सफलता का एक सूत्र : खुद सीखो… खुद करो

मनाली से कुल्लू आने के दो रास्ते है. एक ब्यास नदी के इस पार राष्ट्रीय राजमार्ग है और उस पार एक स्टेट हाईवे है जो नग्गर होता हुआ कुल्लू आता है.

मनाली से निकलते ही 4 किलोमीटर पर एक गांव है खखनाल, वहां एक Swiss गोरा, जिसका नाम डेनियल है, Yes Family Restraunt चलाता है.

आज से कोई 5 – 7 साल पहले हम उस गांव में एक PG में 4 दिन रुके थे और रात का खाना डेनियल के पास ही खाते थे.

दिन भर उसकी बालकनी में पसरे फुटबाल का विश्व कप देखते और सामने फैली वादियां निहारते…

उन चार दिनों में हमने ये देखा कि वो गोरा, मालिक हो के भी दिन-रात लगा रहता, झाडू, पोछा, बर्तन खुद करता था, किचन में दिन रात लगा रहता.

कॉन्टिनेंटल फ़ूड खुद बनाता था, ओवन में अपनी ब्रेड्स और केक्स खुद बनाता था… इसके अलावा टेबलों पर परोसता भी खुद ही था.

Indian फ़ूड के लिए उसने एक स्थानीय कुक रखा हुआ था… वो मालिक हो के भी खुद काम करता था… उसके 99% ग्राहक अंग्रेज़ गोरे ही थे. देसी तो उसके पास बस इक्का दुक्का ही पहुंचते थे.

गोरों के बड़े बड़े ग्रुप्स वहां आते थे. बड़ा महंगा बड़ा रेस्त्रां है. करोड़ों की पूंजी लगी है. मालिक भी करोड़ों पति है. इसके बावजूद अपने रेस्त्रां में खुद खटता है लेबर की तरह.

मैंने भारत देश में किसी भारतीय मालिक को ऐसा करते नहीं देखा. हम हिंदुस्तानियों की ऐसी कोई मानसिकता ही नहीं है. हिंदुस्तानी मालिक तो भरसक गल्ले पर भी नहीं बैठना चाहता. उसके लिए भी आदमी खोजता है.

मेरे बेटे के साथ का एक पहलवान जब सरकारी नौकरी जोहता बुढ़ा गया और भूखों मरने की नौबत आ गयी तो उन्होंने मुगलसराय में मोमो का एक स्टाल लगवाया…

शब्दों पर ध्यान दें… लगाया नहीं, लगवाया… मने एक अड्डे पर स्टाल रखा, एक लड़का खोज के वहां खड़ा किया और कहीं से रेडीmed मोमोमो और चटनी ला के बेचना नहीं बल्कि ‘बिकवाना’ शुरू किया.

अपने बाऊ साहेब मोटर साइकील से मोमो और चटनी सप्लाई करते थे. सेल्समैन बेचता था…

हमने उसको समझाया कि रेडीमेड काहे लियाते हो? तुमरा मोमो इतना घटिया है कि कुक्कुर भी नहीं खायेगा… तुम्हारी चटनी खा के तो हैजा हो जाएगा… अबे अपने हाथ से खुद बनाओ और खुद बेचो… 200 रूपए तो तुमरा सेल्समैन ले जाता है. तुमको क्या ख़ाक बचेगा…

उसने खुद बना के बेचने में 1000 अड़चन गिनाई… बेचारा राजपूत युवक… 3 महीने बाद काम बंद कर घर बैठ गए बाऊ साहेब… अब कराची का एयरपोर्ट खरीदने जा रहे हैं…

दिल्ली के दो लड़के सैंडविच बर्गर और सूप सलाद बनाना सीखने पुणे जा रहे हैं. अपने हाथ से बनाने की कोशिश करेंगे तो देर सबेर सीख ही लेंगे.

अपने हाथ से करेंगे तो कामयाबी मिलनी निश्चित है. अगर लॉट बहादुर गवर्नर साहब बनेंगे और कुक शेफ से बनवाएंगे तो फिर कर चुके…

अपने हाथ से करेंगे तो 200% सफल होंगे वरना कराची का एयरपोर्ट तो आखिरी विकल्प है ही….

एक मित्र ने पुणे वर्कशॉप को लेकर बड़े वाजिब सवाल पूछे हैं – पुणे में हम सिर्फ 10 – 15 दिन में क्या सीख लेंगे. सीख के क्या करेंगे? परफेक्शन कितने दिन में आएगा? उसके बाद किसी की नौकरी करेंगे या अपना स्टाल लगाएंगे?

पुणे में शुरुआत हो जाएगी. ऐसी कोई राकेट साइंस भी नहीं है. आदमी चाह जाए तो क्या न कर दे?

महाकवि दिनकर ने लिखा है…

खम ठोंक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़।
गुण बड़े एक से एक प्रखर, हैं छिपे मानवों के भीतर…

पीछे से बस हौसला देने वाला, ललकारने वाला चैय्ये…. mentorship चैय्ये… उसके लिए अपन हैं… इनको नवाबी करने नहीं देंगे.

सफलता असफलता ऊपर वाले के हाथ है… कोशिश करना हमारा काम है. सफलता का सिर्फ एक सूत्र जो मुझे समझ आया… खुद सीखो… खुद करो, स्टाफ के भरोसे मत रहो.

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