सचिवालय का चपरासी या गांव का सफाईकर्मी बन जाऊंगा पर पकौड़ा नहीं बेचूंगा

हमारे एक मित्र हैं… उच्च शिक्षित बेरोज़गार हैं…

दिल्ली में रह के लंबेsss समय से UPSC… बोले तो IAS की तैयारी कर रहे हैं.

जब दिल्ली आए थे तो एकदम बतिया नेनुआ की माफ़िक़ कोमल थे… छूने भर से त्वचा पे निशान पड़ जाता था…

पर अब लंबे समय तक दिल्ली के प्रदूषण और मुखर्जी नगर की गलियों की खाक छान के रूढ़ नेनुआ हो गए हैं.

मोदी से कुछ ख़फ़ा ख़फ़ा से रहते हैं.

कहते हैं कि मोदिया हमको कलक्टर नहीं बनने दे रहा.

उन्होंने कसम खायी है कि मर जाऊंगा पकौड़ा नहीं बेचूंगा.

बहुत लोग शायद नहीं जानते होंगे कि भारत के गांवों में सफाईकर्मी का भी एक पद होता है और बाकायदे मोटी तनख्वाह मिलती है.

सो हमारे गांव से 4 किलोमीटर दूर एक गांव में एक बाऊ साहब मने ठाकुर साहब की नियुक्ति हो गयी सफाई कर्मी के पद पे.

अब आप ये जान लीजिए कि किस्सा है मुल्लायम जादो की सरकार का… और ऐसी नियुक्तियां कोई मुफ्त में तो मिल नहीं जाती. बहुत मोटी रिश्वत चलती थी.

कितनी मोटी, इसका अंदाज़ा आप इस बात से लगा लीजिये कि गांव में आंगनबाड़ी की कार्यकर्त्री जिसका मानदेय जब 1200 रुपल्ली था तो उसकी नियुक्ति का रेट था डेढ़ लाख रूपए…

सो सफाई कर्मी को तो पूरा वेतन मिलता है, Grade pay… नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया होती है, form भरे जाते हैं, सोर्स सिफारिश खोजी जाती है, चढ़ावा चढ़ाया जाता है…

सो बाऊ साहब की नियुक्ति हो गयी सफाई कर्मी के पद पे… अब ठाकुर लड़का अगर सरकारी नौकर हो तो दहेज में मारुति 800 तो पा ही जाता था उन दिनों (आजकल सफारी, स्कार्पियो)…

तो अपने ठाकुर साहब का बियाह हुआ धूम धाम से… हफ्ते में एक बार जाते थे ड्यूटी पे.

उन्होंने अपने गांव का एक छोकरा सेट कर लिया था, उसी को अपनी मारुति में बैठा के ले जाते थे. वही गांव की गलियों में झाड़ू लगाता और नालियों की सफाई करता.

फिर गांव वालों से विवाद हो गया और वो सब अड़ गए कि ये proxy नौकरी नहीं चलेगी. हम तो अपने गांव की सफाई खुद बाऊ साहब से कराएंगे. खैर, मामला किसी तरह एक स्थानीय माफिया के फोन से सुलटा…

बाऊ साहब ठाठ से नौकरी कर रहे हैं.

उनसे बात करके देखिए. कहते हैं कि पढ़ा लिखा हूँ.

क्यों बेचूं पकौड़ा?

सचिवालय का चपरासी या गांव का सफाईकर्मी बन जाऊंगा पर BTech करके पकौड़ा नही बेचूंगा…

मोदी नौकरी दो या इस्तीफा दो…

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