डारविन-विवाद ने खोल के रख दी तथाकथित बुद्धिजीवियों की पोल

बचपन में आदर्श सेवा इंटर कालेज में मेरे क्लास 9th में मास्टर साहब ने विज्ञान की परिभाषा लिखवाई थी वो कुछ ऐसी थी –

“हमारे आस पास की वस्तुओं व घटनाओं का अनुभवों व प्रेक्षणों द्वारा सुव्यवस्थित व क्रमबद्ध अध्ययन ही विज्ञान है.”

हमारे वो मास्टर साहब थे श्री राजनाथ मिश्रा जी, जीवविज्ञान के बड़े ही तेज़ तर्रार एवं एक आदर्श अध्यापक थे.

इस परिभाषा पर वो अनेक बार बहुत ज़ोर देते थे, बार बार ये परिभाषा रिपीट करते थे, ताकि बच्चों में वैज्ञानिक चिंतन विकसित हो.

उनका कहना था कि अपने आस पास की कोई भी वस्तु या घटना ले लो, उसका परीक्षण करो, प्रयोग करो, उसे अपनी नोटबुक में रीडिंग आदि लेकर अध्ययन करो, तब निष्कर्ष निकालो, तो ये पद्धति वैज्ञानिक कहलाएगी. वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले लोग कहीं सुनी बातों को बिना अनुभव और परीक्षण किए विश्वास नहीं करते.

मैं मास्टर साहब की इस परिभाषा से इतना प्रभावित हुआ कि जीव विज्ञान में नाना प्रकार के प्रयोग करने में 9th क्लास का पूरा साल गुज़ार दिया.

50 से ज़्यादा मेंढक काटे होंगे, उसका अध्ययन करने के लिए और पार्क व गाँव में घूम घूमकर वनस्पतियों की लिस्ट बनायी थी. इस काम में आनंद इतना आया कि डूब ही गए थे.

हालाँकि इस अप्रोच से तब जीव विज्ञान में 90% नम्बरों से पास हुआ था लेकिन अन्य सारे विषयों में थर्ड एवं सेकंड डिविज़न रहा था. और ओवरऑल सेकंड डिविज़न पास हुआ था.

हालाँकि मुझे इसका तनिक भी मलाल नहीं था, संतोष ज़्यादा मिला था ऐसे काम में. सेकंड डिविज़न पास होने के बावजूद मुझे ये अच्छी तरह समझ आ चुका था कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या है, उसकी परिभाषा क्या है.

मैंने उन्ही दिनों अपने मास्टर साहब से पूछा था कि यदि डारविनवाद सही है तो इसे अनुभवों व प्रेक्षणों द्वारा कैसे प्रमाणित किया जा सकता है?

क्या कहीं इसे सिद्ध करने के लिए कोई प्रयोग हुआ है जिसमें एक एक-कोशिकीय अमिबा लम्बे समय में एक बहुकोशिकीय जीव में बदल गया हो?

यदि नहीं तो ये डारविनवाद हमारी विज्ञान के किताब में क्यों है?

उन्होंने ये बताया कि इसीलिए ये डारविन ‘वाद’ है, कोई नियम नहीं. ये एक परिकल्पना मात्र है. विज्ञान जगत में पहले परिकल्पना आती है, फिर उसपर प्रयोग होता है, फिर जो सत्य सिद्ध होता है, उसे नियम के तौर पर लिखा जाता है. जो असत्य होता है, उसे नकार देते हैं.

लेकिन अभी तक डारविन की परिकल्पना को न तो सत्य सिद्ध किया गया और न ही असत्य, इसीलिए वो वाद बनकर अटका हुआ है. वाद उसे ही बोलते हैं जिसपर विवाद होता है. इसीलिए इसे डारविनवाद बोलते हैं, न कि डारविन का नियम.

ऐसा भी हो सकता है कि कई प्रजाति के जीव एक साथ इस धरती पर उपस्थित रहे हों और धीरे धीरे सतत विकास की परिकल्पना सही न हो, लेकिन उसके भी सम्बंध में प्रमाण मौजूद नहीं है. इसीलिए आप यदि ऐसा कहोगे तो वो भी एक वाद होगा. यदि आप उसका प्रमाण दोगे तो ही वो नियम बनेगा.

कुछ दिवस पहले एक केंद्रीय मंत्री द्वारा डारविन वाद पर टिप्पणी किए जाने के कारण पत्रकार व बुद्धिजीवी जगत द्वारा मंत्री महोदय को जाहिल सिद्ध करने की होड़ लग गई. मज़ाक़ उड़ने लगा कि मंत्री की मूर्खता तो देखो डारविन को ग़लत ठहराने चले हैं.

हालाँकि ख़ुद भी बिना प्रयोग के यूँ ही मंत्री महोदय को ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए थी लेकिन कटघरे में मंत्री महोदय से कहीं ज़्यादा उन तथाकथित बुद्धिजीवियों को लाया जाना चाहिए था जिन लोगों ने डारविनवाद को ‘नियम’ के तौर पर सिद्ध कर देने की होड़ मचा रखी थी. डारविन को पैग़म्बर के रूप में पेश करना शुरू कर दिया था कि जो कह रहे हैं, विश्वास करो.

असल में ये वही तबक़ा है, जो शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त कमियों के चलते प्रथम श्रेणी में पास होकर ख़ुद को बड़ा भारी बुद्धिजीवी समझता हैं लेकिन इनके लिए विज्ञान की परिभाषा का मतलब “वो सब जो यूरोप और अमेरिका से आया” केवल उतना ही है, उसके ख़िलाफ़ जो बोलेगा, वो अवैज्ञानिक है, जाहिल है.

लेकिन असल बात ये हैं कि डारविन विवाद ने इन तथाकथित बुद्धिजीवियों की पोल खोल के रख दी है.

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