गरीबी और नारों से नहीं, सिर्फ विकास से मिलेगी गरीबों को समृद्धि

एक प्रश्न आया है कि जबकि हमारे देश में व्यापारिक मंदी छाई हुई है, बाज़ारों में सन्नाटा पसरा हुआ है तब सरकारी आंकड़ों के हिसाब से आर्थिक विकास में वृद्धि कैसे संभव है?

अगर बाजार में सन्नाटा है तो भारत में 2016 की तुलना में पिछले वर्ष कैसे 16% ट्रैक्टर अधिक बिके? ट्रैक्टर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अनुसार, करीब 6 लाख 60 हज़ार ट्रैक्टर बिके. किसने खरीदा उन ट्रैक्टरों को?

मैन्यूफैक्चरिंग, कृषि, बुनियादी क्षेत्र, स्टील, पावर, पेट्रोलियम रिफाइनरी, कोयला क्षेत्र, सीमेंट और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में रफ्तार तेज़ होने से अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत मिले हैं.

अगर सरकार सड़क, बिजली इत्यादि में पैसा लगा रही है तो वह अर्थव्यवस्था में दर्ज होगा. क्या यह एक तथ्य नहीं है कि मोदी सरकार के आने के बाद बिजली की आपूर्ति में वृद्धि हुई है और कटौती कम हुई है?

एक बार मैंने महिलाओं के वित्तीय योगदान के बारे लिखा था कि अगर हर घर की महिला अपने पड़ोसी के घर में एक समय का खाना बनाना शुरू कर दे और इस कार्य के लिए उसे 5000 रुपये प्रति माह वेतन का भुगतान हो; अगर केवल 10 करोड़ (सौ मिलियन) महिलाएं यह कार्य करें तो रातों-रात भारत की जीडीपी एक ट्रिलियन डॉलर बढ़ जाएगी.

वर्ष 2016 में भारत की जीडीपी अनुमानित तौर पर 2.26 ट्रिलियन डॉलर थी (एक ट्रिलियन में 1000 बिलियन होते है, एक बिलियन में 1000 मिलियन होते है और एक मिलियन 10 लाख होता है).

न्यू यॉर्क में अधिकतर लोग ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर बाहर खरीदते हैं जिससे उनका भोजन वहां की जीडीपी में जुड़ जाता है. यहाँ तक कि वे अपने घर में कॉफी भी नहीं बनाते.

भारत में एक तरह से घरेलू काम जैसे कि खाना बनाना, सफाई करना, बच्चे पालना, बुजुर्गो की देख-भाल करना, इत्यादि की कोई ‘कीमत’ नहीं है.

कहने का अर्थ यह है कि हमारी बहुत सी गतिविधिया भारत की जीडीपी में नहीं जुड़ती क्योकि उनमें मुद्रा का आदान-प्रदान नहीं होता है.

और भी उदहारण है. किसी भी देश की जीडीपी में शिक्षा और जुए (गैम्बलिंग) में किया जाने वाले खर्च शामिल किया जायेगा, क्योकि जीडीपी के लिए दोनों आर्थिक गतिविधियां हैं.

इसी प्रकार, अपराध से होने वाला खर्च, जैसे कि पुलिस, टूटी खिड़की को ठीक कराना, पहरेदार रखना इत्यादि भी जीडीपी में जुड़ जाएगा. युद्ध के लिए सैनिक, हथियार, लड़ाकू विमान इत्यादि भी देश की ‘समृद्धि’ की तरफ जुड़ जायेंगे. प्रदूषण करने वाली और उसे रोकने वाली गतिविधियां जीडीपी में जुड़ जाएंगी.

इसके विपरीत डिजिटल इकॉनमी ने अर्थव्यवस्था के कई पुराने मापदंड समाप्त कर दिए. अब हम केवल नेट का भुगतान करके पूरे विश्व में फ्री में बात कर सकते हैं, वीडियो क्लिप देखकर मनोरंजन कर सकते हैं.

इसी तरह डिजिटल कैमरे या फोन से फोटो खींच सकते हैं, उसे तुरंत देख सकते हैं तथा बिना प्रिंट करवाए एवं बिना डाक पे पैसा खर्च करे उन फोटो को शेयर कर सकते हैं.

पहले रविवार के हिंदुस्तान टाइम्स में 20 से 24 पेज का वैवाहिक विज्ञापन आता था, इंटरनेट ने उसे समाप्त कर दिया. लेकिन क्या विज्ञापन ‘छप’ नहीं रहे हैं?

आप के सेल फ़ोन की कंप्यूटिंग पावर बढ़ गयी है, उसमें अब कैमेरा और कैलकुलेटर भी हैं, लेकिन उस फोन की कीमत वही की वही है. मतलब यह कि उस फोन की कीमत गिर गयी और आप की स्थिति बेहतर हो गयी, लेकिन जीडीपी देखने से नहीं पता चलेगा.

एक तरह से जीडीपी ‘quantity’ या मात्रा (तादाद) को मापता है, ना कि ‘क्वालिटी’ या गुणवत्ता को. फिर भी, किसी भी घर और राष्ट्र में व्यय और प्रगति के लिए बजट बनाना पड़ता है, उसके लिए मुद्रा के आदान-प्रदान का हिसाब रखना पड़ता है.

अभी और कोई विकल्प नहीं है. पश्चिमी देशों में नए प्रकार की जीडीपी के लिए रिसर्च हो रही है. अफ़सोस कि ऐसी रिसर्च भारत में नहीं हो रही है.

भूटान हैप्पीनेस या खुशियों को जोड़ने का प्रयास करता है. परिवार के साथ बैठकर दाल-चावल का भोजन और रिश्तों की गर्माहट का कोई मोल नहीं है, और ना ही वह कभी जीडीपी में शामिल हो पायेगा.

वह चुटकला तो हम सब ने सुना ही जिसमें एक गड़ेरिया पेड़ के नीचे सो रहा और एक धन्ना सेठ उसको काम करने के लिए कह रहा है. गड़ेरिया पूछता है कि वह सेठ धन का क्या करेगा. पूछता जाता है जब सेठ कहता है कि अथाह धन के बाद वह चैन से सोयेगा और गड़ेरिया जवाब देता है कि वह यही तो कर रहा है.

अंत में, आप विकास से गरीबों को समृद्धि दे सकते हैं; गरीबी और नारों से नहीं. गरीबी से केवल भुखमरी मिलती है. वही भुखमरी जो नेहरू के समय थी. जिन अमरीकियों को नेहरू गरियाते थे. उस समय उन्ही अमरीकियों की भीख में मिले अमेरिकी गेहूं से हमारा पेट भरता था.

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