हम भी लगे हैं… कभी तो मिलेगी सफलता…

साल भर पहले तक हमने अपने गाँव और उसके इर्द गिर्द गाज़ीपुर जिले में युवाओं को रोज़गार दिलाने के लिए एक अभियान चलाया था. उसमें हम युवकों को L&T कंपनी के इंस्टिट्यूट में ट्रेनिंग के लिए भेजते थे.

कंपनी ने देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे ट्रेनिंग सेंटर खोल रखे हैं जहां वो 90 दिन का कोर्स कराते हैं. रहना, खाना, ट्रेनिंग सब फ्री…

और उसके बाद तुरंत नौकरी भी देते हैं… Construction Engineering के विभिन्न trades जैसे कि mason, welding, Bar Bending, Plumber, Electrician की ट्रेनिंग देते हैं.

नौकरी की शुरुआत 10 या 12 हज़ार रूपए महीने से होती है और 3-4 साल में लड़का 20-25 हज़ार पाने लगता है.

हमने ये मुहिम साल-डेढ़ साल चलाई. दुर्भाग्य से एक भी लड़का ट्रेनिंग लेने या L&T में नौकरी करने नहीं गया.

पहले बैच में 5 लड़कों का तो हमने अपनी जेब से वाराणसी से मुम्बई तक टिकट तक कराया था और रेल मंत्री जी की सोर्स सिफ़ारिश करा के सीट कन्फर्म कराई थी…

बेचारे बच्चे रास्ते मे क्या खाएंगे, ये सोच मैं ढेर सारा सब्जी परांठा ले के स्टेशन पहुंचा. बहुत दु:ख हुआ जब एक भी लड़का स्टेशन पे नहीं पहुंचा.

5 टिकट बर्बाद हुए.

खैर हमने हार नहीं मानी. जयपुर – अहमदाबाद के एक उद्योगपति मित्र ने कहा मेरे पास भेज दो 5-10 लड़के. सबको लगा दूंगा.

इस बार 6 लड़के तैयार किये. एक आया ही नहीं, एक बनारस स्टेशन से वापस भाग आया… 4 जयपुर पहुंचे.

मेरे मित्र ने दो को अहमदाबाद और दो को बीकानेर भेज दिया और इस निर्देश के साथ कि मेरे घर के बच्चे हैं…

अहमदाबाद वाले दोनों पहुंचने के दो घंटे के भीतर भाग आये. बीकानेर वाले 15 दिन रहे और भाग आये.

हम निराश तो हुए पर हार नहीं मानी.

अगला बैच एक ITI कालिज से निकाला. वहां जा के motivate किया, समझाया… उस ITI के संचालक मेरे मित्र हैं.

उनको ये लालच था कि हमारे लड़के अगर L&T जैसे कंपनी में लग जाएं तो नाम होगा… कुल 32 लड़कों ने हामी भरी.

जब जाने की बेला आयी तो 8 ने टिकट के पैसे जमा कराए. 8 टिकट confirm हो गए. पनवेल जाना था.

सिर्फ 4 ने रेल पकड़ी. पनवेल पहुंचे. पनवेल रेलवे स्टेशन से इंस्टिट्यूट 3 किलोमीटर दूर है. वहां जब गेट पे पहुंचे तो एक लड़के ने मुझे फोन कर कहा कि सर यहां बड़ा अजीब सा लग रहा है.

क्या अजीब लग रहा है बे…

सर, चारों ओर जंगल पहाड़ी है…

मैंने कहा कि भाई अंदर तो जाओ…

प्रिंसिपल मेरे फेसबुकिया मित्र थे… उनको फोन किया. वो दौड़े आये. मानों भगवान आये हों…

मैंने उनसे कहा कि इन्हें अंदर ले जाओ… गेस्ट हाउस दिखाओ… एकदम 3 सितारा होटल जैसा है… नाश्ता कराओ…

प्रिंसिपल साहब उनको अंदर ले गए. बोले सामान रखो, fresh हो के पहले नाश्ता करो…

प्रिंसिपल बेचारे मेस में उनको जोहने लगे. जब एक घंटा बीत गया तो वे परेशान हुए. खोजते हुए हॉस्टल गए तो लड़के सामान समेत गायब… चौकीदार बोला कि वो सब तो 20 मिनट बाद ही भाग गए थे.

मुझे कितनी निराशा हुई होगी आप सोच नहीं सकते.

महीने भर बाद मैंने अपने उन ITI वाले मित्र से कारण जानने का प्रयास किया कि आखिर ये सब भागे क्यों?

उन्होंने मुझे बताया कि जब प्रिंसिपल इनको हॉस्टल में छोड़ के चले गए तो वहां एक ट्रेनी इनको मिल गया. वो बोला कहां फंस गए तुम लोग? ई सब सिखा सिखा के और काम करा करा के मुआ देंगे… और ई सब भाग पराए…

अब मैंने अपने उन प्रिंसिपल मित्र को फोन लगाया… कितनी मेहनत कराते हो बे तुम सब ट्रेनिंग में कि लड़के सब भाग जाना चाहते हैं.

वो बोले भैया, ऐसा है कि ये कंस्ट्रक्शन लाइन है… उसमें भी L&T heavy engineering के ठेके लेती है. मेगा प्रोजेक्ट्स… हम Dams, Highways, Bridges, Metro बनाते हैं.

दिन रात काम चलता है 3 शिफ्ट में… नए लड़कों को परिश्रम की आदत तो होती नहीं. सो इस 90 दिन में थोड़ा बहुत परिश्रम करना सिखाते हैं…

उसके बाद साईट पे भेज देते हैं. वहां भी पहले 60 दिन हाथ हल्का ही रखते हैं. जो 60 दिन काट गया फिर उसे काम पे लगाते हैं. मेहनत तो है, पर जो टिक जाता है वो आदमी भी बन जाता है…

मूल समस्या ये है कि परिश्रम कोई नहीं करना चाहता. सबको आराम की सरकारी नौकरी चाहिए.

पूरे दो साल कोशिश करने के बाद भी हम एक भी लड़के को L&T में नहीं भेज पाए.

अब ये स्वरोजगार का भूत फिर सवार हुआ है. अनुमान है कि स्वरोजगार फण्ड में अब तक 60,000 रूपए से ज़्यादा आ चुका है. पर अब तक एक भी भाई ने इसका लाभ उठाने की मंशा नहीं जताई है.

उधर शत्रुघ्न रॉय जी पुणे में लाल कालीन बिछा के जोह रहे हैं कि कोई आएगा तो उसको मैं Chinese बनाना सिखाऊंगा…

उधर लुधियाना से आलोक देव का फोन आया… बोले कि दद्दा बहुत छोटी सी नौकरी करता हूँ पर छोटा सा योगदान देना चाहता हूँ स्वरोजगार फण्ड में… शायद किसी का भला हो जाये…

हम भी लगे हैं… कभी तो मिलेगी सफलता…

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