हमारी कटी पतंग किस मोहल्ले में किस भीड़ द्वारा लूटी जाएगी, बस यही देखना शेष है

हम हज़ार साल गुलाम रहे. उसमें मुग़ल काल हमारा शारीरिक गुलामी का काल था. हम पर अकल्पनीय शारीरिक अत्याचार हुए. खूब मार -काट हुई.

तलवार के डर से धर्म-परिवर्तन हुआ. मगर जो बचे रहे वो मानसिक रूप से सनातन के साथ जुड़े रहे. तब तक सनातन अपने मूल रूप में संस्कृति, भाषा, परम्परा, दर्शन, अध्यात्म, आस्था द्वारा लोक जीवन में रचा बसा रहा.

मुगलों ने मंदिर तोड़े, पुस्तकालय जलाये, अनेक बस्तियां गांव मिट्टी में मिला दी गई. मगर चूँकि वे स्वयं शिक्षित नहीं थे इसलिए बौद्धिक स्तर पर हमारा कुछ विशेष नुकसान नहीं कर पाए.

उनकी संस्कृति को अपना चुके लोगों की स्थिति आज भी वही है. वे अब भी सनातन पर शारीरिक प्रहार ही कर रहे हैं.

अंग्रेजों ने लगभग 200 साल तक राज किया. यह कालखंड मुगलों (और अन्य) से करीब करीब आधा ही होगा मगर नुकसान हमारा इस काल में कहीं अधिक हुआ.

यह हमारा मानसिक गुलामी का काल था. अंग्रेज स्वयं के श्रेष्ठ होने के भ्रम के रोगी थे. उन्हें हमारी श्रेष्ठता स्वीकार कैसे हो पाती.

उनकी ईर्ष्या भाव ने उन्हें उद्वेलित किया. यही कारण रहा जो उनके समय काल के दौरान सबसे अधिक हमारे बौद्धिक क्षेत्र पर हमला हुआ. हमारी संस्कृति का आधार हिलाया गया. सनातन समृद्ध समाज को कंगाल बना दिया गया.

कलकत्ता, इलाहाबाद, बॉम्बे, लाहौर, मद्रास में विश्वविद्यालय तो खोले गए मगर इनसे पढ़कर निकलने वाले धीरे धीरे सनातन से दूर होते चले गए. हिन्दुस्तान का हर नामी वकील, नेता, व्यवसायी इंग्लैंड से पढ़कर आने लगा.

सरकार की नौकरी इसी शिक्षित वर्ग को मिली. यह मध्यम वर्ग था. जो अपनी जड़ों से कटता चला गया. यही मध्यम वर्ग आज इतना विशाल बन गया है.

तब भी यही व्यवस्था को चला रहा था आज भी प्रजातंत्र में यही चलाता है. इनको देख कर कोई भी आंकलन कर सकता है कि अंग्रेज हमारा कितना अधिक नुकसान कर गए.

शारीरिक रोग कष्टदायक होता है मगर यह एक व्यक्ति तक ही सीमित रहता है. मगर मानसिक रोग अपने से अधिक अपनों को कष्ट देता है. मानसिक गुलामी स्थाई होती है. मानसिक रोग का इलाज आज भी शारीरिक रोग से कमतर है.

दुर्भाग्यवश आज़ादी की लड़ाई और आज़ादी के बाद सत्ता के केंद्र में यही इंग्लैंड रिटर्न वर्ग ही रहा. जो स्वयं अंगरेजी मानसिकता का गुलाम हो वो अपने अधीनस्थ को कैसे आज़ाद बनाये रख सकता है.

आज़ादी के बाद के सत्तर साल में हमारा सांस्कृतिक पतन और तीव्र गति से हुआ. भारत का निम्न वर्ग तेजी से सांस्कृतिक रूप से मध्यम वर्ग बनने के लिए लालायित हुआ.

यह समाजवाद की देन है. जो पर्वतों को काटकर सागर को पाटकर पूरी पृथ्वी को समतल कर देना चाहता है. वामपंथ ने हिन्दुस्तान के बौद्धिक वटवृक्ष की जड़ों में ही आग लगा दी.

आज हमारी संस्कृति हमारी आँखों के सामने जलकर राख हो रही है. और हम माथे पर चंदन का टीका लगाने वाले उस राख से अपना मुख पोतने के लिए अभिशप्त हैं.

समाज के उच्च वर्ग के लिए संस्कृति कभी भी महत्वपूर्ण नहीं रही. आज हिन्दुस्तान में सनातन अगर ज़िंदा है तो यहां वहाँ उपरोक्त वटवृक्ष की उन टहनियां में जो जमीन पर पहुंच कर पुनः जड़ बन जाने के लिए प्रयासरत हैं.

निम्न वर्ग तो मध्यम वर्ग की ओर अंधी दौड़ लगा रहा है. मगर मध्यम वर्ग भ्रमित है. जड़ों से कटा होने कारण ज़िंदा भी नहीं है. वो इधर उधर भाग रहा है. कभी बॉलीवुड में अपने नायक ढूंढता है तो कभी हॉलीवुड में.

हर दिन वो और अधिक अंग्रेज बनने के चक्कर में दौड़ रहा है. वही अंग्रेज जिनकी खुद की पश्चिम संस्कृति कटी पतंग की तरह दिशाहीन हो कर हवा में गोता लगा रही है वो किसी और को क्या दिशा दिखा सकता है.

सबसे विकट स्थिति तो हमारी है. हमारी कटी पतंग किस मोहल्ले में जाकर किस भीड़ द्वारा लूटी जाएगी, यह दृश्य ही देखना अब बाकी रह गया है.

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