एकांत – शोर

शोर का भरोसा न करो.
कान सन्नाटे के ज्यादा शुक्रगुजार होते हैं

बहुत बार भीड़ की सिलवटों में छुपा होता है एक बातूनी एकांत.

उसे उंगलियां छू नहीं पाती, हवा के भी भारी उसके पैर हैं.
उसकी ध्वनियाँ धड़कनों से भी मंद
पर दरवाजे एकदम खुले हुए!

एकांत एक बन रहे पर्वत की देह है.
उबर रही एक नदी.
सांस भरता हुआ समय का एक समुद्र है.

जिसे जल्दी हो, उसे वहाँ नहीं जाना चाहिए.

वहाँ कविताएँ गद्य में बदल जाती है और कहानी काव्यपाठ में.

एकांत की देह से गुजरता हुआ
एक धूमिल बादल अपने रंग वहाँ छोड़ता है.
वहीं से अपने रंग बटोरता है
एक भ्रमित जीवन.

एकांत, भीड़ की चोट का एक मरहम है!

खुले मैदान पर दूर तक बिखरे होते हैं शब्द
पंक्तियाँ, चिड़ियों सी उंगलियों पर आ बैठती हैं

चिड़िया भीड़ का निर्मम तिलिस्म, चुटकियों में तोड़ कर
लौटा लाती हैं
एक आदमी के भीतर का सबसे ‘जायज’ शोर!

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