अमेरिका, भारत और चीन के दांवपेंच के होंगे अगले 3 महीने, पर हलाल तो होगा ही पाकिस्तान

बीता दिन औरों के लिए कैसा रहा, मैं नहीं जानता लेकिन मेरा सर दर्द भरा था.

पाकिस्तान को लेकर, पेरिस से हो रही FATF की बैठक के नतीजों के बारे में इतनी कॉन्फ्लिक्टिंग खबरों का दौर चल रहा था कि मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि इसको लेकर क्या लिखूं!

सुबह ग्रेलिस्ट की खबर चली और पाकिस्तान ने टर्की को धन्यवाद तक दे दिया क्योंकि अंत मे उसको टर्की का ही समर्थन मिला था.

लेकिन देर रात FATF ने जो आधिकारिक घोषणा की उससे यह तो स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान पर कोई पाबंदी नहीं लगी है, लेकिन उसके पीछे भी बहुत कुछ समझने को है.

उसी वक्त ही इस मामले को लेकर मैंने यह लेख लिखा था ताकि आप लोग यह समझे कि इस सबका मतलब क्या है.

पाकिस्तान द्वारा आतंकवादी संगठनों को आर्थिक सहायता देने या मिलने से रोकने की दिशा में किये गये प्रयासों की, ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ (FATF) द्वारा की गई समीक्षा का जो परिणाम मिलेगा वो जहां पाकिस्तान के भविष्य को तय करेगा, वहीं पर यह मध्यपूर्व एशिया से लेकर वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करेगा.

यहां पहले, पेरिस स्थित FATF को आप समझ लीजिये.

यह एक अंतर-राजकीय संगठन है जो 1989 में मनी लॉन्ड्रिंग (गैरकानूनी धन की आवक, हवाला कारोबार, काले धन को सफेद करना इत्यादि) से लड़ने के लिये बनाया गया था ताकि अवैध स्रोतों से आये धन को रोका जा सके और उस पर कार्यवाही की जा सके.

शुरू में यह व्यापार और वित्तीय आर्थिक जगत तक ही सीमित था लेकिन विश्व भर में बढ़ती आतंकी घटनाओं और उनके संगठनों को विभिन्न राष्ट्रों से मिलने वाली सहायता पर नज़र रखने और उन स्रोतों को बंद करने के लिये 2001 में मनी लॉन्ड्रिंग के साथ, टेररिज्म फाइनेंसिंग (आतंकियों को वित्तीय सहायता) को भी जोड़ दिया गया है.

इसके 35 राष्ट्र और दो ऑर्गेनाईज़ेशन, यूरोपियन यूनियन और गल्फ कोऑपरेशन कॉउंसिल सदस्य है. इसमें सऊदी अरबिया और इज़राइल प्रेषक के रूप में जुड़े है.

जो पिछले तीन दिनों से ‘एफएटीएफ’, अमेरिका, इंग्लैंड और जर्मनी द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ लाये गये एक प्रस्ताव पर बहस कर रहा है.

प्रस्ताव यही है कि पाकिस्तान से, आतंकवादियों को मिलने वाली वित्तीय सहायता को रोक पाने के लिये, वहां की सरकार ने कोई संतोषजनक व पारदर्शी प्रयास नहीं किया है. ऐसी दशा में पाकिस्तान जाने व वहां से बाहर आने वाले हर धन पर निगरानी रक्खी जाये और वित्तीय रिस्ट्रक्शन लगाय जाये ताकि न सिर्फ मनी ट्रेल को पकड़ा जाय बल्कि आतंकियों को मिलने वाले स्रोतों को भी पकड़ा जाय.

यहां यह महत्वपूर्ण है कि एफएटीएफ की कोई भी नकारात्मक सिफारिश, उस राष्ट्र विशेष के विश्व भर के सभी वित्तीय संस्थाओं, बैंकिंग सेक्टर व उससे जुड़े, समस्त आर्थिक जगत को प्रभावित करती है. यह उस राष्ट्र की अर्थव्यवस्था लिये बड़ी भयावह स्थिति होती है.

पाकिस्तान को एफएटीएफ पहले भी ग्रेलिस्ट (वॉचलिस्ट या निगरानी वाली सूची) में डाल चुका है जिससे 3 वर्ष पूर्व, 2015 में हटा है. आज की तुलना में उस वक्त की परिस्थितियां दूसरी थीं इसलिये पाकिस्तान, ग्रेलिस्ट में आने के बाद आर्थिक रूप से लड़खड़ाया तो जरूर था लेकिन अमरीका ने उसकी आर्थिक मदद नहीं रोकी थी.

अमेरिका ने पाकिस्तान के इस आश्वासन पर भरोसा किया था कि वह, अफगानिस्तान में शांति बहाल कराने के लिये अफगानिस्तान में तालिबानियों की मदद नहीं करेगा व अपने फाटा क्षेत्र से हक्कानी नेटवर्क को भी खत्म करेगा.

आज वही अमेरिका, पाकिस्तान के विरुद्ध प्रस्ताव लाया है और उसने आर्थिक मदद देना भी बंद कर दी है. जो खबरें आयी हैं उनसे यही पता चला है कि चीन, सऊदी अरब, टर्की और गल्फ कोऑपरेशन कौंसिल ने शुरू में पाकिस्तान का समर्थन किया था लेकिन आखिरी दौर में सिर्फ टर्की अकेला रह गया था.

आज पाकिस्तान ग्रेलिस्ट से बच जरूर गया है लेकिन यदि डाला जाता तो यह पाकिस्तान की अर्थव्यस्था को बड़ा झटका होता क्योंकि इस सूची में आने के बाद, उसके पाकिस्तान से बाहर के बैंकों से सम्बन्ध रसातल में चले जाते.

क्योंकि तब व्यापार करने के लिये पाकिस्तान के व्यापारियों को न सिर्फ बढ़े ब्याज पर एलसी और अन्य सुविधाएं मिलतीं बल्कि इनको बाहर की कम्पनियों से महंगा इन्शुरन्स भी करना पड़ता.

यह पाकिस्तान की उस अर्थव्यवस्था के लिये भयावह होता जब कि उसको IMF (इंटर नेशनल मॉनेटरी फण्ड) सहित अन्य मदों पर अगले महीनों में अभी करीब 8 बिलियन डॉलर ऋणों के ब्याज के रूप में और करीब 30 बिलियन डॉलर के वे कर्ज़ उतारने है जिनकी देनदारी 2018 में है.

इस वक्त पाकिस्तान पर करीब 90 बिलियन डॉलर का विदेशी ऋण है. इस ब्याज और ऋणों को उतारने के लिये उसे एक नया कर्ज़ लेना पड़ेगा. पाकिस्तान को IMF, वर्ल्ड बैंक के पास जाना ही होगा और वहां अमेरिका का नियंत्रण है.

अब इन परिस्थितियों में मेरे लिये यह सोचने की बात है कि पाकिस्तान के मित्र राष्ट्र चीन और मुस्लिम हमबिरादर मुल्क सऊदी अरब ने उसका FATF में साथ क्यों छोड़ दिया? ये क्या अमेरिका की जीत है? क्या भारत में उसकी कूटनीति की जीत पर खुशी मनानी चाहिये?

मेरे लिये इन तीनों ही उठने वाले सवालों का जवाब समझ में आ रहा है. मुझे सऊदी अरब का अंत समय हटना समझ में आता है क्योंकि यह सऊदी अरब की अपनी मजबूरी है.

सऊदी अरब का नया शासकीय तन्त्र अपने ऊपर जहां आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले राष्ट्र के रूप में लगे धब्बे को मिटाना चाहता है, वहीं उसको अपने नये तन्त्र को स्थापित करना है. वह यमन के साथ युद्ध में पाकिस्तान की सेना की शिरकत के लिये, अब नए सिरे से दबाव डाल सकता है.

उधर मुझे चीन का भी कुछ कुछ समझ में आता है. पाकिस्तान को लेकर चीन की पिछले दशकों तक मित्रता वाली भूमिका पूरी हो गयी है. आज वो विशुद्ध साहूकार की भूमिका में है.

जितना पाकिस्तान आर्थिक रूप से दयनीय होगा उतना ही चीन पाकिस्तान से CPEC में अपनी शर्तो को मनवाने में सफल होगा. पाकिस्तान के पास सिवाय इसके कोई चारा नहीं होगा कि वह बलूचिस्तान में बनाये जारहे इकोनॉमिक कॉरिडोर की स्वसत्ता चीन के हाथों में दे दे.

चीन वहां अपनी मुद्रा यूनान चलना चाहता है, उसमें भी सफल हो सकता है. वहां वो चीनी नागरिकों को बसाना चाहता है और सिर्फ चीनी नागरिकों को ही काम देना चाहता है, वह उसमें भी सफल हो सकता है.

हकीकत तो यही है कि पाकिस्तान दिवालिया होने के कगार पर है और यह ऐसे वक्त है, जब वो IMF, वर्ल्ड बैंक जहां अमेरिका का पूरा नियंत्रण है, की मदद का मोहताज है और अमेरिका अपनी शर्तों पर यह होने देगा.

यह अब देखना है कि पाकिस्तान क्या अमेरिका का दबाव पसन्द कर लोन लेना चाहेगा या फिर चीन की शर्तों पर उससे सहायता लेगा.

मेरी समझ यह है कि कोठे पर बैठ पाकिस्तान अपने नये ग्राहक के सामने ही लेटेगा. पाकिस्तान के राजनीतिज्ञ और सेना के बड़े लोग, वो चाहे पक्ष हो या विपक्ष, दोनो ही पिछले 10 साल से अपना ठिकाना बाहर बना चुके हैं.

चीन, भारत के बगल पाकिस्तान पर कब्ज़ा किये बैठेगा वो भारत के लिये खुशी की बात नहीं होगी लेकिन भारत जिस बड़े संघर्ष, जिसमें अमेरिका का सीधे बलूचिस्तान में दखल हो, की तमन्ना रखता है, इसके लिए शायद यह एक ज़रुरी कीमत होगी क्योंकि यह पाकिस्तान के टुकड़े-टुकड़े होने पर मोहर लगने का काम करेगी.

अब ऊपर की सारी बातें इस परिप्रेक्ष्य में समझिये कि पाकिस्तान की जान अभी छूटी नहीं है. जो आज बात स्पष्ट हुई है उससे यह पता चला है कि पाकिस्तान के यहां जो राजनीतिक अस्थिरता है और इस बीच उसको जो ऋण चुकाना है, उसको जून 2018 तक की मोहलत मिली है.

इन तीन महीनों में उसे इस मामले को लेकर व ‘एफएटीएफ’ की मीटिंग में लगाए गये आरोपों को दूर करना है, जो फिलहाल राजनीतिक शून्यता को देखते इतने कम समय मे होना सम्भव नहीं लगता है. भले ही यह तीन महीने अमेरिका, भारत और चीन के दांव पेंच के महीने होंगे लेकिन हलाल तो पाकिस्तान को ही होना है.

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