संवादहीन होता संवाद

उसने स्त्रियोचित संकोच के साये में
दबी जुबान से पूछा,
क्या तुम मुझसे प्रेम करते हो ?

पुरुष ने सपाट स्वर में कहा,
स्थाई कुछ भी नहीं!

उसने फिर अत्यंत प्रेममयी होकर पूछा
मेरे साथ रहोगे हमेशा ?

सतर्क पुरुष ने खुद को दार्शनिक में बदलते हुए कहा
यह मात्र जीवन है!

उसने शंकालु हो कर पूछा
क्या तुम किसी और से .. ?

और पुरुष की जुबान से कुछ पाषाण झरे
“दृश्य विहीन कुछ भी नहीं, जहां तक दृश्य है संभावनाएँ है”

और फिर,
दृश्य बना रहा
और संभावना मर गयी

स्त्री ने थोड़ा सा पुरुषत्व
चुपचाप चुरा कर
उस दृश्य में एक नयी स्त्री रच दी,
जिसकी आँखों में जीत किसी तृप्त भूख सी जगमगा रही थी

उस स्त्री के स्त्रीत्व का
अंशमात्र तक स्पर्श न कर पाने के पराजय-बोध से लज्जित
वह बचे हुए पुरुषत्व के साथ
थके कदमो संग लौट पड़ता है
यह बुदबुदाते हुए

जहाँ तक दृश्य है
वहाँ तक संभावना है
जहाँ तक संभावना है वहाँ तक प्रेम है.

और स्त्री उस दृश्य का सबसे पहला चेहरा है!

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