बाबा तुम बौराओ मत : भाग-2

अपने साबुन तेल मंजन और अन्य उत्पादों की बिक्री के प्रचार के लिए बाबा द्वारा ब्रह्मास्त्र की तरह जिस पंच लाइन का धुआंधार इस्तेमाल किया जाता है, वह पंच लाइन है कि… “विदेशी कंपनियां देश को लूट रही हैं…” आदि आदि…

इस तरह कड़ी प्रतिस्पर्धा की दौड़ से गुणवत्ता के बजाय राष्ट्रवाद को हथकण्डा बनाकर विदेशी कम्पनियों को बाहर करने की शातिर कोशिश बाबा द्वारा की जाती है.

देशी कम्पनियों को प्रतिस्पर्धा से बाहर करने के लिए बाबा द्वारा इस्तेमाल किये जानेवाले प्रचार ब्रह्मास्त्र की पंच लाइन है… “दूसरी कम्पनियां नकली माल बेचकर आपके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही हैं…”

[बाबा तुम बौराओ मत : भाग-1]

आइए जरा देखें जांचें कि बाबा की बात में कितनी ईमानदारी है और कितना दम है.

पहले बात विदेशी कम्पनियों की.

वित्तीय वर्ष 2016-17 से सम्बंधित टाटा ग्रुप द्वारा जारी की गई अपनी वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 6 महाद्वीपों के 150 से अधिक देशों में अपनी व्यवसायिक गतिविधियों के संचालन से टाटा ग्रुप ने लगभग 64.40 अरब डॉलर (लगभग 4 लाख 17 हज़ार 440 करोड़ रुपये) का राजस्व अर्जित किया था.

इसी तरह विदेशों से लगभग सवा तीन लाख करोड़ का राजस्व अर्जित कर टाटा के बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज दूसरे नम्बर पर रही.

इनके अतिरिक्त इन्फोसिस महेन्द्रा समेत छोटी-बड़ी 100 से अधिक ऐसी भारतीय कम्पनियां हैं जो दुनिया भर के विदेशी बाजारों में धूम मचा रही हैं और लाखों करोड़ की विदेशी मुद्रा अर्जित कर भारतीय अर्थव्यवस्था को क्या और कैसी संजीवनी देती हैं यह आसानी से समझा जा सकता है.

इनके अतिरिक्त भारत में कार्यरत सैकड़ों भारतीय आईटी कंपनियों का व्यवसाय विदेशी कम्पनियों के सहारे ही चलता है.

अतः रामदेव की कसौटी के अनुसार क्या यह मान लिया जाए कि टाटा, रिलायंस समेत यह सभी कम्पनियां क्या दुनिया भर के देशों में वहां के लोगों को लूटने का कारोबार कर रही हैं? टाटा ग्रुप क्या अंतरराष्ट्रीय लूट का धंधा करनेवाला लुटेरा बिजनेस ग्रुप है?

उपरोक्त सवालों के अतिरिक्त एक और तथ्य बाबा को समझना होगा. 1980 के बाद देश के ऑटोमोबाइल बाजार में विदेशी कम्पनियों का प्रवेश तेज़ी के साथ होने लगा था.

1991 के उदारीकरण के दौर की शुरुआत के साथ इसकी बाढ़ सी आ गयी थी. लेकिन 1980 के बाद पिछले 37 वर्षों में ट्रक ट्रेक्टर कार मोटरसाइकिल बनाने वॉली दुनिया की हर बड़ी कम्पनी भारत आयी लेकिन आज भी महेन्द्रा के ट्रेक्टर और जीप तथा टाटा के ट्रक/ बस और कारों का वर्चस्व ज्यों का त्यों बना हुआ है.

मारुति भी इसी श्रेणी में आती है. इनको टक्कर देने भारत आईं कई विदेशी कम्पनियों को अपना बोरिया बिस्तर बांधकर वापस जाना पड़ा है. किन्तु अपनी इस सफलता के लिए टाटा, मारुति और महिन्द्रा के मालिकों को आज तक यह प्रचार करते हुए कभी नहीं देखा कि विदेशी कंपनियां देश को लूट रही हैं इसलिए केवल हमारे ट्रक ट्रैक्टर बस कार ही खरीदें.

महानगरों से लेकर गांव की धूल भरी कच्ची सड़कों तक महिन्द्रा की स्कॉर्पियो और टाटा की सफारी का जलवा बरकरार है. TVS हीरो और बजाज की मोटरसाइकिलों की आज भी धूम है.

सिएट जेके और एमआरएफ के टायरों ने अपनी गुणवत्ता से विदेशी टायर कम्पनियों की पैरों तले की जमीन इतनी गर्म कर दी कि वो टिक नहीं पायीं.

यही नहीं छोटे स्तर पर थोड़ी देर से सक्रिय हुए हल्दीराम और बीकानेर के फ़ूड जॉइंट्स ने बहुत कम समय मे मैकडोनाल्ड सरीखों के छक्के छुड़ा दिए हैं.

स्थानीय स्तर पर MDH मसाले वाले बुजुर्ग भी अपने उत्पादों की गुणवत्ता की प्रशंसा और प्रचार स्वयं ही करते हैं लेकिन कभी यह नहीं कहते कि बाकी और कम्पनियां नकली माल बेचकर आपके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही हैं इसलिए केवल हमारे मसाले ही खरीदें.

वैसे तो इस सम्बन्ध में लिखने कहने को बहुत कुछ है लेकिन फिलहाल मैं समझता हूं कि मेरा इतना ही कहना पर्याप्त है. मेरे उपरोक्त सवाल ही बाबा के विदेशी राग को तार-तार कर देते हैं.

5-7 हज़ार के अपने वार्षिक टर्नओवर पर मुदित होकर बाबा जिस यूनीलीवर को हटाने मिटाने का दावा लगातार कर रहे हैं, उस यूनीलीवर का पिछले वर्ष का वार्षिक प्रचार बजट ही 54 हज़ार करोड़ था.

बाबा को यह ध्यान रखना होगा कि वन्देमातरम, भारत माता की जय का नारा भगतसिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्लाह खान ने देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ते हुए फांसी का फंदा चूमते समय लगाया था.

उन अजर अमर बलिदानियों ने तेल साबुन मंजन अचार आटा बेचने का धंधा करने के लिए उपरोक्त पूजनीय नारों का उपयोग कर के राष्ट्रवाद को चौराहे पर नीलाम करने का कुकर्म नहीं किया था.

अतः उपरोक्त नारों की आड़ लेकर अपना तेल साबुन मंजन अचार बेचने बाबा की कोशिशें/ हथकण्डे घृणित हैं, शातिर हैं, सतही हैं, सस्ती हैं और फूहड़ भी हैं.

अन्त में यह उल्लेख भी बहुत जरूरी है कि 32 रू किलो के पतंजलि के आटे से 23 रू किलो वाला वह आटा बहुत बेहतर है जो बनिया बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के मेरे घर पर डोर डिलीवरी कर के पहुंचा जाता है.

दोनों आटे का उपयोग करने के बाद ही मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं. अतः बाबा यह पाखण्ड भी करना बंद कर दें कि पतंजलि गरीबों के लिए सस्ता अनाज बेचती है.

बाबा के उपरोक्त बाजारू राष्ट्रवाद के बाद अगले और अन्तिम लेख में बाबा के विशुद्ध राष्ट्रवाद का विश्लेषण कल.

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