कुछ उठा हुआ है वो दर्द भी…

पाकिस्तान के मनोरा स्थित श्री वरुणदेव मंदिर

अपने खाली समय में मैं गूगल मैप पर ढाका, लाहौर, काबुल, करांची से लेकर उन तमाम शहरों के गलियों की ख़ाक छानता हूँ जो कभी हमारे वृहत्तर भारत का हिस्सा हुआ करती थी पर आज हमारे पास नहीं हैं.

वहां कभी मैं अपने कटासराज मंदिर को खोजता हूँ तो कभी लाहौर के गुरुद्वारों को, तो कभी हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और तक्षशिला में बिखरे अपने गौरवशाली अतीत को.

कभी गूगल मैप के जरिये ढाका पहुँच कर वहां माँ ढाकेश्वरी देवी के पावन मंदिर को निहार आता हूँ तो कभी हिंगलाज भवानी के दर्शन कर लेता हूँ.

इसे आप पागलपन कह सकतें हैं पर मैं गूगल में लाहौर के उस बच्छोवाली गली को भी खोजता हूँ जहाँ कालजयी सीरियल बुनियाद के मास्टर हवेलीराम रहा करते थे.

पसनी से लेकर ग्वादर बंदरगाह तक की यात्रा मैंने गूगल मैप के साथ कई बार की है और वहां बहने वाली हब नदी को भी स्पर्श किया है.

भारत का खंडित मानचित्र मुझे तकलीफ देता है, ये तकलीफ इसलिये है कि जिन जगहों के साथ, जिन चिह्नों के साथ, जिन प्रतीकों और स्मारकों के साथ, जिन मंदिरों के साथ, जिन नदियों और पहाड़ों के साथ हमारे महान पूर्वजों की स्मृतियाँ जुड़ी है, जिनमें हमारे गौरवशाली अतीत सन्निहित है वो सब अब हमारे पास नहीं है.

जिनके पास है वो उनके लिए व्यर्थ हैं, कुफ्र के दिनों के निशान हैं जिन्हें कभी भी तोड़ा जा सकता है. मैं वीज़ा लेकर माँ ढाकेश्वरी देवी के दर्शन जरूर कर सकता हूँ, वीज़ा मुझे हिंगलाज भवानी तक भी ले सकता है पर वो मेरा तो नहीं हो सकता. माँ के दर्शनों के लिये पुत्रों को वीज़ा लेना पड़े इससे बड़ी बिडंबना क्या होगी.

ये दुःख यहीं तक नहीं है, अभी हाल ही में एक मित्र कैराना होकर आये. कैराना भारत में ही हैं पर पिछले वर्ष वहां से जो ख़बरें आईं उसके बाद कैराना क्या भारत में ही है, इस पर शंका होनी लगी?

गुंडागर्दी से पीड़ित हिंदू परिवार बड़ी संख्या में यहाँ से पलायन कर गये. कैराना को प्राचीन काल में कर्णपुरी के नाम से जाना जाता था और माना जाता है कि महाभारत काल के कुंती पुत्र कर्ण का जन्म यहीं हुआ था.

इसी कैराना के पास ही मुज़फ्फरनगर है जिसका प्राचीन नाम सरवत था, जहाँगीर के शासनकाल में यहाँ नरसंहार चला, जनसांख्यिक परिवर्तन हुआ था तो नाम भी बदलना ही था. सरवत अब मुज़फ्फरनगर है.

इस मुज़फ्फरनगर में आज भी सदियों पुराना एक वट वृक्ष है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसके नीचे ही शुक ऋषि ने राजा परीक्षित को भागवत पुराण सुनाया था. वट वृक्ष तो अब भी जवान है पर हिन्दू उम्मीदें वहां कुम्हलाने लगीं हैं, वट वृक्ष अभी भी सूखा नहीं है पर हिन्दू उम्मीदें मर चुकीं हैं.

आज ज़रूरत इस उम्मीद को ज़िन्दा रखने की है. ये ज़रूरत इसलिये है क्योंकि इसी शहर में पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमन्त्री का बंगला ‘कहकशां’ आज भी मौजूद है जो कई लोगों में ‘गज़वा-ए-हिन्द’ का चिराग जलाये हुए है.

पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री जब पाकिस्तान हिजरत कर रहे थे तो यहाँ के लोगों को अपना यह बंगला यह कह कर सौंप गए थे कि उधर हम पाकिस्तान बनायेंगे और फिर जैसे ही ये गोरे अंग्रेज हटेंगे हम भारत पर हमला कर उत्तर प्रदेश को चुटकियों में हथिया लेंगे और फिर से इस बंगले में रहने आएंगे.

आपकी उम्मीदें भले मर गई हो पर उधर ये उम्मीदें आज भी ज़िंदा हैं, कैराना का पलायन उसी उम्मीद की राह प्रशस्त करने की ओर हटाया गया पहला पत्थर था.

ढाकेश्वरी और हिंगलाज को कब मुक्त करेंगे, पता नहीं पर इस उम्मीद को अगर हमने मरने दिया तो कैराना के पास कल-कल करती हुई बह रही यमुना, शुक मुनि द्वारा परीक्षित को सुनाई गई भागवत कथा का गवाह वो वट वृक्ष और महादानी कर्ण के जन्मस्थली को भी गूगल मैप पर ही खोजना पड़ेगा.

मेरे वो हिम्मती मित्र उस दिन पूरे कैराना में अपने माथे पर तिलक सजाकर घूमे, उनके इस हौसले ने एक नया रास्ता उस दिन उनको भी दिखाया था और हमें भी.

तिलक और हिन्दू प्रतीकों के साथ चलिये, ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’ पहले प्रतीक में दिखना शुरू हो तो हौसलों में भी आयेगा और फिर वो उम्मीदें भी मरेंगी जो दिल्ली फ़तह कर ‘कहकशां’ में आने की उम्मीद पाले बैठी है.

‘भारत भूमि का कंकड़-कंकड़ शंकर है’ बस ये भाव विस्मृत न हो…

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