यह आवश्यक तो नहीं कि स्तनपान स्तन दिखाते हुए करवाया जाए

बात चाहे होली, दीपावली पर प्रदूषण की हो या महिलाओं की माहवारी और स्तनपान को लेकर हो, ‘उनका’ एकमात्र उद्देश्य है भारत की संस्कृति और परम्पराओं पर प्रहार.

अभी कुछ दिन पहले शाम को गली के कुत्ते कचरे के साथ कागज़ में लपेटे गंदे पैड्स हमारे दरवाज़े के बाहर छोड़ गए. अब मैंने बच्चों को उस रोज़ बड़ी मुश्किल से गेट के बाहर जाकर खेलने से रोका… बच्चे कारण पूछते रह गए और मैं उनको बता नहीं सकी. सारे बहानों के बाद भी जब वे नहीं माने तो उनकी ज़िद के आगे मुझे कड़ी आवाज़ में फरमान जारी करना पड़ा … नहीं मतलब नहीं.

बच्चे तो बच्चे हैं… कुछ देर उदास रहे फिर आँगन में ही खेलते रहे और बात भूल गए… लेकिन मैं कैसे भूल जाऊं कि हमारी पढ़ी लिखी सोसायटी जो आजकल सेनेटरी पैड्स के उपयोग पर इतना ज़ोर देती है क्या उनको इतनी भी तमीज है कि उपयोग किये हुए पैड्स को यूं कचरे में ना फेंके. यह तो वही बात हुई कि अपने घर का कचरा साफ़ कर घर के बाहर, गली मोहल्ले और समाज में फैला रहे हो.

क्या सफाई का अर्थ मात्र व्यक्तिगत स्वच्छता है?

ऐसा नहीं है कि माहवारी में सेनेटरी पैड्स के उपयोग से कोई हानि न होती हो… आजकल जो प्लास्टिक कोटेड पैड्स बनने लगे हैं, उसके चलते कई त्वचा के रोग होते हैं. यदि आप साफ़ सूती कपड़े प्रयोग में लाते हैं तो ऐसी कई बीमारियों से बच जाते हो. दूसरा जिन गरीब औरतों की दुहाई देते हो क्या उन्हें जीवन भर पैड्स देने का ठेका उठाया है… दो चार पैड्स बांटकर आप उनकी समस्या हल नहीं कर सकते. लेकिन माहवारी में उपयोग में लाये किसी भी वस्त्र को अंत में जलाकर नष्ट कर देने की मामूली सलाह से आप समाज और उन महिलाओं के जीवन स्तर को उठाने में वाकई योगदान दे सकते हैं.

अभी माहवारी के मुद्दे से निपटे नहीं और स्तनपान को लेकर एक नया विषय सोशल मीडिया में उछाल दिया गया है. क्या आवश्यक है कि स्तनपान स्तन दिखाते हुए करवाया जाए? हमारे समाज में आज भी औरतों पर बच्चे को स्तनपान को लेकर कभी बंदीश नहीं लगी.

जहां मध्यम वर्ग की औरतों को आँचल में छुपाकर बच्चे को स्तनपान कराते देखा है, वहीं निम्न वर्ग को, आदिवासी औरतों को और मजदूरी के लिए घर बार छोड़कर आई फुटपाथ पर अस्थायी घर बनाकर रहने वाली औरतों को मैंने पूरे स्तन खुले रखकर भी स्तनपान कराते देखा है.

हाँ आज तक मैंने उच्चवर्ग की किसी महिला को किसी मॉल या बड़े रेस्तरां में बच्चे को स्तनपान कराते नहीं देखा, बच्चे के मुंह में नकली निप्पल और दुधमुंहों के मुंह में भी बोतल ठूंसे हुई देखी है.

यदि आप उन महिलाओं के लिए स्तन दिखाते हुए स्तनपान की आज़ादी चाहते हैं तो मैं बता दूं… कुछ दिन पहले ब्राज़ील की किसी सांसद का फोटो वायरल हुआ था जैसे अपने कार्यक्षेत्र में स्तनपान करवाकर उसने बहुत महान कार्य कर लिया हो. हमारे देश में आप मजदूरी करती हुई औरतों को देखिये अपना काम करते हुए बच्चे को छाती से चिपकाए रखना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं.

तीन साल पहले जब मैं अजित सिंह द्वारा संचालित उदयन स्कूल गयी थी, तो उनके उन मुसहर की बस्ती में भी गयी थी जहाँ के लोग हमारे आसपास ऐसे इकट्ठे हो गए थे जैसे हम किसी अन्य ग्रह के प्राणी हैं. उनमें से एक औरत भी थी जो अपने बच्चे को सूखी छाती से चिपकाए वहां खड़ी थी.

तब यही भाव आया था हमारे देश में औरतों को न जाने किस किस बात की आज़ादी चाहिए. यहाँ माँ के पेट में इतना खाना ही नहीं जा पाता कि उसकी छाती से दूध उतरे वहां आप भरी पूरी छाती दिखाकर देश में स्तनपान करवाने की आज़ादी की मांग करती हैं…

आवश्यक है पहले इन माँओं को इतना भोजन तो उपलब्ध करवा दें हम कि वो अपने बच्चे को स्तनपान करवा सके. जब यह समस्या हल हो जाएगी तब इस पर भी विचार कर लेंगे कि वो किस जगह कैसी अवस्था में स्तनपान करवाने की आजादी चाहती हैं.

हम इन मामलों को लेकर जितनी असहजता प्रदर्शित करेंगे, वे उतने ही नए विषय ले आएँगे हमारी संस्कृति पर प्रहार करने के लिए… कल माहवारी था, आज स्तनपान है… कल कुछ और होगा… सहज रहिये, सरल रहिये… हमारी सहजता ही उनको और व्यथित और क्रोधित करेगी… वे अपनी ही आग में जलकर भस्म हो जाएंगे… हमारी प्रहलाद रूपी संस्कृति आज भी हम माँओं के आँचल में सुरक्षित है…

– माँ जीवन शैफाली

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