यह देश तो स्थायी भाव से भांग और अफीम की पिनक में है, क्या और क्यों खेलेगा कोई होली?

होली कोई क्या खेलेगा और क्यों खेलेगा? यह देश तो स्थायी भाव से भांग और अफीम की पिनक में है. एक मुख्यमंत्री के यहां सेक्रेटरी जाता है, उसके गुंडे पिटाई कर देते हैं. अगले दिन दो टके के गुंडों की तरह सो-कॉल्ड आइएएस विधायकों के साथ भिड़ जाते हैं, मार-कुटाई होती है. उसके बाद तीन कौड़ी के गली के छोकरों की तरह एफआइआर और थानेबाजी हो रही है.

उधर, जेएनयू के लोग इस बात पर आमादा है कि 75 फीसदी उपस्थिति की अनिवार्यता नहीं होने देंगे. क्यों बे? जेएनयू अलग ग्रह है, तुम लोग एलियन हो, पूरे देश का कानून वहां लागू नहीं होगा?

कट-कॉपी-पेस्ट से तो तुम लोग शोध करते हो (हमने देखी है उन आंखों की महकती खुशबू… अभी कम से कम तीन बड़े नामचीन लेक्चररार हैं वहां जिनकी थीसिस दो महीने में मेरे सामने बैठकर लिखायी गयी थी, जिनको न अंग्रेजी न हिंदी आती है, आज वे डायस्पोरा और विदेश नीति के विशेषज्ञ हैं).

तुम्हारा स्थान दुनिया के 300 यूनिवर्सिटी में नहीं आता, अबे तोंदियलों, तुमको शर्म नहीं आती… संखिया क्यों नहीं खा लेते थोड़ा सा? हमारे समय में सारा कुछ -मने राजनीति से लेकर सिनेमाबाजी तक- करने के बावजूद हमारा अटेंडेंस 80-90 फीसदी ही रहा होगा.

(खैर, अलग बात है कि हम अगर तनिक भी फिसलते तो कपटी कम्युनिस्ट हमें डिग्री भी नहीं लेने देते). वी.सी. साहब अलग आइटम हैं. इन धूर्तों को पुलिस के हवाले करने में उनको पता नहीं क्या देर लग रही है.

और तुम्हारे आदर्श कौन हैं? वह पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष जो लड़कियों के सामने लिंग लहराता हुआ मूतता है, वह जिहादी जो आखिरकार अपने पिता की विरासत को ही अपनाता है, ISO में ही भाषण देने जाता है. बाप सिमी का, तो बेटा अलग कहां से होगा, भले कम्युनिज्म जितना झाड़ ले, –पहुंची वहीं पे खाक, जहां का ख़मीर था….. या फिर वह जिहादी बालिका जो एक सच्चाई मोहम्मडन के बारे में कहती है तो उसे इतना जलील किया जाता है कि ट्विटर छोड़ कर भाग जाती है….

अबे, माइनस के नीचे भी अगर शर्म बची है न तो सालों, तुम चुल्लू भर पानी में डूब जाओ. कम से कम हमारे लिए ऐसी स्थिति तो मत बनाओ कि अपने अल्युमनाइ का नाम लेते हुए हमें शर्मसार होना पड़े.

केरल में एक आदिवासी थोड़े से चावल के लिए मार दिया जाता है. कम्युनिस्टों का त्वरित न्याय उसको नसीब हो जाता है. इस बीच राष्ट्रीय परिघटना एक लड़की का आंख मारना बना हुआ है.

हम दरिद्रतम देश हैं, वैचारिक रूप से शून्य. हार्दिक रूप से खाली. भावनात्मक रूप से दीन.
…हमारे यहां रोज ही होली है…..
निकालो रे भांग, सिलबट्टा……
बुला लो महादेव अब कैलाश…..
होली है… होली है…

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