सांबा : आतंक के साये में गुज़री रात

प्रतीकात्मक चित्र

डर या दहशत की तीव्रता इस बात पर निर्भर करती है कि संभावित खतरा आपसे या आपके परिवार से कितनी दूरी पर मंडरा रहा है?

बात कल रात की… ऐसा नहीं था कि सांबा नगर में आतंकवादियों की घुसपैठ या उन्हें देखे जाने की यह कोई पहली घटना थी.

पिछले चौदह वर्षों के दौरान मैंने बीसियों बार सांबा शहर एवं इसके आसपास के इलाकों में बॉर्डर की बाड़ काटकर या सुरंग बनाकर घुसपैठ या मुठभेड़ की घटनाओं के बारे में जाना है, सुना है, महसूस किया है.

लगभग चार स्क्वायर वर्ग कि.मी. में फैला, सांबा नगर के बीच से होकर गुजरने वाला दिल्ली-जम्मू नेशनल हाईवे और इसी हाइवे के समानांतर दस किलोमीटर दूर से होकर गुजरने वाला LoC की फेंसिंग एवं वहाँ से होने वाली घुसपैठ इस इलाके को संवेदनशील बना देती है.

आमतौर पर शाम होने के बाद ही हम अपने घर को अंदर से कुंडी लगा कर बंद ही रखते हैं… कल रात टीवी पर न्यूज़ के प्राइम टाइम का इंतजार कर रहा था… तभी अचानक बाहर से किसी ने जोर से दरवाजा पीटना शुरू किया और तुरंत खोलने को कहा.

आवाज पहचानी सी लगी, दरवाजा खोला तो भय मिश्रित लड़खड़ाती आवाज में मेरे मकान मालिक के बेटे ने कहा कि दो आतंकवादियों की उपस्थिति हमारे कैंपस में देखी गई है जिन्हें ढूँढने के लिए सेना के जवान नीचे गलियारे में एवं छत पर जा रहे हैं… आप लोग दरवाजा फौरन एवं अच्छी तरह से बंद कर लें, सभी कमरों की लाइटें बुझा दें, ऊँची आवाज में बात भी ना करें… साथ ही यह भी कहा कि ये हिदायतें उसे जवानों ने दी हैं.

इतना कहकर भागते हुए वह सीढ़ियों से उतरने लगा और जाते जाते इतना जरूर कह गया कि हमारा परिवार भी नीचे ही है और हम भी अपने कमरों को अंदर से बंद रखेंगे… और छत पर जो पदचाप सुनाई देंगी वो जवानों की होगी, आतंकवादियों की नहीं… ज्यादा डरने की बात नहीं है बस हिदायतों का पालन करें.

उसकी अंतिम बातें हमारे लिए सुकून देने वाली और खौफ को कुछ हद तक कम करने वाली थी.

आसन्न संकट की कल्पना करते हुए मेरी पत्नी की हालत तो कुछ अच्छी नहीं कही जा सकती थी… भय मिश्रित आक्रोश उसके चेहरे पर साफ दिख रहे थे… वो कभी इस शहर को कोसती तो कभी मेरी नौकरी को.

मैं एक अपराधी की भाँति आश्वासन देता रहा कि कुछ नहीं होगा हमें क्योंकि जवानों की उपस्थिति हमारे लिए सुरक्षा की गारंटी जो थी.

मैं आश्वासन तो देता रहा परंतु मेरे मस्तिष्क के किसी कोने में जो बातें चल रही थी उसके हिसाब से मैं अंदाजा लगा रहा था कि ए.के. 47 रायफल से निकली गोलियों की भेदन क्षमता और हमारे मकान की खिड़कियों के शीशों या दरवाजे में लगी प्लाई की मोटाई की प्रतिरोधक क्षमता के बीच तालमेल तो हरगिज़ नहीं बैठ सकता था…

फिर बुलेट का एंगल कमरे के किस हिस्से में बैठे इंसान को मार सकता है? मैं इसका भी केलकुलेशन करने लगा था… यह भी सुन रखा था कि आजकल तो आतंकवादियों के पास चाइना मेड प्लैटीनम टिप वाली बुलेट्स होती हैं जो जवानों के बुलेट प्रूफ जैकेट तक को भेद देती हैं.

दिल हमारा बैठा जा रहा था पर एक-दूसरे को तसल्ली देने का काम अनवरत जारी रहा. हमें किसी से फोन से बात करने की भी मनाही थी क्योंकि जवानों की उपस्थिति और सर्च ऑपरेशन की लोकेशन के साथ ही अन्य खबरें बाहर नहीं जा पाए यह हिदायत दी जाती है.

कुल मिलाकर यदि कहूँ तो शुरुआती दो घंटे हमने खौफ में ही गुजारे.

समय बीतने के साथ साथ थोड़ी तसल्ली होने लगी थी… इस उम्मीद में कि अब तक तो आतंकवादी निकल चुके होंगे या जवानों की चौकस सतर्कता ने उनके प्लान को धराशायी कर दिया होगा और वे भागने में सफल हो गए होंगे… ऐसी कल्पना करके हम थोड़े सहज भी होते जा रहे थे.

रात तीन बजे सर्च ऑपरेशन खत्म हुआ, आसपास के मकानों की छतों पर पोजिशन लिए जवान अब उतरने लगे. मेरी आँख पता नहीं कब लगी थी पर पत्नी ने मुझे जगाकर कहा कि वे लोग अब जा रहे हैं, हमारी गली से गुजरते हुए और कैंप की ओर जाते हुए जवानों की गतिविधियों का आभास मुझे भी हुआ… अब खतरा टल गया था यह जानकार खुशी हुई.

लाइन ऑफ़ कंट्रोल के साथ के नजदीकी शहरों में इन दिनों हाई अलर्ट रहता है… ऐसे तो सालों भर हाई अलर्ट रहता है परंतु जब घाटी में बर्फबारी की वजह से घुसपैठ के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं तब निचले इलाकों जैसे कठुआ, सांबा, जम्मू, उधमपुर, अखनूर, डोडा, किश्तवाड़ की ओर से घुसपैठ बढ़ जाती है.

कह सकते हैं कि यह मजबूरी में की जाने वाली घुसपैठ होती है क्योंकि घाटी में आतंकवादियों को प्रश्रय देने वाले तमाम लोग हैं जबकि निचले इलाकों यानी कि हिन्दू बहुल इलाकों में सिर्फ गुज्जर समुदाय के मुस्लिमों के द्वारा ही इन्हें प्रश्रय या गाइडेंस मिलती है.

इन गुज्जर मुस्लिमों का इतिहास वैसे तो प्रो-इंडिया ही रहा है परंतु कुछ वर्षों से इन्हें ऐसी गतिविधियों में लिप्त पाया गया है जो भारत विरोधी है… इस परिवर्तन के लिए इनका वहाबी मानसिकता की चपेट में आना ही शायद एकमात्र वजह हो सकती है.

खैर अब हालात सामान्य है, कल मैंने एक अस्थायी पोस्ट डालकर मित्रों को अपने हालात से अवगत कराया था… मेरे बारे में जानकर मेरे मित्रों ने जो शुभेच्छाएँ कल मुझे दीं, उनका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ.

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