पुलक पलकों पर सजाने के लिए होती हैं, पल्लू से बाँध लोगी तो पागल कहलाओगी

पुलक पलकों पर सजाने के लिए होती हैं, हर बार उसे पल्लू से बाँध लोगी तो पागल कहलाओगी….

खुद से मुखातिब जब सामाजिक मन से बात निकली तो आत्मा ने असामाजिक विद्रोह ज़ाहिर करते हुए कहा धरती कब कहती है मैं अपनी मिट्टी से केवल सुगन्धित फूल, मीठे फल देने वाले पेड़ और पैरों को कोमलता का अहसास देने वाली हरी घास ही उगाऊंगी…. वो तो अपनी देह की मिट्टी से कैक्टस भी उगाती है, ज़हरीले फलों वाले पेड़ भी और कांटेदार झाड़ियाँ भी…

बात इतनी छोटी सी ही होती है, लेकिन उसके मायने बदल जाते हैं जब हमें पता नहीं होता उसे कब, कहाँ और कैसे कहना है…

आदम जंगल से गुजरोगे तो छोटी सी बात भी लपक ली जाएगी और शिकार होकर छिन्न-भिन्न हो जाएगी….

अपनी बातों को थोड़ा-सा ऊपर उछालो, पैरों तले रोंदे जाने से बचाओ, आदम कद से इतना ऊपर रखो कि जिसे ज़रूरत हो उसे उस बात को पकड़ने के लिए ऊंचा उठना पड़े…

धरती पर जन्म केवल धरती पर चलने के लिए नहीं होता, एक यात्रा हवा की पहली पर्त की ओर भी होती है, जहां बातें हवा में तैरती हुई मिलेगी, ज़मीनी सच्चाइयों से ठीक विपरीत फिर भी उतनी ही सच्ची…

और ये सच ज़मीनी सच्चाइयों से कड़वे नहीं, मादक मीठे और मनोहारी होते हैं…

हवा में नहीं उछलते शब्द
जिसे पकड़ा और पिंजरे में कैद कर
स्वामित्व जता लिया……..
हाँ बातें ज़रूर तैरती रहती हैं हवा में
जिसे आप लाख पकड़ कर
अपने अर्थों में गढ़ लो
फिर भी वो हवा में स्वतन्त्र तैरती ही नज़र आएगी…
.
पुकारो ज़रा किसी नाम से
उस नाम सी हो जाएगी…
कुछ पल साथ चलेगी
और जिससे सबसे पहले टकराए
उसके पाले में चली जाएगी…
भागते रहो फिर दिन रात उसी के पीछे
हाथ नहीं आएगी…
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उसे संबोधन देना बंद कर दो…
जैसे किसी को भी नाम से मत पुकारो…
उसे पुकारो उसके स्वभाव से,
उसके व्यक्तित्व से,
उसके अपने होने की सामर्थ्य से..
फिर आपको किसी को भी, कुछ को भी
जकड़ कर नहीं रखना होगा..
वो आपकी स्वतंत्रता में ही घुल मिल जाएगी..
.
बातें भी ऐसी ही होती हैं
संबोधन रहित
उसे पकड़ कर पिंजरे में नहीं डालना होता है
उसे मुट्ठी में भींच कर आसमान में उछालो
किसी बादल के फट जाने तक
तब बरसेंगी बातें
और जिसको जैसे भीगना होगा भीग जाएगा

अब सबसे पहला सवाल मन में यही उठा ना ज़मीनी सच्चाइयों से ही जीवन चलता है, उसे नकार कर ऊपर की यात्रा करना बेजा है… और भी बहुत सारे बहाने… तो बातें ही तो कहा ना, पैर तो फिर भी ज़मीन पर ही जमे हुए है… देह तो गुरुत्वाकर्षण के अलावा भी कई आकर्षण से बंधी है… लेकिन आत्मा…. वो तो किसी से नहीं बंधी ना…. तो प्रेम करो…. प्रतीक्षा करो…. परमात्मा ज़रूर मिलेगा….

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