वीडियो : सवाल कौन करे और जवाब कौन दे, यह फैसला कोई राहुल गांधी नहीं, देश करेगा

राहुल गांधी की कांग्रेसी ईमानदारी का जिन्न जाग गया है और ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ की कहावत चरितार्थ करते हुए NPA बैंक घोटाले पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली पर सवालों की बौछार कर रहा है.

लेकिन सवाल किसे करना चाहिए.? जवाव किसे देना चाहिए? यह फैसला करने से पहले NPA का खेल समझ लीजिए…

पंजाब नेशनल बैंक के पूर्व निदेशक दिनेश दुबे पिछले 2-3 दिनों से लगभग हर न्यूज़ चैनल पर अपने इंटरव्यू में यह बता चुके हैं कि 14 सितम्बर 2013 को दिल्ली में हुई बैंक की बोर्ड मीटिंग में उन्होंने मेहुल चौकसी की कम्पनी गीतांजलि जैम्स को 1550 करोड़ का कर्ज़ देने का विरोध इसलिए किया था क्योंकि गीतांजलि जैम्स पर पहले से ही 1500 करोड़ का कर्ज था जिसे वो चुका नहीं रही थी.

दिनेश दुबे ने यह भी बताया है कि उनके विरोध के उत्तर में बैंक की CMD ने उनसे कहा था कि गीतांजलि जेम्स को 1550 करोड़ का नया कर्ज इसीलिए दिया जा रहा है ताकि वो 1500 करोड़ का अपना पिछला कर्ज़ चुका दे और शेष 50 करोड़ रुपये से अपना बिजनेस बढ़ाकर कर्ज़ उतारे.

अतः इसी तर्क के साथ दिनेश दुबे के विरोध के बावजूद गीतांजलि जेम्स को 1550 करोड़ रुपये का नया कर्ज़ दे दिया गया था.

दिनेश दुबे यह भी बता चुके हैं कि इस धांधली की शिकायत उन्होंने जब तत्कालीन वित्त सचिव से की थी तो उनसे बताया गया था कि ऊपर वाले भी यही चाहते हैं.

दरअसल दिनेश दुबे के उपरोक्त रहस्योदघाटन ने यूपीए सरकार के उस NPA घोटाले की परतें उखाड़ दी हैं जिसके जरिये देश की आंखों में धूल झोंकी जाती थी.

देश के अरबपति/ खरबपति हज़ारों करोड़ का कर्ज बैंकों से लेकर चुकाते नहीं थी. क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के नियमानुसार जब किसी कर्ज़ की ईएमआई, प्रिंसिपल अमाउंट या इंटरेस्ट (ब्याज) ड्यू डेट के 90 दिन के भीतर नहीं आता है तो उसे NPA की श्रेणी में डाल दिया जाता है.

इसका परिणाम यह होता है कि बैंक का आर्थिक बोझ बहुत बढ़ जाता है. बैंक को उस कर्ज़ वसूली की कानूनी कार्रवाई के लिए बाध्य होना पड़ता है. कर्ज़ लेनेवाला व्यक्ति या कम्पनी ब्लैक लिस्ट हो जाती है. उसे कहीं से भी किसी प्रकार का कर्ज कोई बैंक या अन्य वित्तीय संस्था से नहीं मिल पाता है.

अतः अपनी कृपा के कारण कर्ज़ पाए गीतांजलि जेम्स के मेहुल चौकसी और विजय माल्या सरीखे अपात्र/ कुपात्र व्यक्तियों, उनकी कम्पनियों के कर्ज की रिस्ट्रक्चरिंग(पुनर्गठन) का वह खेल खेला जाता था जिसका जिक्र दिनेश दुबे ने अपने रहस्योदघाटन में किया है.

इस खेल में बैंक का कर्ज नहीं चुका रहे लुटेरे कर्ज़दारों को पिछला कर्ज़ चुकाने के लिए बैंक और कर्ज देते थे. इस कागज़ी कार्रवाई से वो लुटेरा बेईमान कर्जदार NPA और कर्ज उगाही की कानूनी कार्रवाई से बच जाता था. तथा उसको कर्ज़ देने और दिलाने वाले भ्रष्ट सत्ताधीशों तथा बैंक अधिकारियों के चेहरे भी साफ सुथरे और पाक-साफ बने रहते थे.

जबकि वास्तविकता यह होती थी कि बैंकों का भट्ठा बैठा जा रहा था. क्योंकि कर्ज़ के रूप में फंसी उनकी लाखों करोड़ की रकम में से एक भी पैसा उनको वापस तो मिलता नहीं था. केवल कागज़ी कार्रवाई से यह जरूर सिद्ध कर दिया जाता था कि “सबकुछ” ठीक है.

यह स्थिति कितनी खतरनाक होती है, यह इसी बात से समझ लीजिए कि 2014 में सत्ता सम्भालते ही नरेन्द्र मोदी को जब यह भयावह स्थिति पता चली तो उन्होंने भी इस सच्चाई को उस समय उजागर नहीं किया.

सबसे पहले इसका कारण उन्होंने सत्ता संभालने के सवा 2 साल बाद 2 सितम्बर 2016 को बताया था. इसके बाद बीती 7 फरवरी को लोकसभा में बताया था.

नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर के नरेन्द्र मोदी के उन दोनों बयानों को आप सुनिये फिर तय करिये की लाखों करोड़ की बैंक NPA लूट का जिम्मेदार कौन है?

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