इस लोकतंत्र में 24 कैरट के नायकों के लिए कोई स्थान नहीं

एषणा तीन प्रकार की होती है – पुत्रेषणा, धनेषणा और लोकेषणा. इन तीन एषणाओं में से सबसे तीव्र और कठिन होती है – लोकेषणा.

निम्न कोटि के लोग तो पुत्रेषणा और धनेषणा से ही मुक्ति नहीं पाते और पागल बेटे को प्रधानमंत्री बनाने के लिए 2G जैसे घोटालों और देश की अष्टधातु की मूर्तियां विदेश में बिकवा कर कमाई हुई संपत्ति से अपने पाले हुए कुत्तों का भरण पोषण करते हैं जो लोकतंत्र में उनके लिए माहौल तैयार करते हैं. बहुत से बुद्धिजीवी उनके पाखंडी जाल में फंस भी जाते हैं.

बाकी लोग पुत्रेषणा और धनेषणा की उपलब्धि के उपरांत लोकेषणा के शिकार हो जाते हैं और कटोरा लेकर आज इस दरवाजे तो कल उस दरवाजे पर एमएलए और एमपी के टिकट की भीख मांगते नजर आते हैं.

एक तीसरे किस्म के लोग होते हैं जिन्होंने पुत्रेषणा और धनेषणा को न साध्य बनाया, न साधन, परंतु लोकेषणा से मुक्त नहीं हो पाए.

बुद्धिवीरों के आंकलन के अनुसार इस श्रेणी में अटल जी और मोदी जी आते हैं जो कि लोकेषणा की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि के बाद भी नोबेल पुरस्कार की अभिलाषा के कारण अपने एजेंडे में, सत्तासीन होने के बाद थोड़ी बहुत, समयानुकूल और विश्व परिवेशानुकूल बदलाव कर देते हैं.

चौथी किस्म के लोग होते हैं जो इन तीनों से स्वयं को विमुक्त कर लेते हैं – सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे लोग, जिनके लिए राष्ट्र और धर्म सर्वप्रथम हो जाता है.

बाबा रामदेव तीसरी किस्म के जीव हैं. लोकेषणा के कारण राजा त्रिशंकु बन गए हैं, जिनको विश्वामित्र ने सशरीर स्वर्ग भेजने की कोशिश की थी. लेकिन क्या हश्र हुआ ये देखने वाली चीज है.

त्रिशंकु की तरह बाबा भी अमर होने के लिए कलयुगी विश्वामित्रों के मायाजाल में फंस गए – टीवी सीरियल के अनपढ़ लुच्चों ने उनको भी अम्बेडकर बनाने की कोशिश की. लेकिन वे यह भूल गए कि गया वो ज़माना, जब ‘प्रिंट इट टू इंप्रिंट इट’ की अफवाह तकनीक से लोग भगवान बना दिए जाते थे.

सोशल मीडिया तनख्वाह नहीं देती किसी को. सो कोई सोशल मीडिया का पत्रकार किसी के द्वारा फेंके गए हड्डी का भी मोहताज नहीं है. रेल-पेल-बम्बई-मेल कर देगा इन लोकेषणा ग्रस्त नायकों को.

हां लोकतंत्र है, तो इसमें 24 कैरट के नायकों के लिए कोई स्थान नहीं है. ऊपर वर्णित श्रेणियों में से ही भविष्य में चयन करना होगा.

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