यादों के झरोखे से : शेख अब्दुल्ला एक विवादित हस्ती

मनमोहन शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

जम्मू कश्मीर के पूर्व प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद अब्दुल्ला देश के सबसे विवादित नेताओं में से एक हैं.

कहा जाता है कि उन्होंने अपनी जीवन की शुरुआत ब्रिटिश सरकार के एक भेदिये के रूप में की थी.

शेख साहब बेहद महत्वाकांक्षी थे. उनके दिमाग में रियासत कश्मीर के सुल्तान बनने का जो भूत सवार हुआ था वह उनके अंतिम दिनों उनके दिमाग से नहीं निकला.

शेख साहब से मेरा संबंध एक दशक से भी अधिक समय तक रहा है. अजीब बात यह है कि वे भारत में तो सेकुलरवादी होने का नकाब ओढ़े रहते थे, मगर जैसे ही अपनी रियासत में कदम रखते उनका कट्टरवादी इस्लामी चेहरा फोरन बेनकाब हो जाता.

कश्मीर घाटी में या मुसलमानों के सम्मेलन में उनका भाषण कुरान की आयतों से शुरू होता था और कुरान के आयतों पर ही खत्म होता था. उनके एक-एक शब्द में इस्लामिक अतिवाद भरा होता था.

जब मैंने शेख साहब से इस संबंध में पूछा तो वे मुस्कुरा कर बात को टाल गए. सेकुलरिज्म का नकाब ओढ़ने वाले शेख साहब जम्मू-कश्मीर के ओकाफ के कई दशकों तक अध्यक्ष रहे.

उनका स्वभाव तानाशाही था और वे अपने किसी भी विरोधी को सहन करने को नहीं तैयार होते थे. उनके कोपभाजन के अनेक शिकार बने चाहे हिन्दू हो या मुसलमान.

मैं आज तक यह नहीं समझ सका कि उनके पास जादू की कौन सी ऐसी छड़ी थी जो कि वे जवाहरलाल नेहरू को अपने मायाजाल में फंसा लेते थे.

1964 में बंबई से प्रकाशित होने वाले विख्यात समाचारपत्र साप्ताहिक ब्लिट्ज़ ने उन पर ब्रिटिश सरकार के गुप्तचर होने का जो आरोप लगाया था, उसका उन्होंने कभी खंडन नहीं किया.

बड़ी अजीब बात है कि देश के लगभग सभी अतिवादी मुस्लिम नेताओं के पूर्वज हिन्दू थे. चाहे वे एम.ए. जिन्ना हों या डॉ इकबाल या फिर शेख अब्दुल्ला सभी घोर हिन्दू विरोधी थे.

शेख साहब ने खुद स्वीकार किया है कि उनके दादा रघु राम कौल कश्मीरी ब्राह्मण थे. उनके पिता ने युवावस्था में इस्लाम धर्म स्वीकार किया था.

यह भी आरोप लगाया जाता है कि अंग्रेजों के इशारे पर जम्मू-कश्मीर के डोगरा शासक महाराजा हरि सिंह को परेशान करने के लिए शेख अब्दुल्ला, मीरवाज युसूफ शाह, सरदार इब्राहिम और गुलाम अब्बास ने मुस्लिम कांफ्रेंस का गठन किया था जिसका लक्ष्य रियासत में मुस्लिम हुकूमत कायम करना था.

कहा जाता है कि जिन्ना की नज़र रियासत जम्मू-कश्मीर पर काफी दिनों से लगी हुई थी. उन्होंने इस रियासत को हड़पने के लिए राज्य के मुस्लिम नेताओं से संपर्क साधा.

शेख के दिमाग में रियासत का मुस्लिम सुल्तान बनने का भूत सवार था. जबकि जिन्ना जम्मू-कश्मीर को हर कीमत पर पाकिस्तान का हिस्सा बनाना चाहते थे इसलिए उनकी शेख से पट न सकी.

शेख ने कम्युनिस्ट नेता बाबा बी.पी.एल. बेदी और एस.एम. अशरफ के सहयोग से नेहरू से संपर्क साधा. कम्युनिस्टों के मशवरे पर उन्होंने अपने संगठन का नाम बदलकर नेशनल कांफ्रेंस रख दिया और नया कश्मीर की कल्पना जनता के सामने रखी.

कहा जाता है कि शेख अब्दुल्ला की लीडरी को चमकाने में ब्रिटिश स्टेट विभाग ने उन्हें दिल खोलकर आर्थिक और हर तरह की सहायता दी ताकि वह कश्मीरी मुसलमानों में अपनी लीडरी को स्थापित कर सकें.

यह भी कहा जाता है कि उनका विवाह अकबर जहां बेगम से करवाने में भी ब्रिटिश गुप्तचर विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका थी. अकबर जहां बेगम उस समय के अरबपति होटल मालिक स्विस नागरिक हेरी नीडोज़ की पुत्री थी.

शेख साहब अपनी पत्नी के इशारों पर नाचा करते थे. इसका मुझे व्यक्तिगत रूप से कई बार प्रत्यक्ष रूप से अनुभव भी हुआ.

भारतीय गुप्तचर विभाग को इस बात की 1950 से ही जानकारी थी कि शेख अब्दुल्ला अमेरिकी और ब्रिटिश गुप्तचर एजेंसियों के संपर्क में हैं.

इस संदर्भ में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को अनेक बार ठोस प्रमाण भी उपलब्ध कराए गए थे मगर वे शेख के मोहपाश में इतने उलझे हुए थे कि जो भी अधिकारी शेख के खिलाफ एक शब्द बोलता उसे ही नेहरूजी डांट दिया करते थे.

गुप्तचर ब्यूरो के तत्कालीन प्रमुख बी.एन. मलिक ने अपनी पुस्तक ‘नेहरू के साथ मेरे दिन’ में यह रहस्योद्घाटन किया है कि शेख अब्दुल्ला से जून 1953 में अमेरिकी गुप्तचर विभाग के दो प्रमुख अधिकारियों ने श्रीनगर में लम्बी बैठक की थी जिसमें यह तय किया गया था कि शेख साहब 15 अगस्त 1953 को आजाद कश्मीर की घोषणा कर देंगे.

इस नए राष्ट्र को ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस आदि पांच पश्चिमी देश फ़ौरन मान्यता प्रदान कर देंगे और इस नए राष्ट्र की रक्षा के लिए पाकिस्तान और विदेशी सेनाएं कश्मीर घाटी में घुस जाएंगी.

इस रिपोर्ट के बाद रफी अहमद किदवई के दबाव पर नेहरू को शेख अब्दुल्ला को बर्खास्त करके उन्हें फ़ौरन कैद करने का निर्देश सेना को देना पड़ा. शेख अब्दुल्ला के खिलाफ कश्मीर साजिश केस चलाया गया, वर्षों वे जेल में बंद रहे. फिर अचानक प्रधानमंत्री नेहरू ने यह मुकदमा वापस ले लिया.

सबसे रोचक बात यह है कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद नेहरू ने पाकिस्तान के साथ मैत्री संबंध स्थापित करने के लिए शेख अब्दुल्ला का खुलकर इस्तेमाल किया. उन्हें विशेष दूत के रूप में पाकिस्तान जनरल अयूब से समझौते की वार्ता चलाने के लिए भेजा गया.

यह बातचीत गुप्तरूप से चल ही रही थी कि अचानक नेहरू का निधन हो गया. नेहरू के निधन के समय शेख पाकिस्तान में थे. अपने मित्र की मृत्यु का समाचार सुनते ही वे एक विशेष विमान द्वारा जनरल अयूब और उसके विदेश मंत्री जेड. ए. भुट्टो के साथ फ़ौरन दिल्ली पहुंचे.

मैंने तीन मूर्ति हाउस में नेहरू के शव के पास शेख को बच्चों की तरह बिलखते हुए अपनी आंखों से देखा है. शेख को ज्योतिष और रमल (अरबी ज्योतिष विद्या) पर बेहद आस्था थी.

मुझे याद है कि एक बार मैं उनके साथ बस्ती निजामुद्दीन में रमल विद्या के एक माहिर के साथ मिलने के लिए गया था. इस मुस्लिम ज्योतिषी ने शेख के पुनः सत्ता में आने के बारे में जो भविष्यवाणी की थी वह बाद में सही साबित हुई.

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि शेख का व्यक्तित्व काफी मोहक था और वे अपने व्यक्तित्व के जाल में अच्छे-अच्छों को फंसा लेते थे. नेहरू उनके इशारों पर कठपुतली की भांति चलते थे. शेख जो चाहते वही करवा लेते थे.

इंदिरा गांधी के साथ भी उनके संबंध काफी घनिष्ठ थे और वे उन्हें ‘इन्दू बेटी’ कहा करते थे.

देश के खरबपति पूंजीपति अम्बालाल साराभाई की पुत्री मृदुला साराभाई भी शेख के बेहद नजदीक थी. शेख के चक्कर ने उसने नेहरू के साथ अपनी घनिष्ठ मित्रता तक कुर्बान कर दी.

शेख के बुरे दिनों में साराभाई ने उनके परिवार पर दोनों हाथों से दौलत लुटाई. नेहरू की वह कोपभाजन बनी और कई साल तक वह जेल में भी बंद रहीं. कहा जाता है कि किसी जमाने में मृदुला साराभाई नेहरू के बेहद करीब थीं.

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