ललिता जी की सौदेबाज़ी!

इस हफ्ते अंग्रेजी पत्रिका ‘द वीक’ में एक पत्रकार आर प्रसन्नन ने रफाल पर एक आलेख लिखा मजेदार शीर्षक से, ” Why didn’t Lalitaji haggle over Rafale?”

प्रसन्नन साहब लिखते हैं कि जब एक युवा रक्षा पत्रकार के तौर पर वे 1992 में प्रधानमंत्री नरसिंह राव के साथ फ्रांस की यात्रा पर गए थे तब वहां की सरकार ने भारत को अतिरिक्त मिराज 2000 बेचने का प्रस्ताव रखा था।

प्रसन्नन साहब लिखते हैं कि इस बारे में जब उन्होंने नरसिंह राव के मुख्य सूचना अधिकारी एस. नरेंद्र से पूछा तो उन्होंने कहा, “देखो युवक, भारत के प्रधानमंत्री कोई अरबी शेख नहीं हैं कि उन्हें कोई युद्धक विमान पसंद आ जाए तो तुरंत एक दर्जन खरीद लें।”

अब प्रसन्नन साहब लिखते हैं कि भारत जो भी हथियार खरीदता है उसे दुनियाभर में मान लिया जाता है कि ये सर्वश्रेष्ठ है।

ये बात तो हम भी जानते हैं। पर प्रसन्नन साहब लिखते हैं कि भारत ने सरकारी स्तर पर रफाल सौदा कर मोलभाव करने की ललिता जी की ख्याति को मटियामेट कर दिया है।

ललिता जी के इस फैन प्रसन्नन जी को क्या जरूरत थी कि वो हमारे विवेक को इस तरह चुनौती दें।

हमें पता है कि वायुसेना ने अपनी ख्याति के अनुरूप 523 प्वाइंट का एक फ्रेमवर्क तैयार किया कि विमान में क्या खूबियां होनी चाहिए। यह वो दस्तावेज़ है कि ब्राज़ील और मलेशिया ने सिर्फ इसे हासिल करने के लिए समझौते किए।

फिर सारे विमानों का सघन फील्ड ट्रायल हुआ। आखिर में 31 जनवरी 2012 को काबिलियत और किफायत दोनों आधारों पर रफाल को सर्वश्रेष्ठ विकल्प घोषित किया गया।

ललिता जी ने अब सौदेबाजी शुरू की। वो 2007 की कीमत के हिसाब से 2018 में वहीं सामान खरीदना चाहती थीं और शर्त यह भी थी कि विमान उनके अपने गैराज में बनाया जाए।

हम जानते हैं कि ललिता जी से बात बनी नहीं। अब मुसीबत आन पड़ी कि चोर उचक्के रोज घर में घुसने की धमकी दे रहे हैं तो विमान भी चाहिए।

वायुसेना ने स्पष्ट कर दिया अगर लड़ाई कल शुरू हो गई तो हम ये नहीं कह सकते कि पहले हमें कोई युद्धक विमान खरीद लेने दो, फिर हम मैदान में उतरेंगे।

मांग स्पष्ट थी कि मुकाबले के लिए कुछ चाहिए क्योंकि चीन के पास अब पांचवीं पीढ़ी का युद्धक विमान है।

आखिर में तय हुआ कि आड़े वक्त में ब्रह्मास्त्र के रूप में काम आने के लिए 36 रफाल खरीदेंगे। और वो भी खाली विमान नहीं बल्कि फ्लाई अवे कंडीशन में। यानी पूरे हर्बा हथियार और मिसाइलों के साथ।

ललिता जी और दरबारी बेचैन हैं कि लटकाए रखने की जो प्रतिष्ठा उन्होंने अर्जित की थी, वह मटियामेट हो गई। ललिता जी के दरबारियों ने शायद उन्हें बताया था कि प्लेन के साथ वैपन पैकेज मुफ्त में मिल जाता है और मोटा कमीशन तो अपना हक है ही।

ललिता दरबार को लगता है कि धोखा हो गया। मोदी ने रफाल बनाने वाली कंपनी दस्सो को बाइपास कर सीधे सरकार से प्लेन खरीदने का सौदा कर लिया।

दरबार हमें समझाने पर तुला है माल महंगा है तो इसका मतलब है कि कमीशन खाया गया है। पर वो ये बताने को तैयार नहीं कि जब माल आपको इससे सस्ता मिल रहा था तो आपने सौदा किया क्यों नहीं। क्या कमीशन को लेकर लफड़ा था?

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