मृत्यु का भय बताता है कि हम जीवन से अपरिचित हैं

भगवान श्री रजनीश की एक सुंदर प्रवचनमाला है, “मैं मृत्यु सिखाता हूँ”

“..मृत्यु का भय बताता है कि हम जीवन से अपरिचित हैं. मृत्यु के भय का एक ही अर्थ है – जीवन से अपरिचय. और जीवन हमारे भीतर प्रतिपल प्रवाहित हो रहा है, श्वास – श्वास में, कण – कण में, चारों ओर, भीतर – बाहर सब तरफ जीवन है और उससे ही हम अपरिचित हैं. इसका एक ही अर्थ हो सकता है कि आदमी किसी गहरी नींद में है. नींद में ही हो सकती है यह संभावना कि जो हम हैं, उससे भी अपरिचित हों…”

किसी की मौत से लोग थोड़ा चौंकते हैं ऐसे जैसे उन्हें पता था कि फलाँ व्यक्ति कितना जियेगा… आज श्रीदेवी की मृत्यु पर फ़ेसबुक में बाढ़ सी आयी हुई है.. भावपूर्ण श्रद्धांजलि देने की.
माधुरी दीक्षित और श्रीदेवी हर 90’s किड की पसन्दीदा एक्ट्रेस हैं… में ख़ुद भी उनकी बेहतरीन अदाकारी, खूबसूरती, वो शातिर मुस्कान, चुलबुली हँसी का दीवाना रहा हूँ…

मग़र एक मौत दो दिन पहले केरल में भी हुई, एक भूखे आदिवासी ने खाना चुराया और उसको पकड़ने वाले मज़हब विशेष के कुछ उन्मादी लोगों ने उसे पीट पीट कर मार दिया…. वैसे ही जैसे एक कश्मीरी अधिकारी को नमाज के बाद घेर कर मार दिया था, जैसे कुछ राजनीतिक प्रेरित लोग सत्ताधारी को बदनाम करने के लिए गौहत्यारों को पीट कर मार चुके हैं…

Mob lynching ये क्या है… ऐसी विकृति… ऐसी पाश्विकता…. और आतंक के नाम पर, जिहाद के नाम पर या आतंक के सफाए के नाम पर भी बेगुनाहों की मौत… उसके प्रति जनमानस का असंवेदनशील रवैया… हर ऐसी मौत के पक्ष और विपक्ष में लाखों करोड़ों लोग खड़े हैं..!

आज एक बॉलीवुड अभिनेत्री के मौत पर शब्दों की आदरांजलि उड़ेलने वालों में से बहुतों को जानता हूँ जो ऐसी कई मौतों को जायज़ मानते हैं..

सीरिया के बम ब्लास्ट में मरने वाली 4 माह की बच्ची का शव या उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों द्वारा किसी लड़की की बलात्कार के बाद हत्या के बाद नहर से बरामद ये शव… उसके विपरीत ब्रिटिश रॉयल परिवार में किसी का रॉयल फ्यूनरल या बोनी कपूर का अपनी पत्नी के शव को कंधा देना… ये तस्वीरें किसी एक ही घटना की साक्ष्य हैं वह है “मृत्यु” …

जीवन का जिन्हें कुछ भी पता नहीं वे मृत्यु पर कभी शोक मनाते हैं तो कभी खुशियां मनाते हैं.
देश मे JNU जैसी विश्वविद्यालय हैं जहाँ नक्सली हिंसा में शहीद crpf के जवानों की ख़बर पे पार्टी मनाई जाती है और आतंकवादी बुरहनवानी और अफ़ज़ल जैसों की मौत पे शोक सभा होती है…. घटना एक ही है मृत्यु और उसकी अभिव्यक्ति के आयाम…!!

साहब, ये बेतरतीब कुछ भी लिखा जा रहा हूँ क्योंकि व्यथित हूँ समाज के दोगलेपन से…. मुझे व्यक्तिगत क्षति इस बात से ज़्यादा होती है जब लोगों की बेहोशी देखता हूँ selective behaviour देखने को मिलता है…

क्यूँ ये लोग केरल में एक आदिवासी की मृत्यु पर श्रद्धांजलि नहीं देते… क्या वो कुछ कम आदमी था… लेडी डायना या श्रीदेवी या राजीव गाँधी की तरह क्या उसके दो हाथ, दो पैर, दो आँख नही थे..!!!

क्या सच मे श्रीदेवी की मौत पर इन्हें दुख है? या सिर्फ़ रस्म अदायगी की जा रही है? या आने दोगलेपन और बेहोशी को ढाँपने की एक और कोशिश करने में जुटे हैं सब!

साहब, आप सब जीवन से परिचित हों…. जीवन और अभी जीवित प्राणियों के प्रति प्रेम और संवेदना महसूस करें… फिर मृत्यु की महत्ता समझें… बस यही परमात्मा से प्रार्थना है.

स्वामी विनोद भारती उर्फ़ विनोद खन्ना जी की मृत्यु पर मैंने लिखा था ‘मृत्योत्सव की बधाई’ ….क्योंकि वो सही अधिकारी व्यक्ति था ऐसा कुछ कहे जाने के लिए… हर परिचित अपरिचित की मृत्यु की ख़बर एक रिमाइंडर है बस… और उस अंतिम क्षण को पूर्णता से जीने की कला सीखने का अवसर है ये जीवन…

श्रीदेवी जी ने एक सफल और सुफल जीवन जिया, उनकी कमी उनके परिवार और इंडस्ट्री में कभी भरी ना जा सकेगी… ईश्वर उनकी आत्मा को सद्गति दें, उन्हें एक सफल और सुफल यात्रा की शुभेच्छा!

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