राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भारत की स्वाधीनता में योगदान

जब खिलाफ़त आन्दोलन के दौरान की गई नृशंसताओं के छींटे सूखे नहीं थे, लगभग उसी दौरान महाराष्ट्र के नागपुर में एक सोच परवान चढ़ रही थी.

हिन्दू मूढ़ताओं से चिंतित दो लोग ये सोच रहे थे कि ये क्रम आखिर कब तक चलेगा… कब तक कि हम बार-बार गुलाम होकर आज़ाद होंगे, फिर आज़ाद होकर गुलाम होंगे?

अंग्रेज़ आज हैं, कल अवश्य चले जायेंगे पर इस बात की गारंटी क्या है कि हम फिर से गुलाम नहीं होंगे?

ये चिंतन उस समय चल रहा था जब तिलक की मृत्यु हो चुकी थी और गांधी, बड़े और छोटे नेहरु, लाजपत राज वगैरह भारत की दिशा और दशा तय कर रहे थे.

नागपुर में बैठे उन दो लोगों ने ये स्पष्ट देख लिया था कि वर्तमान नेतृत्व, स्वराज और आज़ादी की चाहत में किस भयावह ज्वालामुखी को अपने अंदर समेटने की कोशिश में है और ऐसी कोशिशों के बाद आज़ादी मिलती भी है तो वो किस काम की रहेगी. इन कोशिशों से क्लीव हो चुका हिन्दू समाज कब तक अपनी आज़ादी बचा पायेगा.

वो ऐसा इसलिये सोच रहे थे क्योंकि तब भारत के स्वाधीनता आन्दोलन का तत्कालीन नेतृत्व मोपला आंदोलन के पहले और बाद भी ‘असंभव एकता’ की मृग-मरीचिका के पीछे भाग रहा था.

तिलक भारत में मुस्लिम तुष्टीकरण के जनक थे (ये स्टेटमेंट जिसे पीड़ा दे रहा है, वो ये बात समझ लें कि सच को साहस के साथ स्वीकार करना समाधान देता है) क्योंकि उन्होंने सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के साथ मिलकर लखनऊ समझौते के जरिये से अलगाववाद पर पहली मुहर लगाई थी और उसके बाद एक निहायत शर्मनाक सा स्टेटमेंट देते हुये कहा था कि “लखनऊ (लक नाओ – LUCKNOW) ने अपने नाम को सार्थक कर दिया और हमारे भाग्य खुल गये”.

खैर, आगे बढ़ते हैं…

1919 में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ. मुस्लिम लीग ने दबाव डालकर तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व को इस बात पर राजी कर लिया कि कांग्रेस और हिन्दू खिलाफ़त आन्दोलन के साथ खड़े हों…

और तब के कांग्रेस अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू ने बाहर आकर बयान दिया कि “यह असंभव है कि जब राष्ट्र के एक अंग के सामने गंभीर शिकायत हो तो राष्ट्र का दूसरा अंग हाथ पर हाथ रखकर अलग बैठा रहे.”

बापू ने तो आगे बढ़कर ये तक कह दिया कि खिलाफत का विचार एक साथ लौकिक, आध्यात्मिक (?) और राजनीतिक है. इसके बाद उन्होंने कहा कि खिलाफत के प्रश्न पर सफलता प्राप्त करने के लिये यदि आवश्यकता पड़े तो मैं स्वराज्य के प्रश्न को स्थगित कर दूंगा.

आगे बढते हैं…

तिलक जैसे मूर्धन्य नेता ने इसके बाद कहा कि “खिलाफत आन्दोलन में मुसलमानों से सहयोग करने का विचार एक ठोस विचार है और इसमें गांधीजी ने नेतृत्व का समर्थन सभी को करना चाहिए.”

और आगे चलिये…

अब 1920 में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ. लाला लाजपत राय ने माइक संभाला और कहा “हिन्दू-मुस्लिम एकता भारत के इतिहास में एक नए दिवस के आगमन का प्रतीक है और इस अवसर को गंवाना निरी मूर्खता और अदूरदर्शिता होगी, अरे ऐसा अवसर तो सदियों में एक बार आता है.”

हिन्दू दुर्भाग्य का अंत यहीं नहीं था…

अब बारी थी आर्य समाजी नेता स्वामी श्रद्धानंद जी और पुरी पीठ के तब के शंकराचार्य की. ये लोग भी खुलकर खिलाफत के समर्थन में खड़े हो गए थे.

ईश्वर जब किसी जाति का विनाश सोच लेता है तो कैसे उस जाति के नियंताओं की बुद्धि विपरीत कर देता है, ये सब उसके नमूने हैं.

नागपुर में विचार कर रहे उन दो विचारकों में एक थे डॉक्टर बी एस मुंजे और दूसरे थे डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार. डॉक्टर हेडगेवार तो खैर कांग्रेस की स्वागत समिति में रह चुके थे इसलिये उन्होंने उस समय के नेतृत्व की मूढ़ता को अपनी आँखों से देखा था.

इसलिये डॉक्टर हेडगेवार ने जिस संगठन की परिकल्पना की, उसको इन सब ड्रामों से दूर रखा और कहा, अगर हिन्दू समाज एकजुट हुआ तो अंग्रेज क्या किसी की भी मजाल नहीं है कि वो भारत भूमि पर आंख भी उठा सके.

“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भारत की स्वाधीनता में क्या योगदान है” जैसा प्रश्न कोई पूछे तो हीन-भाव से ग्रसित होकर उसे सफाई और कुछ उदाहरण मत देने लगियेगा…

बल्कि उसकी आँखों में आँखें डालकर ऊपर वाले उदाहरण बताते हुये कहिये कि उस समय स्वाधीनता की जंग ऐसी मूढ़तापूर्ण जमीन पर लड़ी जा रही थी और उसका नेतृत्व एक असंभव एकता की कोशिश में लगे लोग कर रहे थे जिसका हासिल केवल और केवल हिन्दू समाज और अंतत: राष्ट्र को क्लीव करना था और इसलिये हमारे लोग उससे दूर थे.

इसलिये संघ और हमारे संघी बुज़ुर्ग इससे दूर खड़े होकर गुलाम होने की समस्या का स्थायी उपचार ढूँढने तथा हिन्दू समाज को पुरुषार्थी बनाने में व्यस्त थे और संघ जैसा विशाल वटवृक्ष खड़ा करके उन्होंने उसका उपचार ढूंढ भी लिया.

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