकलने ही नहीं देंगे…

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