समाज में न्याय स्थापित करने कृपालु राम को भी देना पड़ता है दण्ड

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भगवान श्री राम जब चौदह वर्ष के लिए वन में वास कर रहे थे. उसी समय उनकी अद्भुत लीला का एक अत्यंत ही हृदयस्पर्शी प्रसंग है. चित्रकूट में वास के समय, एक बार प्रभु श्री राम सुन्दर-सुन्दर फूलों को चुनकर, अपने हाथों से विभिन्न प्रकार के गहने बनायें और सुन्दर स्फटिक शिला पर बैठे हुए, प्रभु ने आदर से वे गहने श्री सीता जी को पहनायें.

प्रभु को ऐसे मानवोचित लीला करते हुए देखकर देवराज इंद्र के पुत्र जयन्त को भगवान राम पर संशय हो गया. वो मूढमति जगदीश्वर की परीक्षा लेने पर उतारू हो गया. वह कौए का रूप धारण कर श्री रघुनाथ जी के बल की थाह लेना चाह रहा था. वह कौआ बना हुआ जयन्त सीता जी के कोमल चरणों में अपना नुकिला चोंच मार कर भाग गया.

जब रक्त की धार बहने लगा तब प्रभु राम का ध्यान इस तरफ गया. उन्होंने अपने धनुष पर सींक (सरकंडे) का बाण संधान किया. गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं – “अति कृपालु रघुनायक सदा दीन पर नेह. ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुण गेह..” अर्थात, जो रघुनाथ जी अत्यंत ही कृपालु हैं और जिनका दीनों पर सदा प्रेम रहता है, उनसे भी उस अवगुणों के खान मूर्ख जयन्त ने आकर छल किया.

जब भगवान द्वारा संधान किया गया वह ब्रह्मबाण मंत्र से प्रेरित होकर दौड़ा, कौआ भयभीत होकर भाग चला. वह अपना असली रूप धारण कर पिता इन्द्र के पास गया. पर श्री राम जी का विरोधी जानकर इन्द्र ने उसको अपने पास नहीं रखा. तब वह निराश हो गया और उसके मन में भय उत्पन्न हो गया. वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि समस्त लोकों में थका हुआ और भय-शोक से व्याकुल होकर भागता रहा.

आगे तुलसी बाबा कितनी प्यारी बात कहते हैं – “काहूँ बैठन कहा न ओही, राखि को सकइ राम कर द्रोही. मातु मृत्यु पितु समन समाना, सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना..” अर्थात, अपने पास शरण देना तो दूर की बात है, किसी ने भी जयन्त को बैठने तक के लिए नहीं कहा. तीनों लोकों में, किसकी मजाल है कि श्री राम जी के द्रोही को शरण दे सकता है. जो राम विमुख हैं उनके लिए उनकी माता मृत्यु के समान, पिता यमराज के समान और अमृत विष के समान हो जाता है.

नारद जी ने जब जयन्त को इस प्रकार असहाय और व्याकुल देखा तो उन्हें दया आ गई. उन्होंने उसे समझाकर तुरन्त राम जी के पास भेज दिया. जयन्त प्रभु श्री राम के पास आकर उनके चरण पकड़ लिया और कहने लगा कि हे रघुनाथ जी! मेरी रक्षा कीजिए. आपके अतुलित बल और आपकी अपार प्रभुता को मैं मंदबुद्धि समझ नहीं पाया था.

उसके ऐसी करुण प्रार्थना सुनकर कृपालु श्री राम जी ने उसे सिर्फ एक आँख का काना करके छोड़ दिया. तुलसीदास जी को जयन्त के एक आँख फोड़े जाने पर रत्तीभर भी मलाल नहीं है. वो कहते हैं कि जयन्त ने मोहवश राम जी से द्रोह किया था, उसे तो प्राणदण्ड मिलना चाहिए था, पर प्रभु ने कृपा करके उसे सिर्फ काना बनाकर छोड़ दिया. श्री राम जी के समान कृपालु और कौन होगा?

प्रभु अपने शरण में आये जयन्त को बिना काना बनाये भी छोड़ सकते थे. लेकिन वो समाज में न्याय को स्थापित करना चाहते हैं. वे अपने प्रति किये गए दोष को पूर्णतः क्षमा कर सकते हैं, पर यहाँ जयन्त ने निर्दोष माता जानकी पर अकारण प्रहार किया. एक स्त्री के सम्मान की रक्षा के दृष्टि से भी उसे कुछ न कुछ सजा मिलना ही चाहिए था.

प्रभु का न्याय पर कितना आग्रह है, हम इस प्रसंग के माध्यम से समझ सकते हैं. उन्होंने अपनी करुणामय व्यक्तित्व के भी ऊपर न्याय को प्राथमिकता दी. यही कारण रहा कि उन्होंने जयन्त के आँख फोड़ने जैसा क्रूर कार्य किया. उन्होंने यह लीला समाज में दण्ड की महत्ता स्थापित करने के लिए ही किया है.

जो समाज अपराधियों को दण्ड देने में कोताही बरतता है, वह समाज अप्रत्यक्ष रूप से अनेकों अन्य लोगों को अपराध करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा होता है. इस प्रकार उस राष्ट्र में अपराध और अपराधियों की सहज स्वीकृति प्राप्त हो जाती है तथा धीरे-धीरे वह राष्ट्र अपने विनाश की ओर अग्रसर हो जाता है. अगर ऐसी स्थिति से बचना है तो प्रत्येक राष्ट्रप्रमुख को सर्वप्रथम ऐसे अपराधियों का चयन कर उन्हें कठोर दण्ड देना चाहिए, जिससे ऐसी भ्रष्ट परंपरा को हतोत्साहित किया जा सके.

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