अमर बलिदानी भगत सिंह को ‘शहीद’ कहने से पहले जान तो लें इस शब्द के अर्थ

पांचजन्य जब स्तरीय हुआ करता था तब उसमें एक स्तंभ छपता था ‘ऐसी भाषा कैसी भाषा’. उस स्तंभ में वो हिन्दी समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में प्रयुक्त असंगत भाषा की ओर ध्यान खींचते थे.

अब पता नहीं क्यों वो स्तंभ आना बंद क्यों हो गया. शायद इसलिए क्योंकि विचार-परिवार के लोग ही ‘भारत’ की जगह ‘इंडिया’ शब्द को आगे बढ़ा रहें हैं.

खैर…

समाचारपत्र और पत्रिकायें, न्यूज़ चैनल अगर ऐसी गलती करें तो क्षम्य है पर हम जैसे लोगों को इस तरह के असंगत शब्द प्रयोग से बचना चाहिये क्योंकि जाने-अनजाने ऐसा करके हम बड़ा अपराध कर देते हैं.

हमारे इस अपराध के सबसे बड़े शिकार हुये हैं बलिदानी भगत सिंह जिनके नाम से पहले न जाने कितनी बार हमने ‘शहीद’ शब्द का प्रयोग किया है.

भगत सिंह के नाम के आगे शहीद लिखना ठीक क्यों नहीं है; आइये समझाता हूँ.

‘शहीद’ अरबी भाषा का शब्द है जो कुरान और हदीसों में कई अर्थों में आया है पर संयुक्त रूप से एक ही अर्थ को इंगित करता है.

शहीद का एक अर्थ है ‘गवाही देने वाला’. अज़ान के बोल और कलमा में भी ये शब्द आता है… अशहदूअल्लाइलाहाइल्लल्लाह… इसका अर्थ है कि मैं ये शहादत देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई भी माबूद नहीं है.

शहीद का दूसरा अर्थ है ‘अल्लाह की राह में अपनी जान देने वाला’. इसलिये इस्लाम की पहली जंग जिसे जंगे-बद्र के नाम से जाना जाता है उसमें मुस्लिम खेमे से जो लोग मारे गये थे उन्हें मुसलमान ‘शुहदा-ए-बद्र” कहते हैं.

‘शुहदा’ शहीद का बहुवचन है. इनको ‘शहीद’ कहने का मतलब ये है कि उन लोगों ने अपनी जान देकर इस बात की गवाही दी कि जिस चीज़ पर ईमान लाने का उसे दावा था, वास्तव में वो दिल से भी उसे हक़ (सत्य) जानता था.

इसलिये ‘शहीद’ शब्द विशुद्ध उनके लिये प्रयुक्त किया जाता है जिसकी ऐसी उपलब्धि रही हो और कुरान में उनके लिए जन्नत का वादा किया गया है.

कुरान शहीदों के लिये स्पष्ट कहता है :

“जो लोग खुदा की राह में शहीद किये गए उन्हें हरगिज मुर्दा न समझना बल्कि वो लोग जीते-जागते मौजूद हैं और परवरदिगार की तरफ से उन्हें रोज़ी दी जा रही है, खुदा ने जो करम और फज़ल उनपर किया है उसकी ख़ुशी से फूले नहीं समाते और जो लोग उनसे पीछे रह गये और उनमें आकर शामिल नहीं हुए उनकी निस्बत ख़याल करके ये खुशियाँ मनातें हैं कि (ये भी शहीद हों तो) उनपर किसी किस्म का खौफ न होगा”.

क्या भगत इस बात की गवाही देते थे कि ‘अल्लाह के अलावा कोई माबूद नहीं है और मुहम्मद उसके रसूल हैं’ या फिर भगत अल्लाह की राह में जिहादो-क़िताल करते हुए मारे गए थे?

अगर ऐसा नहीं है तो फिर अगली बार जब भगत या अपने किसी बलिदानी जवान को याद करने जायें तो इस बात का ध्यान जरूर रखियेगा कि हम अपने शब्दों से भगत को या अपने जवानों को सम्मान दे रहे हैं या फिर असंगत शब्दों का प्रयोग कर उनके बलिदान का अपमान कर रहे हैं.

सहमत हैं तो इस बात को बाकियों से भी सांझा करिये ताकि हमारे भगत के प्रति ऐसा अपराध और न हो. बलिदानी भगत सिंह को सबसे बड़ा सम्मान यही होगा.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY