दि अग्ली डक्लिंग : वो बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा नहीं, हमेशा से हंस था

एक दूर के गाँव में एक किसान रहता था. बहुत ज्यादा ज़मीन तो उसके पास नहीं थी, मगर उसके पास एक छोटा सा तालाब था वहां कुछ मछलियाँ होती थी किसान कुछ बत्तख भी उसी में पालता था.

एक बत्तख ने कुछ अंडे दे रखे थे. रोज़ वो अण्डों को सेती, इनमे छः अंडे तो ठीक थे मगर सातवां अंडा थोड़ा बड़ा था. माँ बत्तख को याद भी नहीं आता था की ये सातवां अंडा उसने दिया कब था.

शायद मुझसे ही अंडे गिनने में गलती हुई होगी! माँ बतख सोचा करती. थोड़े दिन में छः अण्डों से टक टक की आवाज़ आने लगी अण्डों के फूटने का समय हो चला था. मगर सातवें अंडे में कोई हलचल नहीं हुई! माँ बतख परेशान हुई और उस आखरी अंडे को सेती रही.

थोड़ी ही देर में बाकि के छः अंडे फूटे और उसमें से पीले पीले बतख के चूज़े निकल आये. बत्तख के बच्चों ने अंडे से निकलते ही शोर मचाना शुरू किया क्वेक – क्वेक और खाना ढूँढने में जुट गए. लेकिन सातवां अंडा अभी तक नहीं फूटा था.

आखिर अगली शाम होते होते आखरी अंडे में भी हलचल हुई. टक टक की आवाज़ आई और थोड़ी ही देर में आखरी चूज़ा भी अंडे से बाहर आ गया ! लेकिन ये क्या? बाकि प्यारे प्यारे पीले चूज़ों जैसा तो येबिलकुल नहीं था, ये तो भूरा सा कुछ ज्यादा ही बड़ा और बेडौल सा था!

ये गन्दा सा बदसूरत चूज़ा मेरा कैसे हो सकता है? माँ बतख ने सोचा. खैर बाकी सारे बत्तख के बच्चे तो ज्यादा खाते ही थे, ये सातवां वाला उनसे भी ज्यादा खाता था. थोड़े ही दिनमें वो आकार में सब चूज़ों से बड़ा हो गया.

बेचारा ये बदसूरत बत्तख का बच्चा लेकिन बड़ा दुखी रहता था. बाकी चूज़े न तो उस से बात करना चाहते न ही उसके साथ खेलना चाहते थे. उनके जैसा प्यारा सा तो ये था नहीं! माँ बत्तख उसे समझाने की कोशिश करती, कहती, ओह प्यारे बच्चे तुम बाकियों से इतने अलग क्यों हो?

ये सुनकर बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा और दुखी हो जाता. उसकी बेढब चाल को देख कर किसान के खेत पर रहने वाले और जानवर तो उस पर हँसते ही थे, किसान के बच्चे भी अक्सर उसका मजाक उड़ाने पहुँच जाते. अक्सर रात में अकेले बैठा बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा रोया करता.

एक दिन बहुत दुखी होकर बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा किसान के खेत से भाग गया. पास में ही जंगल शुरू होता था. वहां से हर सुबह कई चिड़ियों की आवाज़ आती थी, बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा सोचता था कि वहां जरूर मेरे जैसे भूरे पंखों वाला कोई न कोई रहता होगा. वो पक्का मेरा मजाक नहीं उड़ाएंगे. यही सोचता बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा जंगल में जा घुसा.

वहां सच में कई पक्षी थे. रंग बिरंगे, कुछ झाड़ियों में कुछ पेड़ों पर बैठे. बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा दौड़कर उनके पास जा पहुंचा. उसने सर उठा कर पुकारा, सुनिए, क्या आप लोगों ने मेरे जैसा भूरे पंखों वाला कोई बत्तख देखा है? चिड़ियों ने उसे हिक़ारत की नजर से देखा, कुछ हंस भी पड़े, सबने ना कह दिया. एक बूढ़े बगुले ने उसे आगे जाने का इशारा कर दिया.

बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा समझा कि शायद आगे कहीं मेरे जैसे बत्तख के बच्चे रहते होंगे और बूढ़ा बगुला वहीँ जाने कह रहा है. वैसे भी बूढ़े ज्यादा बोलते नहीं, इसलिए इशारा किया होगा. यही सोचता हुआ बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा आगे चल पड़ा, और घने जंगल के अन्दर. वहां पेड़ ज्यादा घने थे और सूरज की रौशनी मुश्किल से ही ज़मीन तक आती थी. चलते-चलते दोपहर हुई, फिर शाम भी होने लगी. इसी तरह चलते चलते जब कुछ दिन बीत गए तो, कहीं मैं घने जंगल में रास्ता तो नहीं भूल गया? बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा सोचने लगा. तभी आगे एक बड़ा सा तालाब नज़र आने लगा, बेचारे बदसूरत बत्तख के बच्चे ने सोचा रात रुक जाने के लिए यही जगह ठीक रहेगी.

जैसे तैसे उसने रात वहीँ गुजारी, सुबह हुई तो बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा आगे चलने की सोचने लगा. तभी वहां कुछ जंगली बत्तखों का एक झुण्ड उसे नज़र आया. तालाब के दूसरे कोने पर उनके घोंसले थे तो रात में वो देख नहीं पाया था दूसरी बत्तखों को. बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा दौड़ा भागा उनके पास पहुंचा. एक नए बत्तख को देख कर पहले तो जंगलीबत्तखों ने उसे घेर लिया, फिर पीछे से कोई बत्तख का बच्चा चिल्लाया, जरा इसकी बेढब चाल तो देखो !! फिर जोर का ठहाका लगा. बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा झेंप गया, लेकिन उसने सोचा इनसे पूछ कर देखते हैं, शायद इन्हें मेरे जैसी बत्तखों का पता मालूम हो.

मगर जंगली बत्तखों ने कहा कि उस जैसी बदसूरत और बेढब चाल वाली बत्तख तो उन्होंने कभी देखी ही नहीं ! हां जंगल के कोने पर एक छोटा तालाब है शायद वहां कोई बदसूरत बत्तख मिल जाये. बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा सोचने लगा कि उसे आगे जाना चाहिए या वापिस किसान के घर ही लौट जाना चाहिए. इतने में दूसरे बत्तख के बच्चों ने उसे चोंच मारनी शुरू कर दी ! झुण्ड के सरदार ने कहा, तुम्हारी बदसूरती से हमारे झुण्ड की शोभा बिगड़ रही है लड़के, दूसरे तालाब का पता तुम्हें बता दिया है, फ़ौरन उस तरफ भाग जाओ !

बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा क्या करता वो कुछ दिन का सफ़र और तय कर के जंगल के किनारे तक पहुंचा. वहां सचमुच एक दूसरा तालाब था. बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा सोचने लगा, वो बड़े तालाब वाले सरदार बत्तख इतने बुरे भी नहीं थे, उन्होंने अपने साथ नहीं रखा क्योंकि बच्चे मेरा मजाक उड़ा रहे थे, रास्ता तो उन्होंने बिलकुल सही बताया था. तालाब के किनारे पहुँच कर वो इधर उधर देखने लगा. झाड़ियों के पास उसे कुछ और जंगली बत्तख दिख गए. बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा फ़ौरन उनके पास पहुंचा और पूछा कि क्या वो उस जैसी किसी बत्तख का पता जानते हैं. मगर इस बार भी बत्तखों ने उसे देख कर मुंह बनाया और कहा कि फ़ौरन यहाँ से भाग जाये. इस तालाब के पास बन्दूक वाले शिकारी भी आते हैं और बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा जरूर शिकारियों की गोली का निशाना बन जाएगा. बातें हो ही रही थी की एक तेज़ आवाज़ आई, सारे जंगली बत्तख क्वेक – क्वेक करते पंख फड़-फड़ाते एकतरफ़ भागे, बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा कुछ समझ नहीं पाया. इतने में दूसरी तेज़ आवाज़ आई और एक दो जंगली बत्तख ढेर हो गए.

बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा समझ गया कि ये शिकारियों की बन्दूक की आवाज़ है. वो जान बचा कर दूसरी तरफ़ भागा. भागता हुआ वो एक छोटे से झोपड़े के पास पहुंचा, इतनी देर में उसे भूख भी लग आई थी. तभी उसे झोंपड़े के आगे एक टोकरे के नीचे कुछ रोटी के टुकड़े दिखाई दिए. उन्हें खाने बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा टोकरे के नीचे जा घुसा. ठप्प की आवाज़ आई और टोकरा बंद हो गया.

दरअसल वो झोंपड़ा एक बुढ़िया का था जिसे कम नज़र आता था. वो अपनी कुछ मुर्गियों और अपने कुत्ते के साथ शहर के बाहर ही रहती थी. जंगली चिड़िया पकड़ने के लिए उसने वो फंदा लगा रखा था. बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा देखकर उसने सोचा इसे कुछ दिन अपने पास रखती हूँ शायद ये कुछ अंडे दे तो उन्हें बाज़ार में बेच कर कुछ पैसे घर आयेंगे.

लेकिन पिंजड़े में कई दिन बंद रहने के बाद भी बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा कोई अंडे तो दे नहीं रहा था. बुढ़िया ने एक दिन कहा, एक दो दिन और देखती हूँ. अगर फिर भी इसने अंडे नहीं दिए तो इसे पका कर तो खाया ही जा सकता है. ये सुनते ही बुढ़िया के कुत्ते और मुर्गियों की बांछे खिल गई. मुर्गियां चिल्लाई, हां हां !! तू कुछ दिन और अंडे मत दे, फिर बुढ़िया तेरी गर्दन तोड़ कर, तेरे गंदे पंख नोचेगी और तुझे कढ़ाई में पकाएगी. तेरे पिजड़ा खाली करते ही ये जगह वापिस हमें मिल जाएगी. कुत्ता भी अपने पंजे चाटता हुआ बोला, अगर बुढ़िया इसे पकाएगी तो मुझे भी कुछ हड्डियाँ चबाने को मिल जाएँगी ! बड़े दिन हुए हड्डियाँ चटकाए, मजा आ जायेगा !

अब तो बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा सोच में पड़ गया, हे भगवान् ! मैं ये कहाँ आ फंसा ! इस से तो किसान का घर ही ठीक था. कम से कम कोई मेरे पंख नोच कर पकाने की तैयारी तो नहीं कर रहा होता था. अब तक किसान के घर से निकले कुछ महीने बीत चुके थे और गर्मियां बीत रही थी. एक रात जब बुढ़िया पिंजड़े का दरवाज़ा ठीक से बंद किये बिना सोयी तो बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा वहां से निकल भागा. जान बचा कर वो बिना रुके भागता रहा. अब जाड़ों का मौसम नजदीक आ गया था और खाना भी आसानी से नहीं मिलता था. एक दिन ऊपर आसमान में उसने देखा की लम्बी गर्दन, पीली चोंच और बड़े बड़े पंख वाले कई पक्षी दक्षिण की तरफ उड़े जा रहे हैं. जाड़ों में वो गर्म इलाकों की तरफ़ जा रहे थे. बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा सोचने लगा, काश की मैं एक दिन के लिए ऐसा ख़ूबसूरत दिखता !

फिर जाड़ों का मौसम आ गया, तालाबों का पानी जमने लगा, बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा आगे चलता रहा. एक दिन बर्फ़ गिरी और भूखा बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा ठण्ड से बेहोश हो गया. वहीँ से एक किसान गुजर रहा था उसकी नज़र बेहोश पक्षी पर पड़ी. उसने उठा कर अपने झोले में डाला और सोचा ये बच्चों के लिए अच्छा खिलौना होगा. किसान की गर्म झोपड़ी में बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा होश में आया, किसान के बच्चों ने कुछ दाना पानी दिया तो उसकी जान में जान आई. इस तरह बर्फ़-बारी में भी बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा जिन्दा बच गया.

लेकिन किसान ग़रीब था और अगली वसंत ऋतू आने तक बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा इतना बड़ा हो गया था की किसान और उसके बच्चों को उसे झोपड़ी में रखने में दिक्कत होने लगी. एक दिन सबने सोचा इसे घर में रखना अब ठीक नहीं. अगली सुबह किसान ने उसे एक झोले में डाला और पास ही मौजूद राजा की झील में फेंक आया.

बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा कई दिन से पानी से दूर रहा था. उसने जैसे तैसे पैर चलाये और सतह पर आया, उसे तैरने में मज़ा आ रहा था. अचानक पानी में उसने अपनी परछाईं देखी. तभी दक्षिण की ओर गए पक्षी वापिस अपने तालाबों में लौटने लगे, लम्बी गर्दन, पीली चोंच और बड़े पंखों वाले हंस भी घर लौटे. फिर बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा समझ पाया कि वो बत्तख तो था ही नहीं ! वो तो हंस था !

हंसों के झुण्ड ने उसे घेर लिया, तुम कहाँ गायब रहे ? हमारे साथ दक्षिण तो गए नहीं थे तुम ? क्या तुम किसी और झुण्ड के हो ? सबने अलग अलग सवाल पूछा. वो बत्तखों से कई गुना ख़ूबसूरत हो चुका था, किसी ने उसे बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा भी नहीं कहा. हँसते हुए वो नया हंस बोला, ये तो एक लम्बी कहानी है !

हंस की चाल पर फ़िदा राजकुमारी और उसकी सहेलियाँ भी उसे खिलाने, उस से खेलने आतीं.

वो बेचारा बदसूरत बत्तख का बच्चा नहीं था, वो हमेशा से हंस था.

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