जल-उपवास : शरीर की गुलामी और रोगों से मुक्ति का अद्भुत तरीका

इससे पहले कि मैं जल-उपवास की चर्चा करूं, मैं अपने शरीर की चर्चा करना चाहता हूं. मैंने पूरा जीवन अपने शरीर का बहुत ही आड़े-तेड़े तरीके से प्रयोग किया है. मैं बहुत कम सोता हूँ. सोने का मेरा औसत महज चार से पांच घंटे है. मैंने बहुत बार बिना सोए हुए 72 घंटों या इससे भी कुछ अधिक लगातार काम किया है, वह भी मानसिक काम. लेकिन कभी मस्तिष्क या शरीर ने धोखा नहीं दिया.

कभी दिन में तीन बार नहाया तो कभी भीषण गर्मियों में भी कई-कई दिन नहीं नहाया या भीषण सर्दियों में ठंडे पानी से कई बाल्टी नहा लिया. गर्म के पहले ठंडा, ठंडा के पहले गर्म जब जो जैसा मिला वैसा खा पी लिया.

भीषण सर्दियों में फ्रिज से पानी निकाल कर पी लिया, फ्रिज से ठंडा खाना निकाल बिना गर्म किए खा लिया. कहावत है कि रात में मूली नहीं खानी चाहिए. मैंने अपने जीवन में मूलियां अधिकतर रात में ही खाईं हैं. आप मुझे कोई भी कंद मूल कभी भी खाने को दीजिए, मैं खा लेता हूँ. कभी शरीर ने कोई असहमति नहीं प्रकट की.

बहुत लोगों को मैंने देखा है कि वे आठ-नौ घंटे सो चुकने के बावजूद, जगने के बाद पंद्रह से आधा घंटा या अधिक समय तक ले लेते हैं, पूरी तरह से चैतन्य होने में. मैं भले ही कई दिनों से दो से तीन घंटे की ही नींद ले पा रहा होऊं, लेकिन यदि आप मुझे एक घंटे की नींद के बाद भी जगाएं तो मैं आपको जगने के पल से ही पूरी तरह चैतन्य मिलूंगा. इधर आंख खुली, उसी पल से पूरा शरीर व मस्तिष्क जागृत, कोई झोल नहीं, कोई बहाना नहीं, चाय-काफी किसी चीज की कोई तलब नहीं.

मैंने जब से अपने हिसाब से अपना जीवन जीना शुरू किया तबसे अपने जीवन में सोने व खाने की कभी कोई व्यवस्थित दिनचर्या नहीं बनाई. जब मिला या जब जरूरत हुई तब खा लिया, जब जरूरत हुई सो लिया. यहां सिडनी, आस्ट्रेलिया में भी खाने व सोने की कोई व्यवस्थित दिनचर्या नहीं है. किसी दिन सुबह सात बजे डटकर खा लिया तो किसी दिन शाम को पांच बजे नाश्ता किया.

​मैं कई-कई घंटे पेशाब बहुत आराम से रोक लेता हूं. बहुत तेज पेशाब आई होगी लेकिन यदि कुछ लिख रहा हूँ या किसी काम में व्यस्त हूँ तो कई-कई घंटे पेशाब रोक कर काम करते रह लेता हूँ. वर्षों हो गए ऐसा करते हुए, आजतक कभी पेशाब पैंट में नहीं छूटी.

​मैंने हजारों किलोमीटर की पदयात्राएं की हैं. औसतन 20 से 50 किलोमीटर प्रतिदिन चलते हुए वह भी बहुत बार दिन में केवल एक बार भोजन प्राप्त करते हुए, वह भी ग्रामवासियों व अनजान लोगों से जो भी प्रेम व श्रद्धा से मिल गया. वाहन यात्राएं भी बहुत करता आया हूँ, जहां जो मिला वह खाया, जो पानी मिला वह पिया. सोने को कुछ नहीं मिला तो सड़क किनारे ही सिर के नीचे पत्थर रख कर सो गया.

मैंने बहुत बार 20-20 घंटों से अधिक लगातार गाड़ी चलाई है, वह भी ऊबड़ खाबड़ रास्तों में, भीड़ वाले रास्तों में. मालूम नहीं होता कि कब कु्त्ता या बकरी या गाय या सुअर या कोई बच्चा या साइकिल चलाता कोई आदमी अचानक से रास्ते पर आ जाए, इसलिए हर पल चाक-चौबंद रहते हुए गाड़ी चलाना.

इन सब क्रियाकलापों का भी कोई व्यवस्थित ढांचा नहीं. मालूम पड़ा कि कई महीने गाड़ी की स्टियरिंग भी नहीं छुई और अचानक कई-कई दिन 20-20 घंटे गाड़ी चला रहा हूँ, वह भी केवल दो से तीन घंटे सोकर. जीवन में लगभग 100,000 (एक लाख) किलोमीटर कार व लगभग 300,000 (तीन लाख) किलोमीटर मोटरसाइकिल चला चुका हूँ, कभी कोई सड़क दुर्घटना नहीं हुई, कभी किसी को मेरी ड्राइविंग के कारण खरोच तक नहीं पहुंची.

कई-कई महीनों तक कोई शारीरिक अभ्यास नहीं करता, फिर अचानक एक दिन सुबह उठकर 100 दंड बैठक लगाता हूँ, दो-दो घंटे तक 5-5 किलो के डम्बेल लेकर खूब एक्सरसाइज करता हूँ. ऐसा कुछ दिन किया, फिर बंद कर दिया, फिर कभी मन हुआ तो फिर शुरू कर लिया. बेतरतीब, शरीर भी आदी हो गया है, प्रतिक्रिया नहीं देता.

​2004 में जब 18 दिनों का जल-उपवास किया था तब पीठ पर लगभग 20 किलो का भारी बैग लाद कर ट्रेन के जनरल डिब्बों में लंबी यात्राएं भी कर रहा था. भीड़ भरी सरकारी ग्रामीण बसों में धक्के खाते यात्राएं कर रहा था. शरीर व मस्तिष्क की ओर से कोई शिकवा-शिकायत नहीं.

मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि इतना बेतरतीब जीवनशैली होने के बावजूद, मेरे शरीर व मस्तिष्क की क्षमता दुरुस्त है. मैं शरीर व मस्तिष्क का बिना चिंता किए मनचाहा इस्तेमाल कर लेता हूँ. अब जबकि मेरी आयु 40 वर्ष से अधिक है, तब भी अभी तक ठीकठाक ही चल रहा है. बीमार नहीं पड़ता. दवाएं नहीं खाता. विटामिन की गोलियां नहीं खाता. सप्लीमेंट्स नहीं लेता. जबकि मांस मछली नहीं खाता, शाकाहारी हूँ. मुझमें शराब, कॉफ़ी, चाय इत्यादि की कोई भी लत नहीं, कभी नहीं प्रयोग करता. पिछले दो सालों से तो कॉफ़ी भी नहीं पी, जबकि पहले महीने में एकाध बार कॉफ़ी पी लेता था.

मैंने अपने जीवन में लंबे समय तक बहुत अधिक शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक प्रताड़नाएं झेली हैं. इसके बावजूद मुझे आजतक न तो डायबिटीज है, और न ही उच्च या निम्न किसी प्रकार का ब्लड-प्रेशर ही है.

मेरा मानना है कि मेरा शरीर फिट है. भले ही मैं मैराथन नहीं दौड़ता होऊं, तैराकी नहीं करता होऊं, जिमनास्ट न होऊं. फिटनेस का मतलब केवल खेलकूद करना ही नहीं होता. मेरा मानना है कि फिटनेस का सही मायने यह है कि आप विभिन्न स्थितियों परिस्थितियों में लंबे समय तक व अचानक बिना किसी पूर्व नोटिस के भी सहजता से बिना शरीर व मस्तिष्क का आपा खोए हुए रह सकते हैं.

मैं अपनी शारीरिक व मानसिक फिटनेस का श्रेय जल-उपवास करने की जीवन-शैली को देता हूँ. यदि आप चाहें तो जल-उपवास से होने वाले लाभों के बारे में इस लेख में आगे पढ़ सकते हैं. यहां जल-उपवास का मतलब कम से कम पांच दिन की अवधि का जल-उपवास.

जल-उपवास : परिचय

यदि आप अपने शरीर के प्रति गंभीर हैं और जल-उपवास करना चाहते हैं. आपको कम से कम पांच दिन का जल-उपवास करना चाहिए. जल-उपवास का मतलब पानी के अलावा कुछ भी नहीं ग्रहण करना. पानी के अतिरिक्त फल, सब्जी, अनाज इत्यादि किसी भी रूप व मात्रा में नहीं, जूस भी नहीं. स्पष्ट रूप से यह समझिए कि केवल और केवल पानी.

यदि आपको डायबिटीज है. इतना तय मानिए कि यदि आप जल-उपवास कर लिए तो आपको बहुत आराम मिलेगा. जल-उपवास शरीर में इन्सुलिन का तंत्र बेहतर करता है. लेकिन डायबिटीज होने के कारण पहली बार जल-उपवास कैसे करेंगे यह जानकारी प्राकृतिक शैली वाले किसी जेनुइन विशेषज्ञ चिकित्सक से ले लीजिए. यदि आपकी इच्छा हो तो मैं आपका संपर्क बेहतरीन प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञों से करवा सकता हूँ. आप उनसे परामर्श ले सकते हैं.

हममें से बहुत लोग एक दिन भी बिना भोजन किए या कुछ न कुछ खाए नहीं रह सकते हैं. उनके दिलोदिमाग में ऐसा बैठ गया है कि यदि नहीं खाया गया तो बहुत नुकसान होगा, कुछ लोग तो यहां तक सोचते हैं कि नहीं खाने से मर जाएंगे. बहुत भ्रांतियां हैं. जिन लोगों ने एक या दो दिनों का जल-उपवास रखा भी है तो भी उनको पांच दिवसीय या अधिक दिनों के जल-उपवास के लाभों व अनुभवों के बारे में अंदाजा नहीं होगा, इन लोगों को भी कई भ्रांतियां रहतीं हैं.

जब आप शरीर को केवल पानी पर रखते हैं. तो पहले के दो से तीन दिनों तक आपका शरीर भोजन वाले मोड में ही रहता है. आपके शरीर में उपस्थित विषाक्त पदार्थों व तत्वों की मात्रा व प्रकार के आधार पर आपका शरीर भोजन के लिए भयंकर मांग रखता है या एक तरह से कह लीजिए कि छटपटाता है.

शरीर को लगता है कि मांग करने पर आप उसकी मांग पूरी करेंगे ही, इसलिए वह पूरी ताकत के साथ भोजन के लिए अपनी मांग रखता है. मेरा मानना है कि अधिकतर यह मनोवैज्ञानिक कारणों व कंडीशनिंग के कारण होता है, शरीर की अपनी विशुद्ध मांग उतनी नहीं होती है जितनी प्रतीत होती है या जितना शरीर हल्ला-गुल्ला मचाता है.

मेरी स्थिति तो यह है कि मैं शरीर को बता देता हूँ कि अब भोजन नहीं मिलेगा, तुम्हारे पास जो है उसी से काम चलाओ. शरीर बहुत हीला-हवाला नहीं करता है, आदेश मान लेता है. यह आपके अपने शरीर के ऊपर निर्भर करता है कि आपका शरीर दो दिनों बाद या तीन दिनों बाद भोजन के लिए बाहरी मांग करने की बजाय, शरीर में ही उपस्थित तत्वों से काम चलाना शुरू कर देता है.


​नए ऊतकों का निर्माण, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ना, पाचन तंत्र की मरम्मत व नवीनीकरण

आपका शरीर जब बाहरी मांग करने की बजाय शरीर के भीतर उपस्थित तत्वों के प्रयोग करने के मोड में आता है तो वह कुछ मूलभूत प्रक्रियाओं को करता है. ऊर्जा बचाने के लिए शरीर में उपस्थित फालतू व विषाक्त द्रव्यों, तत्वों को बाहर करना शुरू करता है. आपके शरीर में जो फालतू चर्बी जमा होती है, उसको पिघला कर प्रयोग करना शुरू करता है. इससे आपके शरीर का अतिरिक्त वजन मतलब आपका मोटापा भी घटता है.

शरीर अपने भीतर के तत्वों से काम चलाने के मोड में जब आ जाता है और चूंकि आप केवल जल ही ग्रहण कर रहे होते हैं इसलिए शरीर को भोजन को पचाने के लिए प्रयोग होने वाली आग नहीं दहकानी पड़ती है. शरीर के तत्वों व ऊतकों इत्यादि का जलाव नहीं होता है. मतलब यह कि शरीर की बहुत बड़ी ऊर्जा व मशीनरी का प्रयोग केवल भोजन को गलाना, जलाना व फिर विभिन्न भंडारगृहों में पहुंचाना इत्यादि कार्यों में नहीं हो रहा होता है. शरीर अपनी ऊर्जा का प्रयोग नए ऊतकों व कोशिकाओं के निर्माण में लगाता है. परिणामस्वरूप पाचन प्रक्रिया व अंगों के पूरे तंत्र का नवीनीकरण होता है.


​विभिन्न बीमारियों का इलाज व उनके द्वारा हुई क्षति की मरम्मत तथा आयु का बढ़ना

ऊर्जा का प्रयोग शरीर के ढांचो की मरम्मत होने के कारण शरीर के विभिन्न आंतरिक अंगों में सूजन में कमी आती है. ऊतकों व कोशिकाओं के नवीनीकरण के कारण शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है. तनाव घटता है तो रक्तचाप अपनेआप संतुलित होने लगता है. शरीर बेहतर जीवंतता व सुगमता की ओर बढ़ता है. चूंकि शरीर में पानी के अलावा कुछ और जाता ही नहीं है इसलिए इन्सुलिन तंत्र की संवेदनशीलता भी बढ़ती है. डायबिटीज में लाभ पहुंचता है.

शरीर के पाचन तंत्र वाले अंग व तंत्र फुर्सत में रहते हैं तो नए ऊतकों इत्यादि का निर्माण करते हैं, मरम्मत करते हैं. इन सब प्रक्रियाओं में गास्ट्रिटिस, आंतों में तनाव, कब्ज, दस्त, अपच, इत्यादि का तो शर्तिया इलाज शरीर खुद ही बिना किसी टालमटोल के कर लेता है.

​शरीर की आयु बढ़ती है, मस्तिष्क की क्षमता व उम्र बढ़ती है. ह्रदय संबंधित बीमारियों के होने की संभावना कम होती है तथा बीमारियों का प्रतिरोध होता है.


​कैंसर, अल्सर, ट्यूमर जैसी बीमारियों में अद्वितीय लाभ

ऊर्जा को व्यर्थ में नष्ट होने से बचाने के लिए तथा अपने भीतर ही उपस्थित तत्वों को इस्तेमाल करने के आटोमेशन के कारण नए बेहतरीन ऊतकों का निर्माण करता है. चूंकि शरीर विषाक्त व रद्दी कोशिकाओं व तत्वों को बाहर निकालने व नए बेहतरीन ऊतकों के निर्माण की प्रक्रिया में लग जाता है. इसलिए जिनको कैंसर है उनकी कैंसर कोशिकाओं के विस्तार व प्रसार को रोकता है. केंसर कोशिकाओं के प्रसार में रोक लगने व नई बेहतर कोशिकाओं के निर्माण के कारण कैंसर जैसी बीमारियों में भी लाभ पहुंचता है. जिनको कैंसर नहीं है, उनको कैंसर होने की संभावना क्षीण होती है.

चलते-चलते

शरीर के साथ छेड़खानी न कीजिए. शरीर का तंत्र हमारी आपकी कल्पना से बहुत ही अधिक परे आटोमैटिक, व्यवस्थित व अद्वितीय है. शरीर के साथ सद्भाव में रहने से शरीर बहुत ही आज्ञाकारी, विश्वसनीय व बेहतरीन साथी के रूप में आपके लिए जीता है.

– साभार Umrao Vivek Samajik Yayavar
http://www.hindi.groundreportindia.org

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