नीरजा फिल्म को देखें ताकि और नीरजा जनम ले सकें

जब ये घटना हुयी थी तब मैं 8-9 साल की थी धर्मयुग पत्रिका में पढ़ा था इस घटना को. उस वक़्त की स्मृति ने कुछ विशिष्ट घटनाओं को नीरजा से जुड़ी याद के रूप में रखा जैसे कि नीरजा की माँ ने एक इंटरव्यू में बताया था कि मृत्यु के बाद उन्होंने नीरजा से प्लैन चिट के द्वारा संपर्क किया था जिसमें नीरजा ने माँ को कहा था कि वो जहाँ है खुश है अब आप भी खुश रहो.

उसने ये भी बताया था कि मृत्यु के समय दर्द में माँ तुम्हें याद किया. नीरजा के जीवन में विवाह जैसा कटु सत्य भी था ये मुझे नहीं याद था (शायद 8 साल की अमृता के लिए ये महत्वपूर्ण नहीं था आज की तुलना में).

ये मुझे अब पता चला. वैसे तो पूरी फ़िल्म में मैं रोई पर जब जब कहानी नीरजा के विवाहित जीवन में जाती डोमेस्टिक वायलेंस, दहेज़ प्रताड़ना के दृश्यों में थोड़ा ज्यादा रोना आया. इन दृश्यों के समय बिटिया मेरे आंसू पोंछ कर बोली मम्मा मैं समझ गयी तुम क्यों रोई?

खैर नीरजा मूवी पर आती हूँ …

नीरजा मूवी एक बायोपिक है जो एयरहोस्टेस, मॉडल नीरजा भनोट के वास्तविक जीवन पर आधारित है. नीरजा जिसने 300 से ज़्यादा यात्रियों को आतंकवादियों केचंगुल से बचाया और खुद शहीद हो गयी.

नीरजा के जीवन को तीन घंटे की स्क्रिप्ट में ढालना आसान नहीं था, पर इसमें Saiwyn Quadras की कलम ने अच्छा काम किया, कामर्शियल सिनेमा के लटके झटके से दूर फिर भी एक पकड़ बनी थी कहीं कोई कमी थी तो वो थी नीरजा के किरदार में.

सोनम कपूर का होना, इतने दिनों के करियर में सोनम अभी भी अदाकारी की गहराइयों में न जा सकी जो कि अब उन में आ जानी चाहिए. एक दृश्य जहाँ नीरजा के राजेश खन्ना प्रेम पर चिढ़ कर सनकी आतंकवादी नीरजा से गाना गाने को कहता है उस दृश्य को सोनम ने मजाक बना दिया रोते रोते गाना गाने में बिलकुल साफ़ था कि सोनम अपनी हंसी नहीं छिपा पा रही. ऐसे ही नीरजा के वैवाहिक जीवन को जब जब फ़्लैश बेक किया गया तब सोनम कमज़ोर नज़र आई.

मृत्यु के दृश्य में भी सोनम जान न ला सकी ये मैंने महसूस किया. नीरजा की माँ की भूमिका में शबाना आज़मी ने पूरी तरह से न्याय किया. बाकि कलाकार खाना पूर्ति को थे और उन्होंने वो किया.

आतंकवादी खलील के रूप में जिम सरभ ने अच्छी भूमिका निभाई. जब जब वो आतंकवादी की क्रूरता में आते दर्शकों को भी क्रोध आ रहा था और अच्छे कलाकार की पहचान होती है दर्शकों को किरदार से जोड़ना.

ऐसी फिल्मो में प्रेम प्रसंग बहुत उभरते नहीं हैं. वही यहाँ भी हुआ विशाल शेखर संगीतकार के शेखर राज्वानी नीरजा के प्रेमी जयदीप के रूप में दिखे जिसे देख यही भावना जागी कि नीरजा जिंदा होती तो कितनी सुखी होती. डायलॉग प्रभावित नहीं करते हैं.

कोई भी डायलॉग मेरे जेहन में नही रहा यहीं से डायलॉग राइटर की कमजोरी दिखी. गीत संगीत मध्यम. “जीते हैं चल” और “ऐसा क्यूँ माँ” सुनने लायक है और प्रभावित भी करता है. “आँखें मिलायेंगे डर से” “गहरा इश्क” काम चलाऊ बन पड़े.

ये पीरियड फिल्म नहीं है पर फिर भी 1986 में बहुत कुछ आज सा नहीं था यहीं पर निर्देशक और आर्ट डायरेक्टर मात खा गए. उन्होंने खुद ये फिल्म सिर्फ और सिर्फ मृत नीरजा के कन्धों पर छोड़ दी. 2 साल के प्री वर्क में पूरी टीम ने काफी कमियां रख छोड़ी, सिवाय स्क्रिप्ट के.

मैंने नीरजा के बलिदान को पढ़ा था उसे कान और आँखों के आधार पर और जीना था इस लिए ये फिल्म मेरे लिए अत्यंत महत्व पूर्ण है. मुझे आज की पीढ़ी को भी नीरजा के बलिदान की कहानी दिखानी थी इस लिए भी ये फिल्म महत्वपूर्ण है. आप फिल्म देखें अवश्य देखें नीरजा भनोट के लिए उस नीरजा के लिए जिसने 365 यात्रियों को बचाया खुद की जान गँवा कर.

उस नीरजा के लिए जिसने सबसे कम उम्र भारत के सबसे बड़े वीरता पुरस्कार अशोक चक्र पाया. वो नीरजा जिसे पकिस्तान सरकार ने तमगा -ए – इंसानियत से नवाज़ा. नीरजा फिल्म को देखें ताकि और नीरजा जनम ले सकें.

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