काँग्रेस के हाथों में खेल रहे हैं गर्म दूध पीकर मुंह जलाने वाले राष्ट्रवादी

इंटरमीडिएट की कक्षाओं में अंग्रेजी विषय में हम लोगों को एक पाठ पढ़ाया जाता था. पाठ दरअसल वर्जिनिया में जन्में अफ्रीकी-अमेरीकी मूल के लेखक, समाजसुधारक, राजनीतिज्ञ और 1890 से 1915 तक अमेरीकी राष्ट्रपति के सलाहकार रहे बुकर टी. वॉशिंगटन की जीवनी से लिया गया एक भाग था जो ‘माय स्ट्रगल फॉर एन एजूकेशन’ नाम के शीर्षक से पढ़ाया जाता था.

इस पाठ में लेखक के हवाले से बताया गया था कि अश्वेत होने के कारण उसे सामान्य विद्यालयों में दाखिला नहीं मिल सकता था.

तभी उसे कोयले की खदान में काम करते समय कुछ दोस्तों द्वारा एक ऐसे विद्यालय के बारे में पता चला जहां अश्वेतों के भी दाखिले की व्यवस्था थी.

फिर विपरीत परिस्थितियों और कमजोर आर्थिक स्थिति को दरकिनार करते हुये बुकर साहब बड़े परिश्रम से अपने घर से 500 मील दूर स्थित हैम्टन नार्मल एंड एग्रीकल्चरल इंस्टिट्यूट पहुँच गये.

इतनी दूर पंहुचने और अश्वेत होने के बावजूद भी उन्हें वहां तत्काल दाखिला नहीं मिला. जबकि उनके सामने ही स्कूल की प्रधानाध्यापिका अन्य लोगों को दाखिला दे रही थीं.

बुकर के मन में बेचैनी थी, लेकिन फिर भी वह निराश नहीं हुये. इसके बाद दाखिले की बात को दरकिनार करते हुये प्रधानाध्यापिका ने सीधे तौर पर बुकर से कहा कि “बगल के संगीत-कक्ष में बहुत गंदगी हो गयी है, जाकर उसे साफ करो. ”

अश्वेतों के लिये स्कूल, सारा प्रबंधन अश्वेतों के हाथ में, बाकी अन्य अश्वेतों का दाखिला हो रहा हो, और किसी एक को दाखिला देने के बजाय यह कह दिया जाय कि जाओ बगल वाले कमरे की सफाई करो, आप अंदाजा लगा सकते हैं उसकी मन:स्थिति क्या हो सकती है.

वर्तमान भारत के परिदृश्य के लिहाज से देखा जाय तब तो इतने पर पूरे देश में भूकंप ही आ जायेगा. लेकिन बुकर ने आगे-पीछे कुछ नहीं सोचा और तुरंत झाड़ू पोछा उठाकर कमरे की सफाई में जुट गये.

कमरा साफ हो जाने पर जब प्रधानाध्यापिका ने आकर चेक किया और उसे कमरे के किसी कोने में खोजने से भी गंदगी और धूल का एक कण भी नहीं मिला तो वह बहुत खुश हुईं.

उन्होंने बुकर को बताया कि वह अपनी पहली परीक्षा में पास हो चुके हैं तथा उन्हें अब वहां दाखिला मिल जायेगा. इसके बाद बुकर इतने खुश हुये कि उसका वर्णन शायद वह शब्दों में भी नहीं कर पाये.

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया में रामदेव को लेकर बहुत कुछ लिखा जा रहा है. भाषा का स्तर ऐसा कि रामदेव इन सबकी भैंस खोल ले गये हों.

वास्तव में कुछ खलिहर तो बस एक मौका खोज रहे थे कि कहीं से कुछ सुगबुगाहट हो और वह रामदेव पर लाठी बरसाना शुरू करें. हरियाणा में तो उनके पुतले फूंके जाने की भी खबर आ रही है.

लेकिन क्यों?

इसके जवाब में बताया जा रहा है कि डिस्कवरी के नये चैनल ‘जीत’ पर आ रहे रामदेव की जीवनी से प्रभावित धारावाहिक में दिखाया जा रहा है कि रामदेव ब्राह्मणों को गाली दे रहे हैं? तर्क दिया जा रहा है कि उसमें ब्राह्मणों की छवि को गलत तरीके से दिखाया गया है.

जबकि सीरियल में रामदेव के बचपन की कहानी के रुप में शिक्षा के लिये उनके द्वारा किये गये संघर्ष को दिखाया जा रहा है. ठीक वैसा ही संघर्ष जैसा बुकर को अपने समय में झेलना पड़ा था.

यह आज भी जारी है और सिर्फ रामदेव ही नहीं अपितु हम लोगों में से अधिकांश की कहानी है.

मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुये लोगों की बात छोड़ दी जाय तो शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे अपने शिक्षाकाल में विविध प्रकार की परेशानियों से न जूझना पड़ा हो. यह दिक्कतें सिर्फ आर्थिक ही नहीं बल्कि कुछ मामलों में सामाजिक भी होती हैं.

अब अगर आज का कोई व्यक्ति जिसे बचपन में अपने किसी अध्यापक से किसी कारणवश मार खानी पड़ी हो, भविष्य में अपनी बायोपिक जारी करे और उसमें उस घटना का जिक्र करे तो इसका मतलब यह तो नहीं हो सकता कि उस मारने वाले अध्यापक की जाति तत्कालीन समय में बाकी सबको मारती रहती थी.

रामदेव की जीवनी पर आधारित सीरीयल में अध्यापक ब्राह्मण है. चूंकि यह ऐसे समय की कहानी है जिसमें ब्राह्मण का अध्यापक होना कोई आश्चर्य नहीं. वह नये-नये तरीकों से रामदेव को प्रताड़ित करता है.

चूंकि यह रामदेव की कहानी है तो इसमें व्यक्तिवाचक रुप में छात्र रामदेव हैं तो उनका अध्यापक भी सिर्फ एक व्यक्ति ही है. उस व्यक्ति के क्रियाकालापों को सामाजिक चोला पहना देना महज एक चतुराई भरा कृत्य कहा जा सकता है. यह मामला ठीक वैसा ही है जैसा बुकर की अध्यापिका ने उनके साथ किया था.

वैसे छाती कूट रहे लोगों से यह पूछा जा रहा है कि आपने वह सीरियल देखा, तो अधिकांश का जवाब है कि ‘मैंने नहीं देखा लेकिन जिन्होंने देखा है, वे बता रहे हैं.’

किसने देखा है, पता नहीं. क्या देखा है, पता नहीं. वास्तव में वह सीरियल किसी डेलीसोप से अधिक कुछ भी नहीं है. कहानी और दृश्यांकन इस दर्जे के कि कुछ देर देखने पर ही सर दर्द शुरू हो जाय.

फिर नया चैनल और टीआरपी न मिले तो अपने पूरे एपिसोड भी खतम नहीं कर पायेगा. जबकि सोशल मीडिया में जो भी चर्चाएं हैं वैसा वहां कुछ भी नहीं देखने को मिल रहा.

इस लिहाज से तथ्यों पर गौर किया जाय तो दो बातें निकल कर सामने आती हैं. पहली यह कि नये चैनल पर नये सीरियल को टीआरपी दिलवाने के लिये पहले इसे रामदेव के नाम से जोड़ कर भरपूर एड किये गये.

पूरे भव्य रूप में चैनल भी शुरू हुआ. लेकिन जो हवा बनायी गयी थी वह सीरियल शुरू होते ही निकलती दिखने लगी. फिर चैनल की ओर से सोशल मीडिया का एक समूह सक्रिय हुआ…

और रामदेव को लेकर कुछ ऐसी बातें वायरल की जाने लगीं जिनका रामदेव या उस सीरियल से कोई वास्ता ही नहीं था. क्योंकि ब्राह्मणों की जिस बेअदबी की बात बताई जा रही है वह न तो सीरियल में दिखती है और न ही रामदेव के मुंह से कभी सुनी गयी हैं.

रामदेव हमेशा समूचे भारतीयों को ऋषि मुनियों की संतान बताते हैं. राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक के रुप में दिखाई दिये हैं. फिर ऐसी बाते मनगढंत से अधिक कुछ नहीं हैं.

दूसरा तथ्य इसके राजनैतिक पहलू से जुड़ा हुआ है. रामदेव की भाजपा से नजदीकियां छुपी नहीं हैं. उसी तरह रामदेव तथा कांग्रेस के रिश्तों के बारे में भी सबको पता है.

बहुत ज्यादा दिन नहीं बीते जब कांग्रेस के कारण ही रामदेव को एक बार रात को महिलाओं के वस्त्र पहनकर पुलिस से छिपकर अपनी जान बचानी पड़ी थी.

आगामी लोकसभा का चुनाव अब लगभग सिर पर है. ऐसे में सत्ता से बुरी तरह दूर ढकेली जा चुकी कांग्रेस चुनाव जीतने के लिये अपने कुछ पुराने हथकंडे अपनाना शुरु कर चुकी है. वह हथकंडा है जातीय विद्वेष.

सबको पता है कि 2014 में भाजपा की अपार सफलता का राज यह था कि मोदी अपने करिश्माई व्यक्तित्व के बलबूते सभी जातियों को एक करके साथ लाये थे तथा सभी के सहयोग से ही अपार बहुमत पाया था.

कांग्रेस अच्छी तरह से जानती है कि जब तक जातियों के बीच द्वेष न रहे और एक जाति दूसरी जाति से घृणा न करें तब तक उसका सत्ता में वापसी करना मुश्किल है. इस लिये वह सारे जतन कर रही है जिससे जातियों के बीच परस्पर भेद बढ़े.

हरियाणा में जाटों को आगे करके, गुजरात में पटेलों को सामने लाकर और राजस्थान में राजपूतों के बलबूते कांग्रेस इस फार्मूले की सफलता को आजमा चुकी है. लेकिन विभिन्न राज्यों में जातीय द्वेष पैदा करना मुश्किल और थकाऊ काम है.

लिहाजा अबकी बार आम चुनाओं के मद्देनजर कांग्रेस ने एक ऐसा कार्ड खेला है कि पूरे देश में जातियां फिर से अपने पुराने ढर्रे पर लौट आयें और कांग्रेस का काम आसान हो जाए.

इस बात को कहने का कारण यह है कि अभी कुछ दिन पहले ही कांग्रेस के सोशल मीडिया से जुड़े कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुये पार्टी की सोशल मीडिया प्रभारी दिव्य स्पंदना रम्या ने कहा था कि आप लोग चुनाओं के लिये पूरी तरह तैयार हो जाइये. ज्यादा से ज्यादा सोशल मीडिया पर अकाउंट (फर्जी) बनाइये और उनके माध्यम से भाजपा की विचारधारा को मात दीजिये.

ऐसे में आसानी से समझा जा सकता है कि भाजपा को मात देने के लिये कांग्रेस रामदेव का सहारा ले रही है. रामदेव के नाम से अनर्गल बाते कांग्रेस के सोशल मीडिया सेल द्वारा वायरल की जा रही हैं जिनके झांसे में गर्म दूध पीकर मुंह जलाने वाले राष्ट्रवादी भी आ जा रहे हैं.

वास्तव में ब्राह्मणों पर आरोप लगाकर अन्य जातियों (विशेषकर यादव सहित अन्य पिछड़ी जातियों) के बीच अंतर पैदा करने का कांग्रेस का यह कुत्सित प्रयास है. लेकिन अगर बिना कुछ सोचे समझे राष्ट्रवादी लोग भी इसी तरह गरम दूध पीकर मुंह जलाते रहे तो कांग्रेस हमें फिर बांटने में कामयाब हो जायेगी.

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