प्रेम, प्यार और ज़िंदगी

14 फ़रवरी का वैलेंटाइन डे और कुछ करे या न करे लेकिन अतीत को कुरेदने का काम ज़रूर करता है. हुआ यह है कि 14 फ़रवरी को और उसके बाद भी प्रेम और आसक्ति पर कुछ गम्भीर लेख पढ़ें, जो उम्र और अन्य समाजिक बंधनो के परे थी. मैंने उनको पढ़ा भी और जहाँ जो वाजिब लगा, वहां अपनी बात भी कह दी. लेकिन मुझे लग रहा है कि जो मैंने कहा है, वो फिर भी कही अधूरा रह गया है.

कुछ साल पहले जब मै अंग्रेजी में सोचता था और लिखता था तब मैंने एक कहानी लिखी थी. फिर मैंने उस कहानी को एक उपन्यास का रूप देने की वाहियात कोशिश की. मैंने उपन्यास के कुछ पन्ने ज़रूर लिखे लेकिन फिर उसे अपने कम्प्यूटर से ही उड़ा दिया.

शायद मुझ में एक लेखक की कल्पना शक्ति का अभाव था इसलिए जो शब्दों के मायाजाल से लेखनी निकली वो बेहद तकलीफ देह थी और लाख भूल भुलैया में गश्त लगाने के बाद भी, वो असहज रूप से सत्य के करीब थी.

ये प्यार है क्या?

ये कौन सा एहसास है जो लोगो को अंदर से मरने के बाद भी जिन्दा रखता है? क्यों एक उम्र में गुजरी हुयी चांदनी तमाम उम्र कटने के बाद भी आज भी शीतलता देती है? क्यों खोने की रस्म के बाद भी कुछ पाने का ही एहसास बना रहता है? क्यों समाज के बंधनो और मर्यादा के बाद भी ग्लानि नहीं होती?

सवाल बहुत सारे हैं, जवाब भी बहुत सारे होंगे और साथ में सामाजिक मर्यादाओं के पालनहारों के तंज और तिरछी निगाहें भी होंगी, लेकिन मुझे कहना है.

मैंने पाया है कि अपने प्यार पर इख्तियार पाना कुछ नहीं होता बस एक सहेजा हुआ, बेहद खुशनुमा ख्वाब होता है. किसी को प्यार का जिंदगी भर का साथ मिले, यह उतना ही मुमकिन है जितना किसी ख्वाब के सच होने की तामील होती है.

हर मुहब्बत को ये याद रखना चाहिए कि ख्वाब, ख्वाब होते हैं और उसकी नर्सेगिक परिणीति ही टूटना है. उनके टूटने के सच से इंकार करना, कई जिंदगियों को उनके वजूद से ही हिला देती है. जिस से प्यार है उसको पाना प्यार नहीं है, प्यार सिर्फ एक एहसास है किसी को पाने का, एक स्वीकृति है, किसी अपने का पराये होकर भी अपना होने का.

प्रेम एक अनंत यात्रा है, जो ये समझा जाती है कि ये जो जीवन हमें मिला है उसमें सुख, शांति और प्यार मिलना कोई शर्त नहीं होती है. हम इसके हकदार है इसका निर्णय भी हमारे हाथ में नहीं होता है.

इसको स्वार्थहीन होकर प्राप्त करने के लिए जीवन हमें मिला ही नही है. हम सिर्फ प्रयास कर सकते हैं. हम इन तीनों के सिर्फ मूल को समझ सकते हैं. हम इनको अपने अंदर आत्मसात करने के लिए बस सिर्फ अपनी इन्द्रियों को खुला छोड़ सकते हैं.

मेरे लिये प्यार एक वह अदृश्य द्वीप है, जिसकी नक्शे में पहचान तो होती है और उस के साथ उसके तट तक पहुँचने के विपदा भरे मार्ग का भी एहसास होता है लेकिन वो दूसरों के प्रति कर्तव्यों और दायित्वों के कोहरे से घिरा भी होता है. हम सिर्फ अदृश्य शक्तियों के सामने अपने को समर्पण कर के, इस कोहरे के छंटने की अभिलाषा लिये हुये, इस सागर रूपी जीवन में अपनी कश्ती बस, उस द्वीप की ओर खे सकते हैं.

हमारे वातावरण में दूसरों के प्रति कर्तव्य और दायित्व की परिभाषाएं ही समाज में, दूसरों को हमसे स्वार्थ और सुख को जन्म देती है और बिना दूसरों के स्वार्थों और उनके सुख को तिलांजलि दिये हुये, प्यार अपने संकल्पित मुकाम तक नहीं पहुंच पाता है. ये प्यार कुछ नहीं है बस एक नागफनी का जंगल है, जिससे कटते हुये, चुभते हुये, बिना उफ़्फ़ किये, हमे मौन ही निकलना होता है.

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