सोझ रहोगे तो बोझ ढोना ही पड़ेगा

तू कितना सीधा है रे! .. तू कितना भोला है रे! .. दुनियादारी को समझो रे! ये दुनिया बड़ी खतरनाक और ज़ालिम है रे, कब समझेगा रे तू? दुनिया इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है और तुम हो कि इधर के इधर ही बैठे हुए हो!

वो कहते हैं न सोझ बाँस पहले ही छँटा के कटाता है. टेढ़े बांसों पे कौन मेहनत करें भला? .. सोझ बहराना और सोझ ही रह के सुख जाना ये आज की तारीख में सम्भव नहीं रे बाबू. बिना कुल्हाड़ी के ही लोग काट देंगे.

झूठ, छल, कपट, प्रपंच, धूर्तता आदि आदि गुण जब तक तुम्हारे अंदर कूट कूट के न भर जाए तब तुम इस दुनिया के लायक नहीं हो. अगर इन सब का तुम्हारे अंदर अभाव है तो तुम घनघोर जंगली, गंवार, देहाती, अनपढ़ हो.

गाली लगती हैं न ये सब, किसी को जंगली, गंवार, देहाती कह देना? है न? .. क्या इन जंगलियों में, गँवारों में, देहातियों में आपने झूठ, छल, कपट, प्रपंच वाली विशेषता कभी देखी है? देखी है? क्यों नहीं देखी है? भोले-भाले इन सब ‘विशेष’ गुणों से कोसों दूर.. कोई रिश्ता नाता नहीं! क्यों?

क्यों नहीं रखते हो रे जंगली ये सब गुण? कब सीखोगे रे जंगलियों दुनिया से कदम ताल मिला कर चलना सीखना?

अगर तेरे में ये गुण होते तो माँझी अपनी बीवी की लाश को अपने कंधे पे नहीं ढोता, उसे एम्बुलेंस मुहैया कराने में दिक्कत नहीं होती. अनपढ़, ज़ाहिल, सोझ माँझी जंगली कहीं के, तुम्हें पता होना चाहिये था कि पढ़े-लिखों से भरे अस्पताल में कैसे काम लिया जाता है? पढ़े-लिखों से किस प्रकार से हैंडल किया जाता है? सोझ रहोगे तो बोझ ढोना ही पड़ेगा.

अगर तेरे में ये गुण होते तो संतोषी भात-भात करते मर नहीं जाती. जहाँ अन्न सड़-सड़ के बर्बाद हो जाते हो वहाँ संतोषी भात-भात कहते मर जाती है. ऐ संतोषी की मैया! तू काहे नहीं सीखी रे ये सब गुण? सोझ के सोझे रह गई रे तू!

आज़ादी के 70 साल हो गए हैं, सरकारें पढ़ाने-लिखाने का काम कर रही है फिरी में जहाँ ये सब गुण फिरी में दिमाग में भरे जाते हैं वहाँ तुम काहे नहीं गई रे? रहोगी गाँव के गाँवे में ही बैठल तो पढ़ल लिखल के यहाँ से चावल कैसे मिलेगा रे तुम्हें? बेटी संतोषिया तो भात-भात करके मरेगी ही!

ऐ रे मधु जंगली कहीं का! नहीं पल्ला पड़ा था न रे कभी पढ़े-लिखे शहरी लोगों से? वो भी स्पेशल टाइप के पढ़े-लिखे तालीम लोगों से? पल्ले पड़ गया न! पढ़े-लिखे लोगों के बीच में तुम क्या जानो रे मधु दो किलो चावल का महत्व? आया था पागल चावल चुराने!

इन पढ़े-लिखों के घर बाहर पड़े डस्टबीन के यहां चल जाता, चार किलो चावल तो ऐसे ही फेंका हुआ मिल जाता!! .. चोरी कर लिया रे मधु तुमने इन पढ़े लिखे एजुकेटेड लोगों के सामने, मार तो खाओगे ही!! .. और मार भी ऐसी कि …. !

जंगली, गंवार, देहाती आदि शब्द गाली के तौर पे यूज करते हो, दुत्कारते हो और इसके जगह पे पढ़ने-लिखने, कुछ सीखने, शिक्षित होने की बात करते हो. लेकिन मैं कहता हूँ कि आखिर जंगली, गंवार, देहाती में दिक्कत क्या है? यही कि ये बहुत ही हद से भी ज्यादा सीधे-साधे होते हैं? इन्हें झूठ बोलना नहीं आता है? इन्हें छल-प्रपंच करना नहीं आता है?? यही न ??

आखिर हम कौन सी शिक्षा पा रहे हैं, जहाँ मानवीय संवेदनाएं मरती जा रही है और हर किसी में नफ़ा-नुकसान ही दिखाई दे रहा है! .. पढ़-लिख के हुशियार हो रहे हैं, किस प्रकार का हुशियार हो रहे हैं?? झूठ बोलना अच्छे से आ गया है, बहाने बनाना अच्छे से आ गया है, रास्ते में किसी जरूरतमंद को नजरअंदाज करना बहुत अच्छे से आ गया है, अपने काम से काम मतलब रखना अच्छे से आ गया है, कोई गरीब बिला वजह मार खा रहा है तो उसमें अपना हाथ साफ कर लेना भी बहुत अच्छे से आ गया है.

जब भी मैं ट्रेन में सफर करता हूँ 200-250 के चिल्लर बैग में रखता हूँ. जो कोई भी ट्रेन में झाड़ू मारने से लेकर कुछो भी काम में आता है तो हम कुछ चिल्लर निकाल के थमा देते. हर बार, बार-बार जब हर किसी को मैं पैसे देते जाता हूँ तो सामने वाले टोक ही देते हैं, ‘क्या यार! हर किसी को पैसे दे देते हो, बहुत ज्यादा पैसा है क्या? इस तरह तुम किसी को भीख दे के इसे बढ़ावा नहीं दे रहे हो ? शर्म आनी चाहिए आपको!!’
मैं एकदम गंवार टाइप से दांत खिसार के जवाब देता “गँवार हूँ भैया!, झेल लीजिये मुझको कुछ देर!!”

हम जंगली हैं तभी हम “सीतवा” को पढ़ल-लिखल लोग द्वारा फेंके गए जंगल से उठा के लाते हैं और पालते हैं!! .. हम जंगली हैं तभी मेरे घर में खटिया में पड़ी आजी को बड़के पप्पा खटिया सहित उठा के अपने घर ले जाते हैं और उसके दूसरे हफ्ते मेरे पप्पा खटिया सहित फिर अपने घर. … हम जंगली हैं तभी गांव की पगली देवंती को सभी खाना खिलाते हैं.

लेकिन अब हम पढ़ने लिखने लगे हैं, दुनियादारी समझने लगे हैं, हुशियार बनने लगे हैं, एजुकेटेड होने लगे हैं जहाँ माँझी, संतोषी, मधु जैसे जंगलियों का कोई स्थान नहीं है.

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