गुलामी के अवशेषों को संभाल कर रखने वाला देश गोवंश को संभालने में असमर्थ क्यों?

2014 ने हिंदुओं का बड़ा नुकसान कर दिया. नुकसान इसलिए क्योंकि एक आदमी का ईमानदार मूल्यांकन करने की बजाए उसका अंध समर्थन करने के लिए गढ़े गये जाहिलाना तर्कों ने हिंदुत्व से जुड़े कई मुद्दों पर स्थापित दृष्टिकोण का बेड़ा गर्क कर दिया.

दुर्भाग्य से इस काम में फेसबुक के कई बड़े हिंदूवादी लेखक हैं जिनके तर्कों को सुनकर पीड़ा होती है.

ये कहते हैं कि किसान बैलों का क्या करेगा? वो अपनी सीमित आय में दूध न देने वाली गाय को पालने का बोझ क्यों उठाये? वगैरह वगैरह…

अभी कुछ दिन पूर्व मैं सुंदरवन गया था. उसे आप सुंदर वन टाइगर रिज़र्व के नाम से जानते होंगे क्योंकि वहाँ रॉयल बंगाल टाइगर्स संरक्षित हैं.

भारत और बांग्लादेश में विस्तृत सुंदरवन हज़ारों वर्गकिलोमीटर में फैला है और वहां संरक्षित बाघों की संख्या भारतीय सीमा के अंदर 100 भी नहीं है.

उन 100 बाघों के संरक्षण और संवर्धन के लिए सरकार और यूनेस्को के अरबों रुपये हर साल खर्च होते हैं.

शहद, लकड़ी और दूसरी बहुमूल्य वन संपदा को छूना भी सीमित किया गया है क्योंकि इससे बाघों पर खतरा उत्पन्न होता है.

और सुंदरवन अकेला ऐसा नहीं है. भारत में सैकड़ों ऐसे अभयारण्य हैं जहाँ बाघ, शेर, चीतों तथा दूसरे जीव जंतुओं के संरक्षण और संवर्धन की व्यवस्था है और सरकार के बजट का एक बड़ा हिस्सा उसमें जाता है.

अब गोवंश की बात कीजिये. ज्यादा पीछे न जायें तो भी केवल 19वीं सदी में ही हुए विचारकों ने (जो अगले कई सौ सालों पर दूरदृष्टि रखते हुए विचार करते थे) गोवंश संरक्षण की बात क्यों की?

क्या उनको ये नहीं पता था कि आने वाले वक्त में ये बैल वगैरह खेती लायक उपयोगी नहीं रहेंगे क्योंकि इनका स्थान मशीन ले लेंगे?

क्या उनको ये नहीं पता था कि बूढ़ी और लाचार गायों और गोवंशों को कोई क्यों और कैसे पालेगा? पर इसके बाबजूद उन्होनें इसके लिए आवाज़ उठाई कि गोवंश संरक्षित हो.

विवेकानंद, दयानंद, गोलवलकर, गांधी, ठेंगड़ी क्या सब ज़ाहिल थे और आज के ये फ़ेसबुकिये अधिक ज्ञानी हैं?

उन सबने गोवंश संरक्षण की बात इसलिए की क्योंकि गोवंश भारत के सम्मान का परिचायक है. क्योंकि गोवंश संरक्षण का आदेश श्रीराम का था क्योंकि गोवंश पालन का उदाहरण श्री कृष्ण ने दिया था.

क्योंकि राजा दिलीप केवल गाय की रक्षा करने के कारण आजतक अमर हैं. क्योंकि 1857 के संग्राम का बीज इसी गाय के रक्षण में था. क्योंकि कूका आंदोलन के जड़ में भी ये गाय ही थी.

क्योंकि हमारे शास्त्रों ने बिना किसी अगर-मगर के ये कहा था कि जिस भूमि पर गोमाता का क्रंदन होता है वो बर्बाद हो जाती है.

सरकार अगर बाघों, शेरों और दूसरे जानवरों के संरक्षण पर अरबों रुपये और हज़ारों एकड़ जमीन खर्च सकती है तो ऐसी ही कोई योजना गोवंश संरक्षण के लिए भी क्यों न हो?

तुगलक और लोदी के दिये गुलामी के अवशेषों को संभाल कर रखने वाला देश गोवंश को संभालने में असमर्थ क्यों है ये प्रश्न मेरे मन को बड़ा मथता है.

उत्तर मिला वाल्मीकि रामायण में जहां एक प्रभु, भरत से कहते हैं कि तात! तुम तर्कशील और बकवादी विद्वानों से दूर तो रहते हो न? क्योंकि ये लोग अपनी तर्कपूर्ण बातों से तुमको सही बातों की ओर से मोड़ कर गलत बातों की ओर ले जाएंगे.

गोवंश की दुर्दशा अभी और होगी क्योंकि हमारे और आपके बीच भी ऐसे व्यर्थ के बकवादी और बुद्धिजीवी मौजूद हैं जो गाय और गोवंश क्यों कटती रहे इसके लिए स्वयं ही दुनिया को तर्क उपलब्ध करवाते रहते हैं.

कई चीज़ें हैं जिनको आप तर्क और बकवाद से नहीं समझ सकते. सिवाय पवित्र भावना आप उसे नहीं समझ सकते.

याद रखिये आज आपका ये अनर्गल प्रलाप गोवंश के लिए है, कल राममंदिर, गंगा और दूसरी चीजों के लिए भी हो सकती है और फिर विनाश के आखिरी मरहले पर खड़े हम लोगों को कोई भी नहीं बचा सकता… कोई भी नहीं.

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