प्राणायाम छोड़ने का अभी भी कोई सवाल नहीं

2004 से टीवी पर ही बाबा रामदेव के पूरक कुम्भक रेचक की अनिवार्यता विहीन सहज प्राणायाम को देख मैं उनको करता चला आ रहा हूँ.

यद्यपि कपालभाति और अनुलोम-विलोम के बावजूद मेरा वज़न बढ़ा तो मैंने हरिद्वार फोन किया… तब आचार्य बालकिशन स्वयं ही फोन उठाते थे.

उन्होंने मुझे प्राणायाम तुरंत बंद करने को कहा लेकिन प्राणायाम की आदत के कारण मैं उसे छोड़ नहीं पाया…

हाँ, मैं इनके द्वारा बताये जाने वाले देशी उपचारों को खुद प्रयोग कर दूसरों को बताता था… लेकिन इनकी दवाओं के बारे में भूले से भी किसी को सलाह नहीं देता था…

दरअसल मैंने इनके स्टोर से पुनर्नवादि मंडूर लिया जो कि सूजन कम करने के कम आता है, लेकिन वो दवा बिलकुल बेअसर रही सो वैद्यनाथ की लेनी पड़ी.

आस्था चैनल रोजाना देखता था लेकिन अनुभव बताने वाले सेशन में बाबा की कोकाकोला की बोतल खोलने जैसी हंसी ने मेरी चिढ़न शुरू कर दी…

लेकिन मैंने प्राणायाम नहीं छोड़ा.

और उन कार्यक्रमों में बाबा किसी मुसलमान को हाथों हाथ लेकर बिछ जाते थे तब तो मुझे उन मुसलमानों के नकली होने का भी शक होता था…

जब बाबा पत्रकार और नेताओं को प्रायोरटी देने की बात खुले आम मंच से स्वीकारते थे तो मुझे बाबा आडम्बरवादी लगने लगे…

अब 2010 के आसपास जब बाबा ने राजनीतिक पार्टी बनाने की बात शुरू की तब तो बाबा से मैं बुरी तरह चिढने लगा…

बाबा मुझे किन्ही जासूसी और थ्रिलर उपन्यासों के प्लाट का हिस्सा नजर आने लगे, मानो वो किसी भी तरह किन्ही गलत तत्वों द्वारा सत्ता पर कब्जा करने का हथियार हों.

प्राणायाम मेरा फिर भी चालू रहा

जून 2011 में आन्दोलन के लिए बाबा दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे, तब कपिल सिब्बल, प्रणव मुखर्जी जी और सुबोधकान्त पहुंचे तो बाबा मुझे पक्के शातिर षड्यंत्रकारी दिखने लगे थे.

लेकिन प्राणायाम फिर भी नहीं छोड़ा.

लेकिन अन्ना-केजरीवाल ने 9 अगस्त 2012 वाले आन्दोलन में बाबा का साथ देने और लेने से इनकार कर दिया तो मेरी सहानुभूति बाबा के साथ जुड़ गयी…

यद्यपि उस आन्दोलन की शुरूआती प्रेस कांफ्रेंस में बाबा के इंदिरा गाँधी की तारीफ करने और अहमदाबाद यात्रा के लिए मोदी जी को नकारने वाली बात से कुछ गुस्सा आया… लेकिन कजरी और अन्ना से चिढ़ के कारण मैं बाबा की सफलता हर कीमत पर चाहता था.

और जब मध्य रात्रि में शासन की तानाशाही के कारण बाबा को अपमानपूर्ण तरीके से पलायन करना पड़ा तो मेरा अंध समर्थन बाबा के साथ जुड़ गया.

प्राणायाम तो मैं करता ही था.

एक बार पुनः बाबा के प्रति मेरी तमाम चिढ़ ताज़ा हो गयीं अक्तूबर 2015 में मैगी के लॉन्च करने के साथ…

एक भगवा संत और योगऋषि जैसे उच्च सिंहासन पर विराजित और स्थापित बाबा के व्यवसायिक अवतार ने मुझे इनके प्रति घृणा से भर दिया…

मैंने तब से इनके प्रति किसी भी दुर्भावना को अभी तक छुपाया नहीं है…

इस बीच यूपी चुनाव की बेला में इनके द्वारा लालू शिवपाल अखिलेश के साथ गलबहियां और ममता को PM पद के योग्य बताने से तो मेरी छठी इन्द्रिय स्वामी रामदेव की नरेंद्र मोदी जी के विकल्प की तैयारी भी अनुभव करने लगी है… इस कारण तो मुझे इससे खूनी नफरत हो गयी है.

हाँ, प्राणायाम छोड़ने का अभी भी कोई सवाल नहीं है.

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