परम्पराओं का मस्का और आज़ादी का चस्का दोनों का रखें ध्यान

एक पचपन वर्ष की औरत आयी अपने बेटे, बहू और पति के साथ. समस्या थी, सास-बहू की कलह जो अब बहू को अवसाद में डाल रहा था. बेटा एकलौता था और ना तो घर छोड़ माँ से ही अलग हो पा रहा था, ना ही अपनी पत्नी के दुख को सम्भाल पा रहा था. पिता का धैर्य भी अब जवाब दे चुका था.

उस औरत ने बताया कि कैसे बहू ऐसी चीजें करती है जो उनके जमाने में औरतें कभी नहीं किया करती थी. वे तमाम चीजें थी- बहू का जीन्स पहनना, फ़िल्म देखने जाना, ट्रेकिंग ट्रिप बनाना और ऐसी ही एक हजार एक टुच्ची बातें जो दिल्ली में पली-बढ़ी हर सामान्य लड़की करती है.

बेटे पर भी बीवी की ऐसी हर बात को पूरा समर्थन देने का इल्जाम था. पति पर बहू की इन हरक़तों पर ध्यान ना देने का इल्जाम था. अतः पूरा परिवार ही औरत के नजर में दोषी था इस बदले समीकरण के लिये.

बेटे और पिता चाह रहे थे कि दोनों तरफ से कुछ compromise हो जाये तो गाड़ी किसी तरह आगे बढ़, इसीलिये family counselling की मांग की . पर psychologist ने साफ मना कर दिया और बोला अगली बार वह औरत अकेली आएगी.

औरत ने विरोध किया कि हरियाणा से दिल्ली तक उसे अकेले ऐसे-कैसे बुलाया जा सकता है. डॉक्टरी चक्कर में तो साथ होना ही चाहिये लोगों को. वहाँ भी नहीं तो कम से कम कार चलाने के लिए तो पुरुष चाहिए ही होगा. पर Psychologist ने एक नहीं सुनी. हालांकि बेटे को अलग से बता दिया गया था कि अगर माँ का डिसीजन ना बदले, तो वह साथ लेकर आ जाये.

पर वह औरत अकेली आयी. बेटे ने जबरदस्ती भेजा, बस से. दूसरे सेशन में भी सिर्फ मन का गुब्बार निकालती रही. कैसे उनकी जिंदगी सास-ससुर की सेवा में बीती और कैसे अब बहू उसका एक चौथाई भी नहीं करती जितना उन्होंने किया था.

बुढ़ापे में कोई सहारा नहीं है अब उस बेचारी के लिये. फिर उस काउंसलर ने उसे कुछ होमवर्क दिया, अगली बार आने से पहले फ़िल्म देखने जाना, अपने लिये एक मोबाइल खरीदना (उसके पास नहीं था, ना ही उसे जरूरत लगी कभी), और अपने पसंदीदा गानों की एक लिस्ट डाउनलोड करना खुद से.

जब घर पहुंची तो बेटा इस लिस्ट को देखकर चिढ़ गया. उसकी बीवी दुःखी थी और यहाँ psychologist उसकी परम्परावादी घर बैठने वाली मां को फ़िल्म देखने भेज रही थी. पर उसने भी साथ दिया, मन मार कर ही सही. अगले सप्ताह काउंसलिंग के साथ फिर कुछ ऐसे ही होमवर्क मिले. कुछ सेशन बाद परिवार को बुलाया गया. लड़ाइयां अपने आप कम होती जा रही थी.

सास को कई होमवर्क में बहू ने मदद की थी, पुरूषों के पास समय के अभाव की वजह से अगली फ़िल्म दोनों साथ देखने गए थे और काउंसलर के कहे अनुसार पार्लर भी.

हालांकि काउंसलिंग में और भी कई बातें थी, भावनाओं को समझना और उन्हें सम्भालना भी हुआ, पर बदलाव की मुख्य वजह यह थी कि पहली बार यह औरत वो चीजे कर पायी जो उसने अपनी सास की डर से कभी नहीं की थी.

उसकी सास तो मर गयी पर परम्पराओं का जकड़न साथ रहा, अब यही जकड़न वह बहू पर लादना चाहती थी. लेकिन ज्यादा ध्यान से देखे तो दुःख बहू की हरकतों का नहीं था, दुःख था अपनी आजादी ना पाने का.

मां को हमेशा किचन में देखने का आदि बेटा भी कभी नहीं पूछा फ़िल्म देखने चलने के लिये, ना ही पति ने कभी कहा जाओ सहेलियों के साथ कोई ट्रिप बनाओ. और सच कहा जाए तो उस औरत के दिमाग में भी कभी नहीं आया कि उसकी जिंदगी भी किसी अलग गति से अलग रास्ते पर चल सकती है.

पर जब एक बार वह अपनी आजादी पाने लगी तो बहू की आजादी देखकर बुरा लगना भी बंद हो गया. काउंसलर ने सास-बहू के समीकरण के बजाय सास की जिंदगी पर ध्यान दिया, उसकी हॉबी ढूंढी, उसके सपनों पर बात की.

पर ऐसी कहानियाँ तो हर घर में है. अक्सर जब हम पुरानी पीढ़ी के कठोरता की शिकायत करते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि यह वह पीढ़ी थी जिसके अस्तित्व की रचना ही मानो जिम्मेदारी निभाने के लिये हुई. हम चाहते हैं वो हमारी आज़ादी समझे पर कभी कोशिश नहीं करते उन्हें ज्यादा आज़ाद करने की. पर कोई इंसान जो हमेशा अपने सपनों से समझौता करता रहा हो, उसे दूसरे की आज़ादी भी क्यों अच्छी लगेगी??

इसीलिये बेहतर है, नयी पीढ़ी को समझौता करने के बजाय पुरानी पीढ़ी की कुछ जिम्मेदारियाँ छीन लेनी चाहिये, उन्हें भी आजाद कर देना चाहिये.

इन दिनों वह औरत बहू के साथ शिमला जाने के प्लान को लेकर बहुत excited है और काउंसलर उसके व्हाट्सएप मैसेज से परेशान.

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