क्यों न करें एक नई शुरुआत

हम दैनिक व्यवहार में ईसाई संवत का प्रयोग करते हैं इसलिये अगर कोई तिथियों के निरूपण में प्रतिपदा, द्वितीया, एकादशी जैसे शब्द प्रयोग करता है तो हमें उलझन हो जाती है.

अपनी संस्कृति, अपनी कालगणना के बारे में थोड़ा-बहुत हम सबको जानना चाहिये और फिर आंग्ल तिथियों के साथ-साथ दैनिक व्यवहार में भी अपनाना चाहिये.

आज तिथियों के बारे में कुछ चर्चा करते हैं. हम जिसे तिथि कहते हैं ज्योतिषशास्त्र की भाषा में वो चंद्रमा की एक कला है.

गणितीय रूप में समझें तो तिथि का निरूपण सूर्य और चंद्रमा की पारस्परिक दूरी के आधार पर होता है जिसे डिग्री या अंश में मापा जाता है.

हमारी धरती सूर्य के चारों ओर घूमती है वहीँ चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर. इस भ्रमण के चलते पृथ्वी पर से देखने वाले को कभी सूर्य और चन्द्र एक ही अंश में दिखते हैं तो कभी बिलकुल 180 डिग्री की दूरी पर.

जब सूर्य और चन्द्र एक डिग्री पर आ जाते हैं उसके बाद अपनी तीव्र गति के चलते चंद्रमा तेज़ी से आगे भागता है और क्रमशः सूर्य और उसके बीच का अंतर बढ़ता चला जाता है.

सूर्य और चंद्रमा के बीच 12 डिग्री का अंतर एक तिथि कहलाता है. एक चन्द्रमास में 30 तिथियाँ होतीं हैं अतः 30 तिथियों में 360 डिग्री का अंतर आता है.

तिथि निरूपण बड़ा रोचक है, जैसे-

1. आंग्ल कैलेंडर में रात्रि बारह बजे के बाद तिथि बदल जाती है पर हमारे यहाँ तिथि का आरम्भ सूर्योदय से तय होता है.

2. तिथि का आरंभ सूर्योदय के पहले या बाद कभी भी हो सकता है पर सूर्योदय के समय जो तिथि रखती है उसे ही उस दिन की तिथि माना जाता है. मान लीजिये किसी दिन सूर्योदय के समय तृतीया तिथि है और सूर्योदय के आधे घंटे बाद तिथि बदल गई तो भी उस पूरे दिन की तिथि तृतीया ही मानी जायेगी.

3. कई बार ऐसा भी होता है कि सूर्य और चन्द्र की गति के प्रभाव से तिथि का मान बढ़ जाता है यानि मान लीजिये सूर्योदय से कुछेक मिनट पहले कोई तिथि आरम्भ हुई और वही तिथि दूसरे दिन के सूर्योदय के वक़्त भी है, यानि उस एक तिथि में दो बार सूर्योदय हुआ.

उदाहरण के लिये आज त्रयोदशी है और ये आज सूर्य से थोड़ा पहले शुरू हुई और यही तिथि कल के सूर्योदय के वक़्त भी रह जाती है तो पंचांग में आज यानि सोमवार और कल यानि मंगलवार दोनों ही दिन की तिथि त्रयोदशी हुई. यानि त्रयोदशी तिथि की वृद्धि हुई. इसी अधिदिन भी कहा जाता है.

4. कई बार इसका विपरीत भी होता है जैसे कोई तिथि आज सूर्योदय के ठीक बाद शुरू हुई और कल सूर्योदय के ठीक पहले ही खत्म हो गई यानि उस तिथि में कोई सूर्योदय हुआ ही नहीं, इसे तिथि क्षय कहा जाता है और पंचांग में इस तिथि का निरूपण नहीं होता. इस लिये अगर चौथी तिथि का क्षय हुआ है तो पंचांग में तृतीया के बाद सीधा पंचमी तिथि निरूपित रहेगा.

5. सूर्य और चंद्रमा दोनों अपनी-अपनी कक्षाओं में स्थित हैं पर चंद्रमा शीघ्रगामी है इसलिये ये जैसे ही सूर्य से 12 डिग्री दूर हो जाता है तो शुक्ल-पक्ष की प्रतिपदा तिथि पूरी हो जाती है और फिर ये दूरी जब तक 24 डिग्री रहती है द्वितीया तिथि मानी जाती है और फिर इसी तरह ये क्रम चलता है यानि दूरी 36, 48 डिग्री हो जाये तो क्रमशः तृतीया, चतुर्थी आदि तिथि पूर्ण होती है.

चलते-चलते जब ये दूरी 15वें दिन में 168 डिग्री पहुँच जाती है तो पूर्णिमा शुरू जाती है जो इस दूरी के 180 डिग्री होने तक रहती है.

रेखागणित वाले जानते हैं कि 180 डिग्री का मतलब है एक सीध में होना यानि अब सूर्य और चंद्रमा एक सीध में यानि एक-दूसरे से विपरीत हैं इस स्थिति में चन्द्रमा अपने पूर्ण रूप में प्रकाशमान होता है.

आपकी कुण्डली में अगर सूर्य और चंद्रमा सम-सप्तक हैं तो इसका अर्थ है कि आपका जन्म पूर्णिमा या उसके आसपास का है.

इसके बाद फिर जब चन्द्रमा 180 डिग्री से आगे बढ़ता है तो अगले बारह अंशों तक कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि मानी जाती है.

उसके बाद क्रमशः ये दूरी कम होते-होते पुनः पन्द्रह दिन बाद शून्य हो जाती है यानि चन्द्र और सूर्य की डिग्री का अंतर शून्य हो जाता है और ये तिथि होती है अमावस की.

आपकी कुण्डली में अगर सूर्य और चंद्रमा साथ में बैठे हैं तो इसका अर्थ है कि आपका जन्म अमावस या उसके आसपास का है

6. यदि सूर्य की गति सामान्य हो और चन्द्र की गति बढ़ जाये तो 12 अंश की दूरी तय करने में चंद्रमा कम समय लेगा पर यदि चन्द्रमा की गति मंद है तो यही दूरी वो अधिक समय में तय करेगा.

पहली वाली स्थिति यानि जब चन्द्र की गति तीव्र हो तो हो सकता कि उस तिथि को सूर्योदय हो ही न और इसी तरह अगर चन्द्र की गति मंद है तो हो सकता है उस तिथि में दो बार सूर्योदय हो जाये.

अपनी कालगणना बड़ी रोचक तो है ही साथ ही हमें गौरव बोध कराने वाली भी है क्योंकि यह हमें बताती है कि हम केवल दो हज़ार साल की परिधि में सिमटे नहीं हैं बल्कि हमारी जड़ें सुदूर तक हैं.

इसलिए क्यों न हम आज से एक नई पहल करें. यहाँ का हर लेखक अपनी लेख के अंत में हस्ताक्षर रूप में इस तरह से अपनी तिथि का निरूपण भी करें. कम से कम कुछ बेहतर तो हम कर ही सकते हैं तो क्यों न इस रूप में भी करें?

युगाब्द-5119, विक्रम संवत्-2074, शक संवत्- 1939, फाल्गुन मास, बसन्त ऋतु, शुक्ल पक्ष एकादशी, दिन- सोमवार तद्नुसार आंग्ल तिथि 26 फरवरी, आंग्ल वर्ष सन् 2018.

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