भ्रष्ट बैंकिंग प्रणाली के लिये भ्रष्ट निरीक्षण-निगरानी प्रणाली और उच्चाधिकारियों का कुप्रबन्धन जिम्मेवार

  • डॉ अजीत पाण्डेय
    वरिष्ठ बैंक अधिकारी

घोटाले हुए हैं और होते रहेंगे. हमारी अर्थव्यवस्था का ताना-बाना ही कुछ ऐसा बुना हुआ है जहाँ जनता की भागीदारी निर्णायक रोल अदा नहीं कर सकती.

राजनीतिक दलों और पूंजीपतियों की साँठ-गाँठ इंदिरा गांधी के समय से पुष्पित-पल्लवित होती गयी.

पूंजीपति और गुण्डे किसी दलविशेष के गंडाधारी सहयोगी नहीं होते. सत्ता बदलते ही वे भी पाला बदलते हैं.

थोड़ा अन्तर यही है कि पूँजीपति सभी दलों को उनकी हैसियत के हिसाब से चंदा देते हैं ताकि सम्बन्ध बने रहें जबकि गुण्डे अपनी भक्ति ही बदल देते हैं.

पंजाब नेशनल बैंक घोटाला न तो पहला है और न अन्तिम होगा. ऐसे घोटाले लगभग प्रत्येक बैंक शाखा में कम या अधिक मिल जायेंगे – कहीं ट्रैक्टर या वाहन-विक्रेता से साँठ-गाँठ तो कहीं दलालों से. जिसकी जैसी हैसियत, वैसा बड़ा घोटाला.

एक बैंक की शाखा में लगभग 100 ट्रैक्टर लोन जाली भूमि राजस्व रसीदों और स्वामित्व प्रमाणपत्रों पर मिले थे लेकिन कोई कार्रवाई नहीं. नीलाम वाद दायर है जिसमें कोई प्रगति नहीं. अधिकांश राइट ऑफ किये गये, माफ किये गये या एकमुश्त समझौते के अन्तर्गत निपटाये गये. ऐसा ही अन्य व्यावसायिक ऋणों में होता रहा है.

आपको विश्वास नहीं होगा किन्तु सच मानिये कि मेरी भेंट ऐसे-ऐसे ऋणियों से हुई है जिन्हें पता ही नहीं था कि उन्हें ऋण किस बैंक की किस शाखा से मिला है. वे ऋण की किस्तें डीलर के पास जमा करते थे जिन्हें कभी बैंक में जमा किया गया तो कभी नहीं. ये सब दलाली और सुविधा-शुल्क का दुष्परिणाम था.

घोटालों में कार्रवाई के नाम पर वैसे लोगों की बलि ली जाती है जिनका इस मामले में निर्णायक रोल ही नहीं होता.

कार्रवाई तो बैंक के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक तथा उसके अन्य निदेशकों के विरुद्ध होनी चाहिये जो ऐसे ऋण-प्रस्तावों को अपनी स्वीकृति देते हैं. इनकी अनुशंसा निचले अधिकारियों पर दबाव डालकर करायी जाती है.

एक घटना का उल्लेख करना चाहूँगा. मेरे एक मित्र हैं जिनके पास एक बड़े कार विक्रेता का ऋण प्रस्ताव आया. प्रतिभूति के नाम पर जो भूमि दी जा रही थी वह विवादित थी जिसे बैंकिंग शब्दावली में ‘फ्री फ्रॉम ऑल डिफेक्ट्स’ नहीं थी.

जब उस उप प्रबन्धक ने अपनी टिप्पणी में इसका उल्लेख किया तो हंगामा मच गया. कार विक्रेता के एक सम्बन्धी उसी बैंक में एक उच्च पद पर थे. बात उनतक पहुँची

और उसी शाम उस अधिकारी का स्थानांतरण कर दिया गया और एक नये क्षेत्र अधिकारी द्वारा नये सिरे से प्रस्ताव तैयार कराया गया.

कनिष्ठ अधिकारियों को गिरफ्तार करना एक निर्दोष के वध जैसा ही है. निजी क्षेत्र के मालिक, निदेशक आदि तुरंत गिरफ़्तार किये जाते हैं जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में ऐसा प्रायः देखने को नहीं मिलता.

भ्रष्ट बैंकिंग प्रणाली के लिये भ्रष्ट निरीक्षण-निगरानी प्रणाली और उच्चाधिकारियों का कुप्रबन्धन जिम्मेवार हैं. दण्ड इन्हें मिलना चाहिये.

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