श्री, अब तुम चालबाज़ हो जाओगी…

एक औरत के प्रति श्रद्धा कैसे बदली जाती है इसका साक्षात उदाहरण है श्री देवी. कल तक जो एक सामान्य हृदयघात से मरी थी तो वो एक आदर्श अभिनेत्री थी चाहे उसके कइयों के साथ प्रेम सम्बन्ध रहे थे, चाहे उसने एक शादीशुदा की गृहस्थी उजाड़ कर उससे ब्याह किया था.

लेकिन जैसे ही उसके मृत देह का पोस्ट मार्टम होता है और रक्त में चूंकि शराब पाई जाती है. समाज की आदर्श चेतना अचानक जाग जाएगी… जीने के सारे कारणों को एक तरफ़ा धकेल मृत्यु के कारण पर सोग मनाएगी.

अब तुम सीता और गीता के तर्ज़ पर बनी चालबाज़ फिल्म की दैवीय स्वरूप वाली सीता नहीं रह जाओगी बल्कि अल्हड़, बदनाम चालबाज़ गीता हो जाओगी.

पल पल बदलते समाज के विचारों के साथ तुम्हारे चरित्र की परिभाषा भी बदल जाएगी. कुछ ही देर में यह खबर आग की तरह दुनिया के जंगल में फ़ैल जाएगी…. कि श्री अपने प्रेम से भरे पवित्र हृदय पर आघात के कारण नहीं, शराब पीकर बाथ टब में डूबने से मरी है.

लेकिन मेरे लिए श्री हमेशा खुदा गवाह के डबल रोल को जीने वाली श्री ही रहेगी जिसने अपने प्रेम की प्रतीक्षा में पागल और इस दुनिया से अनजान एक परिपक्व औरत की भूमिका को भी उतनी ही शिद्दत से निभाया जितना एक बेटी के अल्हड़, नाज़ुक और बचपने से भरी भूमिका को…

श्री, अपना दैवीय रूप हम औरतों को खुद ही बचाए रखना होता है क्योंकि यह समाज जीने के तरीकों के साथ चरित्र की परिभाषा बदल देता है तो मरने के कारणों के साथ तुम्हारे प्रति श्रद्धांजलि भी बदल जाएगी. नहीं बदलेगा तो समाज जिसे औरत के जीने के तरीके से भी आपत्ति रहेगी और मरने के तरीके पर तो कहना ही क्या… खुद ही देख लो.

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