महाभारत और प्रेम

आपको क्या मिलेगा ये काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि आप ढूँढने क्या निकले हैं. प्रेम, करुणा, वात्सल्य, स्नेह जैसे भाव ढूंढेंगे तो वो भी है, कपट, क्रोध, घृणा, द्वेष भी मिल जाएगा.

मुझसे सलाह मांगने वालों को मेरी सलाह होती है कि आप क्या चाहते हैं ये समझने के लिए सिक्का उछाल लेना भी एक अच्छा विकल्प है. सिक्का गिरने और चित्त या पट आने तक इन्तजार भी नहीं करना, जितनी देर सिक्का हवा में था, उतनी देर जो आप सोच रहे थे, या आने की दुआ कर रहे थे, वो आपको पसंद है.

सिक्के के गिरने और क्या आया देखने की जरूरत नहीं, सिक्के के हवा में रहने के दौरान ही फैसला आपको पता होता है. महाभारत के साथ भी ऐसा ही है. आप क्या ढूँढने बैठे हैं, इसपर निर्भर है कि आपको क्या मिलेगा.

होने को तो ये महाकाव्य है, और महाकाव्य के लक्षणों के अनुरूप इसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों पुरुषार्थ आते हैं. कहते हैं कि जब सिकंदर को इसके बारे में पता चला तो उसका कहना था कि युद्ध के विवरण का इस से बेहतर तो कुछ उसने सुना ही नहीं.

वो सेनापति था, उसे युद्ध दिखा, इसमें प्रेम भी है, आप चाहें तो वो भी मिल जाएगा. जिस शकुंतला की कहानी लेकर अभिज्ञानशाकुंतलम् की रचना हुई वो भी महाभारत में है, ययाति की कहानी भी है, शांतनु से विवाह के लिए मानव शरीर लेने वाली गंगा भी है, स्वर्ग छोड़कर धरती पर किसी ऋषि के आश्रम में आ गई कई अप्सराएँ भी हैं. अक्सर भारत में जिस सती-सावित्री के उदाहरण दिए जाते हैं, उनमें से सावित्री की कहानी भी यहीं महाभारत की कहानी है.

यहाँ फिर से याद दिला दें कि ‘आप क्या ढूँढने निकले हैं?’ उसपर निर्भर है कि सावित्री की कहानी में आपको क्या मिलेगा. ये प्रेम की कथा हो सकती है, ये नीति की कहानी भी है. ये अंतर एक वाक्य में ‘सावित्री मृत्यु के मुख से अपने पति सत्यवान को खींच लाई थी’, कहने के बदले अगर पूरी कहानी देख ली जाए तो ये और भी काफी कुछ दिखा जाती है. धर्मनिरपेक्षता का हित तो आपको धर्म से दूर रखने में है ही, कथित धार्मिक इसे पूरा इसलिए नहीं सुनाते क्योंकि शायद वो “प्रेम-विवाह” कहने-स्वीकारने में हिचकिचाते होंगे.

सावित्री मद्र देश की थीं, जहाँ की होने के कारण माद्री का नाम, माद्री था. उनके पिता का नाम अश्वकीर्ति और माता का नाम मालवी था. विवाह योग्य होने पर सावित्री के पिता उसे अपनी पसंद का वर चुनने भेजते हैं, उसकी मदद के लिए एक जानकार व्यक्ति भी होता है. लौटकर सावित्री सत्यवान के बारे में बताती है, जो कि साल्व वंश के द्युमत्सेन और सैव्या का पुत्र था. वहीँ बैठे नारद विवाह पर कुछ खुश नहीं दिखते तो राजा अश्वकीर्ति उनसे विवाह की खबर पर प्रसन्न ना होने का कारण पूछते हैं.

नारद कहते हैं कि बचपन में इस बालक सत्यवान को चित्राश्व भी बुलाया जाता था क्योंकि वो घोड़ों के चित्र और मूर्तियाँ बनाकर खेला करता था. उसके पिता भी सत्यवादी, सद्चरित हैं किन्तु! यहाँ पर अश्वकीर्ति के सवाल बड़े रोचक हैं. वो ये पूछते ही नहीं कि सत्यवान की आर्थिक स्थिति क्या है? गरीब है या अमीर ये जानने के बदले वो पूछते हैं कि सत्यवान में क्या बुद्धि का अभाव है? क्या वो क्षमाशील नहीं, या शौर्य की कमी है? नारद बताते हैं कि ऐसे कोई भी गुण जो ढूंढें जाएँ वो सब सत्यवान में हैं.

यहाँ लड़की के पिता का नाम अश्वकीर्ति होना और जिस से वो शादी करना चाहती है, उसका घोड़ों के चित्र-मूर्ती बनाना एक मामूली सा इशारा है. आज के मनोवैज्ञानिक भी आपको बता देंगे कि लड़की अपवाद ना हो, तो किसी लड़की को प्रभावित करने का सबसे आसान तरीका उसके पिता की कुछ आदतों की नक़ल कर लेना है. ना चाहते हुए भी, अपने पिता जैसी हरकतें करने वाले नौजवान पर, लड़की का ध्यान फ़ौरन जाएगा. ये नक़ल आप बेईमानी के लिए कर रहे हों तो भारी नुकसान भी आपका ही होगा, तो जबरन नक़ल ना ही करें तो बेहतर.

खैर तो कमी ये थी कि नारद जानते थे कि सत्यवान की आयु बहुत कम है. एक साल बाद ही उसकी मृत्यु होने वाली थी इसलिए नारद इस विवाह की सलाह नहीं दे रहे थे. दूसरी तरफ सावित्री उसी से विवाह करने पर तुली थी, तो कोई चारा ना देखकर विवाह की बात दोनों परिवारों में हुई और सावित्री सत्यवान के पास आ गई. वैसे तो दहेज़ के ज़ में नीचे लगी बिंदी यानि नुक्ता, देवनागरी लिपि में होता ही नहीं इसलिए भी उसका विदेशी होना पता चला है, लेकिन इस कहानी में भी राजा अश्वकीर्ति दामाद को कहीं का जमींदार-मंत्री नहीं बनता, इस से भी पता चलता है कि किन्हीं विदेशी हमलावरों की एक घटिया परम्परा का पिछले हज़ार साल में कहीं हिन्दुओं में प्रवेश हुआ है.

हाँ जिस से प्रेम हो, आप उस जैसे ही हो जाते हैं इसलिए सावित्री गहने-कीमती कपड़े छोड़कर, सत्यवान जैसे छाल से बने वस्त्र पहनने लगती है ये जिक्र जरूर आता है. सावित्री को सत्यवान की मृत्यु की तिथि पहले ही मालूम थी, इसलिए तीन दिन के लम्बे उपवास के बाद जिस दिन सत्यवान की मृत्यु होनी थी, उस दिन वो सत्यवान के साथ ही जंगल में लकड़ी लेने निकल पड़ती है. जैसा की तय था सत्यवान की मृत्यु होती है और जीव को लेने यमराज खुद आते हैं. वो बताते हैं कि अच्छे कर्मों और सात्विक प्रवृति के कारण सावित्री उन्हें देख पा रही है. जब वो सत्यवान को लेकर चले तो सावित्री भी उनके साथ ही चल पड़ी.

कुछ सावित्री के तप का प्रभाव था कि यमराज के लिए गायब हो जाना संभव नहीं था, दूसरे वो सिर्फ साथ चल रही थी तो किसी तरह यमराज उस से पीछा नहीं छुड़ा पा रहे थे. पहले तो शव के दाह-संस्कार के बहाने वो सावित्री को वापस भेजने की कोशिश करते हैं लेकिन सावित्री पति के साथ ही चलने पर तुली रहती है. जब वो बताते हैं कि शरीर के साथ तो ‘पति के साथ’ वाला सम्बन्ध समाप्त हुआ, अब शरीर के पास सावित्री को जाना चाहिए तो उल्टा सावित्री ही उन्हें सिखा देती है. वो सात कदम साथ चलने पर हो जाने वाली मैत्री की बात बताती है, और कहती है यमराज के साथ कई कदम चल लेने पर उसकी उनसे भी मैत्री हो गई है !

सात जन्म का साथ या विवाह के सात फेरे वाली अवधारणा भी यहीं से पुष्ट होती है. भारत में भी ज्यादातर हिन्दुओं से पूछेंगे कि क्या उन्होंने सचमुच विवाह में सात फेरे लिए थे? तो ज्यादातर का जवाब ना में होगा. सात फेरे प्रतीकात्मक हैं जो सप्तपदी को दर्शाते हैं. ये मैत्री की अवधारणा आपको विवाह के मन्त्रों में भी मिल जायेगी. इतने के बाद जो यमराज सोच रहे थे कि पति के प्राण वापस करने के लिए सावित्री रोएगी-गिड़गिड़ाएगी वो अचंभित होने लगते हैं और सावित्री को पहले वरदान का प्रस्ताव देते हैं.

पहले वरदान में सावित्री अपने ससुर द्युमत्सेन की नेत्रज्योति और स्वस्थ होना मांग लेती है. वर के बाद भी साथ चल रही सावित्री को थक जाओगी जैसे बहानों से फुसलाने की कोशिश करते यम जब दूसरा वर देते हैं तो वो द्युमत्सेन का हड़पा गया राज्य उन्हें वापस मिले, ये भी ले लेती है. साथ चलना सावित्री इतने पर भी नहीं छोड़ती, ना ही सिर्फ ससुराल पक्ष के लिए मांगने पर रूकती है. उसके सिवा उसके पिता अश्वकीर्ति की कोई संतान नहीं थी, तो वो मायके पक्ष के लिए, अश्वकीर्ति कोई कई संताने हों, ये भी मांग लेती है.

इतना सब होने पर भी सावित्री ना तो साथ चलना छोड़ रही थी, ना सत्यवान का जीवन लौटाने की भीख मांग रही थी. उल्टा वो कह रही होती है कि जैसे सूर्य कोई भेदभाव किये बिना सबपर अपना प्रकाश बराबर डालते हैं, वैसे ही सुर्यपुत्र होने के कारण वैवस्वत नाम से जाने जाने वाले यमराज भी सबके साथ न्याय करने के कारण धर्मराज कहलाते हैं. अपनी प्रशंसा पर मुदित होते, और सत्यवान का जीवन वापस ना मांगती सावित्री से प्रसन्न यम एक और वर देने को प्रस्तुत होते हैं. साम, दाम, दंड, भेद जैसा ही ये नीति और वाक्पटुता का अच्छा उदाहरण है.

इस बार सावित्री अपने लिए कई संतान मांग लेती है और यम वो भी वर दे डालते हैं. अब भी जब सावित्री साथ ही चलती रहती है तो यम पूछते हैं, पति तो मैं लौटा नहीं रहा, इतने वर भी दे दिए, अब क्यों साथ आ रही हो? अब सावित्री ध्यान दिलाती है कि यम तो धर्मराज हैं, इसलिए उनका कहा असत्य तो होने नहीं दे सकती. पति के बिना संतान नहीं होगी और पति को तो यमराज लिए जा रहे हैं! तो यम के सम्मान को बनाए रखने और शुरू में ही हो गई अपनी ‘मैत्री’ का हित देखती वो साथ आ रही है ! विवश यम को बिना मांगे ही सत्यवान को लौटाना पड़ता है.

नीतिकुशलता और वाक्पटुता के अलावा ये प्रेम के हार ना मानने की भी कहानी है. शाहरुख़ खान अभिनीत ‘डर’ या हाल की खिलज़ी वाली ‘पद्मावत’ फिल्मों से गलत प्रेरणा ले रहे लोग जब तेजाब फेंकने या दूसरे हिंसक तरीकों से प्रेम को पाने का प्रयास करते हैं, तब भी ऐसी कहानियां महत्वपूर्ण हो जाती हैं. प्रकृति रिक्त स्थान के विरुद्ध होती है और चूँकि ऐसी कहानियां बताई ही नहीं जाती इसलिए भी कई पीढ़ियाँ गलत तरीके सीखती रही. जानने वालों से कहीं ज्यादा इसमें ना बताने वालों की गलती है. कूल डूड की ही नहीं, ये कूल डूड के अब्बू की भी गलती है.

महाभारत में ऐसी एक नहीं अनेक कहानियां हैं. कम सुनी जाने वाली कहानियों में से एक कहानी रुरु और प्रमद्वरा की कहानी भी है. पूरी महाभारत भृगुवंशियों की कहानी है इसलिए भृगु के वंश में च्यवन, च्यवन से प्रमाती और अप्सरा घृताची से प्रमाती के पुत्र थे रुरु. उन्हें एक दूसरे ऋषि की कन्या प्रमद्वरा से प्रेम हो गया. ये प्रमद्वरा ऋषि विश्रवा और मेनका की पुत्री थी मगर इसका लालन पालन एक दूसरे ऋषि स्थूलकेश ने किया था. ठीक विवाह से पहले प्रमद्वरा को एक नाग काट लेता है. उसे बचाने के लिए रुरु अपना आधा जीवन दे देते हैं! इस एक कहानी में भी प्रमाती-घृताची और विश्रवा-मेनका जैसी कहानियां शामिल कर के ये तीन कहानियां हो जायेंगी.

ऐसी ही और दर्जनों कहानियों के लिहाज से देखें तो महाभारत प्रेम की भी कथाएँ होती हैं लेकिन उसके लिए सवाल फिर वही है! आप क्या ढूँढने निकले हैं, ये उस पर निर्भर करता है कि आपको क्या मिलेगा.

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