जीवन की सबसे अश्लील और अंतिम कविता

यह मेरे जीवन की
सबसे अश्लील और अंतिम कविता है
जब मैं अपने स्थूल भगोष्ठों पर
तुम्हारी चेतना के सूक्ष्म स्पर्श को
अनुभव करते हुए
ब्रह्माण्डीय प्रेम के
चरम बिन्दु को छू रही हूँ

जहाँ दो देहो के मिले बिना
आत्म मिलन की संतुष्टि की गाथा
लिखी जाएगी
कामसूत्र के
अदृश्य ताम्रपत्रों में
और उकेरी जाएगी
खजुराहों मंदिर के गर्भ गृह में
जहाँ तक कभी उस मंदिर की दीवारों की कला
भी नहीं पहुँच पाई

क्योंकि अब हम कला की देहरी को भी
पार कर चुके हैं
भंग कर चुके हैं
साहित्य की सीमा को भी
अध्यात्म तो हमारी लापरवाही की फूंक भर है..

क्योंकि मेरे कानों के पीछे
तुम्हारी एक प्रेम भरी सांस की कल्पना में ही
मेरी मुक्ति की पूरी गाथा लिखी जा चुकी है…

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