बाबा तुम बौराओ मत

सबसे पहले बात बाबा को लेकर छिड़े विवाद की… बाबा के सीरियल और ब्राह्मणों को कोसने गरियाने की, तो बाबा के पक्ष और विपक्ष में सोशल मीडिया में उछल कूद रहे दोनों पक्ष यह भलीभांति समझ लें कि दोनों ही झूठ बोल रहे हैं.

पहले बात बाबा पक्ष की. चूंकि ब्राह्मण कुल में जन्मा हूं इसलिए ब्राह्मणों में व्याप्त जातीय दुराग्रहों पूर्वाग्रहों को भी बहुत करीब से देखा और अनुभव किया है. इसलिए दावे के साथ कह सकता हूं कि भारत के किसी भूभाग में, कहीं किसी क्षेत्र में यादव जाति के सामाजिक बहिष्कार तिरस्कार की, उनको अस्पृश्य मानने की कोई परम्परा कभी कहीं नहीं रही. क्योंकि इसके विपरीत उनको भगवान श्रीकृष्ण के वंशजों के तौर पर ही चिन्हित किया जाता रहा है.

बाबा के विपक्ष में आगबबूला हो रहा पक्ष भी यह सत्य स्वीकार कर ले कि यादवों के प्रति अस्पृश्यता के भाव की परम्परा भले ही कभी नहीं रही हो किन्तु एक बहुत बड़े वर्ग के प्रति यह भाव सदियों तक रहा है.

हालांकि आज यह स्थिति बहुत बदल चुकी है. लेकिन फिर भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है. अतः किसी सीरियल में ऐसे किसी प्रसंग को दिखाए जाने पर आगबबूला मत होइए. सच कड़वा होता है, इसलिए निगलना सीखिए.

मेरे अनुसार सोशल मीडिया में आजकल गर्म उपरोक्त जातीय विवाद का जिम्मेदार केवल और केवल बाबा ही है, क्योंकि जो टीवी सीरियल इस विवाद के केंद्र में है उसे बाबा की अधिकृत जीवनी कहा जा रहा है.

बाबा ने इसपर अपनी सहमति दी है. अतः यदि किसी गुमनाम मन्दिर के किसी गुमनाम ब्राह्मण का जातीय दुर्व्यवहार बाबा को आज भी याद है तो बाबा को यह भी याद रखना चाहिए कि राजीव दीक्षित नाम का ही एक ब्राह्मण और भी था जिसने योग की दुनिया से बाहर राजनीतिक सामाजिक आर्थिक विषयों में बाबा को दीक्षित किया था. बाबा को सार्वजनिक रूप से इन विषयों पर मंच प्रदान किया था.

राजीव दीक्षित की मृत्यु हुए लगभग 8 वर्ष हो चुके लेकिन इन 8 वर्षों में बाबा एक भी ऐसा नया राजनीतिक सामाजिक आर्थिक सिद्धांत/ मुद्दा/ जानकारी देश को नहीं दे सके हैं जिसका जिक्र 8 वर्ष पूर्व राजीव दीक्षित ने बहुत विस्तार से नहीं किया हो.

इन मुद्दों पर बाबा का कोई भी भाषण प्रवचन उपदेश सुन लीजिए और फिर यूट्यूब पर ढूंढ लीजिये. उस विषय/ मुद्दे पर वही सब बातें ज्यादा विस्तार से बोलते कहते हुए राजीव दीक्षित आपको दिख जाएंगे, जो बाबा आज और अब कहते हैं.

अब बात बाबा के बौराने की…

सबसे पहले याद दिला दूं कि कुछ समय पूर्व रामदेव ने जब दावा किया था कि “यदि मैं चाहता तो 2014 में खुद प्रधानमंत्री बन सकता था.”, तब मुझे एक बैलगाड़ी के आगे चल रही बिल्ली को हुई गलतफहमी की कहानी बहुत याद आयी थी.

क्योंकि रामलीला मैदान से वृहन्नला वेश में पलायन की अपनी कीर्ति कथा से लदे फंदे रामदेव ने 2012 के विधानसभा चुनाव में लखनऊ में 7-8 हज़ार की क्षमता वाले जिस मैदान में प्रचार सभा की थी वो आधा भी नहीं भरा था.

जिन दो भाजपा प्रत्याशियों के प्रचार के लिए रामदेव ने वो सभा की थी वो दोनों बुरी तरह हारे थे. और जिस कांग्रेस के खिलाफ बाबा ने जमकर आग उगली थी उस कांग्रेस की प्रत्याशी 36 हज़ार वोटों से जीती थी.

अतः 2014 का किंग मेकर होने का नशा रामदेव के सिर से जितनी जल्दी उतर जाए उतना बेहतर होगा.

क्योंकि 2014 का चुनाव अभियान शंकर जी की बारात की तरह थी. जिसमें दूल्हा किसी बाराती के भरोसे नहीं था बल्कि इसके बजाय सारे बाराती ही दूल्हे के भरोसे थे.

रामदेव को कड़वा बहुत लगेगा लेकिन सच तो यह भी है कि 2012 तक पतंजलि की बिक्री का जो आंकड़ा 4-5 सौ करोड़ के बीच झूलता था, वो आज अगर उछलकर 10 हज़ार करोड़ तक पहुंचा है तो इसका सबसे बड़ा कारण 2014 में शंकर जी की बाबरात सरीखे उस चुनावी अभियान में रामदेव का शामिल होना भी था.

अब बात बाबा द्वारा योग का परचम बुलन्द करने की…

नई पीढ़ी को शायद ज्ञात नहीं हो कि… जिस समय रामदेव को कोई जानता नहीं था उसके वर्षों पहले ही ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी ने योग गुरू बीकेएस अय्यंगर को ही योग का प्रतीक मानते हुए अय्यंगर शब्द को ग्रहण कर लिया था और उसके मायने को “योग” लिखा था. ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने उनको यह सम्मान यूं ही नहीं दे दिया था.

सम्पूर्ण विश्व में योग का प्रचार प्रसार कर के योग गुरू बीकेएस अय्यंगर ने दुनिया को योग की महत्ता का ऐसा पाठ पढ़ाया था कि सम्भवतः जब रामदेव का जन्म भी नहीं हुआ उससे काफी पहले बीसवीं सदी के दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संगीतज्ञों में से एक के रूप में प्रसिद्ध विश्व विख्यात वायलिन वादक येहुदी मेनुहिन 1952 में योग गुरू बीकेएस अय्यंगर के शिष्य बन चुके थे.

ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ और बेल्जियम की महारानी समेत जयप्रकाश नारायण और जे कृष्णमूर्ति सरीखे लोग उनके शिष्य बने थे. बाबा को आईना देखना अच्छा लगे ना लगे लेकिन दिखाना जरूरी है.

50-60 साल पहले की उन विश्वविख्यात हस्तियों से लेकर आज के सचिन तेंदुलकर ने भी योग सीखने के लिए बाबा की नहीं बल्कि अय्यंगर जी की ही शरण ली थी. अय्यंगर जी का निधन 2014 में हुआ था. अय्यंगर जी की शिष्य बनी विश्व विख्यात अंतरराष्ट्रीय हस्तियों की सूची बहुत बड़ी है.

रामदेव के जन्म के लगभग साल भर बाद बीकेएस अय्यंगर ने योग पर 1966 में अपनी पहली किताब “लाइट ऑफ योग” लिखी थी. जिसका दुनिया की 17 भाषाओं में अनुवाद हुआ. और पहले साल ही 1966 में वह दुनिया की बेस्ट सेलर किताबों की सूची में स्थान पा गई थी. 1966 से 2005 तक उस सूची में उसका वह स्थान बरकरार रहा था.

बाबा को इस सवाल का जवाब जरूर देना चाहिए कि योग विद्या के प्रचार प्रसार में अद्वितीय अविस्मरणीय योगदान करने वाले योग गुरू बीकेएस अय्यंगर को सम्मान देना तो दूर उनका जिक्र तक रामदेव ने कभी क्यों नहीं किया? क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि योग गुरू बीकेएस अय्यंगर ब्राह्मण थे. क्या रामदेव स्वयं जातिवादी पूर्वाग्रह के विष से संक्रमित नहीं हैं?

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