मोदी की पाठशाला : हम बच्चों से जब उम्मीद करते हैं तो वो दोगुनी उम्मीद के साथ हमें देखते हैं

ये गौरी के 6th std की बात है. half yearly एग्जाम के रिजल्ट की PTM थी. मैं किनारे बैठ उसकी कॉपी चेक कर रही थी गौरी भी साथ थी उस समय जो पेरेंट्स मिल रहे थे क्लास टीचर उनका हुलिया सुनिए-

माँ ने ब्लैक लैस वाली रेड बॉर्डर की साड़ी पहनी थी डीप बैक और फ्रंट नैक के साथ पीछे बाँधने वाली डोरी भी लगी थी. हाथों में 2 दर्ज़न से ज्यादा मैचिंग की चूड़ियां, लिपस्टिक खूब डार्क शेड की जैसे उसी दिन पूरी खत्म की हो, माथे पर परिवार नियोजन के सिंबल वाला त्रिभुज निशान का सिंदूर, गले में पाव किलो का मंगल सूत्र तो दूसरी तरफ पिता बस सो के चले आये हों.

लड़की को मैं आते जाते देखती थी चुप रहने वाली सीधी लड़की गौरी ने भी यही बताया. एग्जाम में श्याद मार्क्स कम आये इसीलिए टीचर ने थोड़ा और मेहनत करने की बात माता पिता से कही ….बस फिर क्या कहना माँ ने बच्ची पर थप्पड़ों की बरसात कर दी.

उसके साथ चोटी भी पकड़ कर मारा टीचर ने डाँटा तब भी हल्का फुल्का मारना शुरू था. माँ की न भाषा सही, न ही बच्ची पर लग रहे आरोप … “और देख टीवी और खेल ….मास्टर की भी खबर लूंगी क्या पढ़ाता है”

हद है मुझे ये शर्म आयी कि बच्ची से इतनी उम्मीदें, इतने बदलाव चाहिए और खुद 1% भी बदली है माँ हो कर …..हम बच्चों से जब उम्मीद करते हैं तो वो दोगुनी उम्मीद के साथ हमें देखते हैं. उम्मीदों और बदलाव का संतुलन ही माता पिता के बीच की संयोजक कड़ी और बच्चों का भविष्य होता है.

मोदीजी बस मार्गदर्शन का और इसी समझ का हाथ बच्चों की तरफ बढ़ा रहे हैं उनका मजाक उड़ाना या बेवकूफी भरे सवाल उठाना सिर्फ आपकी कुंठा होगी …..अगर आज आप नहीं समझेंगे बच्चों की मन:स्थिति को, तो तैयार रहिये अपने बच्चों को खोने के लिए या खुद के बुढ़ापे को अकेले जीने के लिए.

– अमृता गुलज़ार अय्यर

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