ओढ़ावणी प्रथा : दहेज़ जैसा समाज का एक और कोढ़

ओढ़ावणी प्रथा दहेज प्रथा का ही एक विकृत रूप है. ये प्रथा राजस्थान में व्यापक रूप से फैली है. अन्य राज्यों की मुझे जानकारी नहीं.

मृत्यु के बाद तेरहवीं का आयोजन होता है. तेरहवीं वाले दिन राजस्थान में ओढ़ावणी प्रथा होती है. जिस महिला/पुरुष की मृत्यु होती है उसके बेटों पोतों के ससुराल वाले आते है. पुरुष की मृत्यु में उसके भाइयों के ससुराल वाले भी आते हैं. महिला की मृत्यु में उसके देवर जेठों के ससुराल वाले भी तेरहवीं के दिन आते हैं.

अब आगे की प्रथा समझिए…

देवर जेठ भाई भतीजा बेटों पोतों के ससुराल वाले ओढ़ावणी ले के आते है जिनको ओढ़ावणी शब्द समझ नहीं आ रहा है वो इसे दहेज जैसा ही कुछ पढ़ें/समझे.

सगे सम्बन्धी लाखों हजारों की ओढ़ावणी लाते हैं. हजारों लाखों नगद, कपड़े लत्ते बेस (साड़ियां) अपने बेटी दामाद के लिए चैन अंगूठी आदि स्वर्णाभूषण. बेटी के ससुराल वाले तमाम लोगों को नगद रुपयों का लिफाफा, सूट सफारी का कपड़ा… मन्ने एक ओढ़ावणी 50 हजार से 5 लाख की भरी जाती है. 11 लाख की ओढ़ावणी भी मैंने देखी है.

मेरी शादी के बाद मेरे एक बाबोसा (ताऊ जी) …. दो ताई जी …. एक बुआ का स्वर्गवास हुआ है …. पिछले 10 सालों में मेरे ससुर जी मेरे चार बड़ी ओढ़ावणी ले के आये हैं जबकि मेरे ससुर जी के मेरी पत्नी के अलावा तीन बेटियां और है. 3 पोतियां (मेरे साले की बेटियां) भी है जिनकी भविष्य में शादी होनी है. यानी मेरा इकलौता साला ज़िंदगी भर अपनी 4 बहनों 3 बेटियों की ओढ़ावणी ही करता रहेगा.

एक बाप अपनी बेटी की शादी में लाखों खर्च करता है. टैंट बैंड मंडप डेकोरेशन लाइट साज-सज़्ज़ा मान-मनुहार पर लाखों का खर्चा. फिर बेटी को लाखों का दहेज अलग से.

अब बेटी की दादी सास मरेगी, दादा ससुर मरेगा, बुआ सास ससुर मरेंगे, ताया चाचा सास ससुर मरेंगे, परिवार के अन्य सदस्य मरेंगे, वो बेचारा बेटी का बाप और भाई ज़िंदगी भर ओढ़ावणी ही करते फिरते हैं.

लाखों की ओढ़ावणी

ओढ़ावणी प्रथा समाज का कोढ़ है, कलंक है. हालांकि मेरे बहन भी नहीं है ना बेटी है सिर्फ मेरे दो बेटे हैं. फिर भी मैं ओढ़ावणी प्रथा का विरोध करता हूँ. ओढ़ावणी प्रथा अब बन्द होनी ही चाहिए.

  • रितेश प्रज्ञांश

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