सामाजिक दबाव में किये गए हैसियत से बड़े मृत्यु भोज का करें विरोध

मैंने अब तक तीन ऐसे मृत्यु भोज अटेंड किये है जिसमें किसी की मृत्यु हुई ही नहीं है लेकिन मृत्यु भोज का आयोजन होता है. राजस्थान में मृत्यु भोज को ओसर एवं बरसी को मोसर बोला जाता है.

इंसान जब 80-90 वर्ष का हो जाता है नाती नातिन पोते पोतियां देख लेता है उनकी शादी बाल बच्चे देख लेता है तब उसकी चाह होती है कि मैं अपना मृत्यु भोज भी खुद की आंखों से देखूं. खुद के हाथों से अपना ब्रह्मभोज मृत्यु भोज करूँ. पुण्य अर्जित करूँ.

हालांकि ऐसा आयोजन बहुत कम होता है लेकिन होता है. मैंने तीन ऐसे आयोजन अटेंड किये हैं. व्यक्ति के जीवित रहते के मृत्यु भोज के एक आयोजन तो बुजुर्ग दम्पति ने सामूहिक किया था पति पत्नी दोनों का.

ये एक उत्सव जैसा आयोजन होता है. डालडा घी का नाम-ओ-निशान नहीं होता है. बाकायदा एक या एक से ज्यादा ट्रॉली भर के देशी घी के कनस्तर आते हैं. मिठाइयां तो मिठाइयां पूडियां तक देशी घी में निकलती है.

लड्डू बूंदी खुरमा चूरमा हलवा पूड़ी सब देशी घी में. तमाम बहन बेटियों को सगे सम्बन्धियों न्यात(जाती) बिरादरी समाज को आमंत्रित किया जाता है. आसपास के गांवों ढाणियों तक को आमंत्रित किया जाता है. ब्राह्मणों को आमंत्रित किया जाता है. दक्षिणा दी जाती है. बहन बेटियों को हजारों लाखों की सिख दी जाती है. 500 से 2 या 3 हजार व्यक्तियों का भोज होता है.

अब मृत्यु भोज का दूसरा स्वरूप देखिये.

मृत्यु भोज हर आयु वर्ग के मृतक का होता है किंतु 80-90 वर्ष का बुजुर्ग भरा पूरा परिवार नाती नातिन पोते पोतियां पड़-पोते पड़-पोतियां छोड़ के मरता है. उसकी शव यात्रा बाजे-गाजे भजन-कीर्तन से निकाली जाती है. 12 दिन घर की बैठक में आसपास दूर-दराज के सगे सम्बन्धी रिश्तेदार मोखाण (बैठक में) आते हैं तो उनका मीठा भोजन (घर पे बने मीठे पकवान यथा लापसी गुड़ के चावल) खिलाये जाते हैं. फिर तेरहवीं पे विशाल भव्य वृहद मृत्यु भोज किया जाता है. ब्रह्मभोज भी किया जाता है.

अब मृत्यु भोज का एक अन्य और स्वरूप देखिये.

फलाने के पिता की मृत्यु 20 वर्ष पूर्व हुई तब किसी कारणवश वो मृत्यु भोज नहीं कर पाया. 20 वर्ष बाद फलाना मां की मृत्यु पर जब मृत्यु भोज करता है तो समाज के परिवार के जाती के ठेकेदार आते हैं. कहते है 20 वर्ष पहले का पिता का बकाया मृत्यु भोज करो पहले. फिर मां का मृत्यु भोज करो. सामाजिक पारिवारिक दबाव बनाया जाता है. मृत्यु भोज में फलाने के ट्रेक्टर जमीनें खेत तक बिक जाते हैं. बर्तन भांडे गुदड़े तक बिक जाते हैं. कर्जा हो जाता है.

मैं इस प्रकार के मृत्यु भोज एवं कर्म-कांडो का विरोध करता हूँ. ये सब बन्द होना चाहिए. अधिकांशतः बन्द भी हुए हैं. समाज लोग परिवार जागरूक हुए हैं. लेकिन ब्रह्मभोज का प्रावधान हिन्दू धर्म शास्त्रों में भी है.

अधिकांशतः लोग मृत्यु भोज एवं ब्रह्मभोज को एक ही समझते हैं. हाँ मैं उस मृत्यु भोज का समर्थक हूं. जो मृत्यु भोज स्वेच्छिक हो, अपनी श्रद्धानुसार हैसियत अनुसार हो. वैकल्पिक हो ना कि कम्पलसरी हो.

सामाजिक दबाव में किये गए हैसियत से बड़े कम्पलसरी मृत्यु भोज का मैं विरोधी हूँ !!!!

– रितेश प्रज्ञांश

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