श्रीदेवी प्रकरण एक ‘रेड पॉइंट’ है

विवेकानंद, महाराणा प्रताप, प्रेमचंद, मेराडोना, सचिन तेंदुलकर, अमिताभ बच्चन, अल्बर्ट आइंस्टीन के बीच क्या संबंध हो सकता है. ये सभी ‘महान’ माने जाते हैं. कोई युद्धकला और वीरता के लिए महान बन गया तो कोई अपने ईश्वरीय खेल के दम पर महान कहलाया, तो किसी ने विदेशी धरती पर भारतीय संस्कृति का गान गाकर महानता प्राप्त की.

इन सब लोगों ने खुद नहीं कहा ‘मैं महान हूं’. इन लोगों ने अपने मेधा और श्रम से ऐसा लक्ष्य प्राप्त कर लिया कि दुनिया इनको महान मानने के लिए विवश हो गई.

महानता के क्या मापदंड होते हैं. ये तो आपका नज़रिया है कि आप किसे महान मानते हैं. मेरे शहर में एक सेवानिवृत बुजुर्ग हैं जो हर शाम स्कूटर पर झोला डालकर निकल पड़ते हैं. झोले में होते हैं टोस्ट और बिस्किट. जहाँ भी कुत्ते नज़र आते हैं, ये बुजुर्ग उन्हें टोस्ट और बिस्किट खिलाते हैं.

मेरे लिए वे एक महान व्यक्ति हैं. मेरे लिए ‘भालू मोंढे’ जैसा पर्यावरणविद महान की श्रेणी में आता है क्योंकि उन्होंने एक मरते हुए तालाब को पुनर्जीवन दे दिया. महानता को लेकर सबके पैमाने भिन्न हो सकते हैं.

आप विराट कोहली को महान कहेंगे तो उस व्यक्ति को सही नहीं लगेगा जो क्रिकेट नहीं देखता, न उसकी बारीकियां जानता है. आप मोहम्मद रफ़ी को महान कहेंगे तो उस व्यक्ति को ठीक नहीं लगेगा, जिसे न संगीत का ज्ञान है न ही शौक. किसी के लिए कोई खोजी महान हो सकता है तो किसी के लिए कोई समाज सेवक.

फेसबुक पर अक्सर ये टकराव देखने को मिल जाता है. यहाँ राजनीतिज्ञ और खिलाड़ियों को ही ‘महान’ की श्रेणी में रखा जा सकता है. जब बात किसी कलाकार की हो तो मामला विवादित कर दिया जाता है और जब कोई बड़ा कलाकार मरे तो उसकी मिट्टी अंतिम संस्कार से पहले ही खराब करने की पूरी व्यवस्था कर दी जाती है. ‘भांड’ कहकर बुलाते हैं न आप लोग.

एक कलाकार को उतना ही परिश्रम करना पड़ता है, जितना एक खिलाड़ी को. अपने पड़ोसी मुल्क को देख लो, इसी मानसिकता ने उसका क्या हाल कर दिया है. तालिबान फुटबाल नहीं खेलने देता था अफगानिस्तानियों को, एक गाना नहीं सुन सकते थे. जब देश से कला और संस्कृति ख़त्म हो जाती है तो तालिबान ही पैदा होता है.

एक ‘वामपंथी कुतर्क’ है. ये विशेष कुतर्क आज विशेष रूप से देखा गया, जब अभिनेत्री श्रीदेवी की मृत्यु हुई. इस तरह का तर्क देने वाले ‘विरोधाभास’ खोजते हैं. और विरोधाभास इस विशाल देश में भरपूर मिल जाते हैं. ‘सीमा पर सैनिक मर रहे हैं और ये भांडगिरी में लगे हैं’, ‘आदिवासी बच्चे की मौत का दुःख नहीं लेकिन एक हीरोइन का दुःख हो रहा है’.

ऐसे कुतर्क आज आपने खूब लिखे/पढ़े होंगे. हालांकि ये बातें वे कथित राष्ट्रवादी कर रहे हैं, जिन्होंने कभी हिंदुत्व या राष्ट्र के लिए जमीन पर कदम नहीं रखा होगा. एक दिवंगत अभिनेत्री का अतीत लिखकर चटखारा लेने से आप ‘ प्रबल राष्ट्रवादी’ नहीं हो जाएंगे. क्या अतीत सिर्फ ‘भांडो’ का होता है, दिवंगत नेताओं का नहीं, खिलाड़ियों का नहीं. क्या ‘भांडों’ को छोड़ बाकी लोग सशरीर स्वर्ग से अवतरित होते हैं.

बॉलीवुड की गंदगी का विरोध तो वह व्यक्ति भी करता है जो अमिताभ या नवाजुद्दीन का प्रशंसक है. बॉलीवुड पर पाकिस्तानी परस्त लोगों का कब्ज़ा है लेकिन अनुपम खेर और रवीना टंडन जैसे कलाकार भी हैं जो राष्ट्रवाद की भावना रखते हैं.

बॉलीवुड से बाहर एस राजामौली जैसे निर्देशक हैं जिनके आप सभी बड़े प्रशंसक हैं. नीरज पांडे जैसे प्रखर राष्ट्रवादी सोच के फिल्म निर्देशक फिल्म उद्योग में हैं. श्रीदेवी का प्रकरण दरअसल एक ‘रेड पॉइंट’ है जो हमें रुककर सोच-विचार करने का मौका देता है. रुकिए और विचार कीजिये कि हमने ‘तालिबानी’ बनने की शुरुआत तो नहीं कर दी है.

 

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY