क्यों हम भ्रष्टाचार के चक्र से बाहर नहीं निकल पाते?

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लिखे लेख पर और जिन मित्रों ने उसे शेयर किया, उसपर कई कमेंट आये. उन कमेंट्स को केंद्र में रखते हुए इस मुद्दे को विस्तार देने का प्रयास करते है.

आखिर ऐसा क्यों होता है और क्यों हम भ्रष्टाचार के सर्किल या चक्र से बाहर नहीं निकल पाते?

हमारा अनुभव प्रतिदिन के व्यवहार से – जिसमे प्रत्यक्ष रूप से सरकारी तंत्र उपस्थित नहीं है – से निर्धारित होता है; सरकार तो बाद में आती है.

[भ्रष्टाचार से निकलना चाहते हैं, पर ‘पहले आप, पहले आप’ के चक्कर में फंसे हैं हम]

उदहारण के लिए, सब्जी-फल खरीदना, जिसमे काँटा मार दिया जाता है या सड़े-गले फल पकड़ा दिए जाए, टैक्सी या ऑटो मीटर से ना चले, कुली चौगुने पैसे मांगे…

या फिर प्राइवेट डॉक्टर जानबूझकर महंगा इलाज करे, दो वकील आपस में मिलकर क्लायंट को बेवक़ूफ़ बनाये, ज्वेलर 22 कैरट का कहकर 14 कैरट का सोना पकड़ाए…

या हलवाई मिठाई डब्बे के साथ तौल दे या मिठाई में रंग मिला दे, इत्यादि. ऐसे अनेक उदाहरण है, जिसमें सतही रूप से सरकार का कोई रोल नहीं है.

लेकिन फिर भी इन सभी भ्रष्टाचार में सरकार का ही रोल है जो अप्रत्यक्ष है, सामने दिखाई नहीं देता.

उदहारण के लिए, लखनऊ के गोमती नगर का विपुल खंड कमर्शियल है. केवल दूकान या ऑफिस की बिल्डिंग बनायी जा सकती है.

लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) इन बिल्डिंग्स में बेसमेंट बनाने की अनुमति नहीं देता है, लेकिन फिर भी सभी प्लाट पर एक-एक कमर्शियल बिल्डिंग में बेसमेंट बना है जिसके लिए LDA को दो लाख रुपये की घूस दी गयी होगी.

फिर हर वर्ष LDA का बाबू, बिजली और सेल्स टैक्स (अब GST) वाला उस गैरकानूनी बेसमेंट के लिए घूस मांगने आ जाता है, जो उन्हें देना पड़ता है.

अब बिजनेसमैन को पता है कि बेसमेंट अवैध है, लेकिन वह तब भी कुछ अधिक लाभ के लालच में बनवाता है.

और उस एक ग़ैरक़ानूनी हरकत के कारण उसे हर वर्ष घूस देनी पड़ती है जिसे वह ग्राहकों से बिना बिल और सरकार को बिना टैक्स दिए वसूलना चाहता है.

उस ग़ैरक़ानूनी कार्य – बिना बिल के माल बेचने – की कीमत पुनः घूस देकर चुकानी होती है. लेकिन इस प्रक्रिया का लाभ ऑनलाइन वाले उद्यमी उठा ले जाते है क्योकि उनका हर लेन-देन क़ानूनी होता है.

इलाहबाद के चौक, लखनऊ के अमीनाबाद, गोमती नगर इत्यादि में दुकानदार, सब्जी वाला इत्यादि पब्लिक स्पेस जैसे कि कॉरिडोर, फुटपाथ का अतिक्रमण -, जैसे कि माल को दूकान की चौखट के आगे तक फैलाना – कर के बैठे है, जिसकी सज़ा उन्हें पुलिस, नगर निगम और टैक्स वालों को घूस देकर चुकानी पड़ती है.

परिणाम क्या होता है? हम सरकार को भ्रष्टाचार के लिए दोष देते है, भ्रष्टाचार समाप्त ना होने का रोना रोते है, लेकिन स्वयं अपने व्यवहार को सुधारने का प्रयास नहीं करते.

अगर किसी के साथ भी एन्टी करप्शन टीम कर दी जाए तो शाम तक वह व्यक्ति 100 भ्रष्टाचार पकड़वा देंगे. इसमें कोई संदेह नहीं.

लेकिन उसके बाद क्या होगा? अगले दिन यही व्यक्ति अपनी टीम के साथ स्वयं वसूली शुरू कर देगा.

क्या वह व्यक्ति अपनी टीम के साथ विपुल खंड के दुकानदारों को बोलेगा कि अपना बेसमेंट तुड़वाओ या उसमे सीमेंट भरवाओ? या दुकानदारों को अतिक्रमण हटाने की सलाह देगा?

सरकार को उसके काम-काज के लिए दोष दीजिये. लेकिन आप का उस भ्रष्टाचार में स्वयं क्या रोल है, कभी उस पर भी शांत मन से विचार कीजिये.

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