पीएनबी घोटाले-लूट का ज़िम्मेदार कौन? जवाब तो मनमोहन और कांग्रेस को देना होगा

अपनी बात शुरू करने से पहले स्पष्ट कर दूं कि केवल भारत ही नहीं पूरी दुनिया के शीर्ष रईसों की सम्पत्ति का वार्षिक लेखा-जोखा विश्व विख्यात पत्रिका फोर्ब्स प्रतिवर्ष प्रकाशित करती है. फोर्ब्स के आंकड़े समस्त विश्व में सर्वमान्य सर्वस्वीकृत होते हैं.

अब बात नीरव मोदी द्वारा बैंक-घोटाला लूट मुद्दे की…

2008 में एक मित्र के अनुरोध और सहयोग से महिलाओं के कान के डिज़ाइनर बुन्दे बनाकर बेचने से ज्वेलरी के अपने धन्धे की शुरुआत करनेवाले नीरव मोदी ने 2010 में ज्वैलरी के अपने धन्धे की विधिवत शुरुआत की थी.

और जेट गति से दौलत की सीढ़ियां चढ़ते हुए केवल 3 साल बाद 2013 में नीरव मोदी भारत के शीर्ष 100 अरबपतियों की सूची में दाखिल हो गया.

तूफानी रफ्तार से भारत के शीर्ष 100 अरबपतियों के बिलियनर्स क्लब में शामिल होने की स्तब्धकारी सनसनीखेज़ उपलब्धि नीरव मोदी ने अपनी व्यसायिक दक्षता और परिश्रम से नहीं प्राप्त की थी.

इसके बजाय उसने उपरोक्त सफलता बैंकों के साथ वह धोखाधड़ी जालसाज़ी कर के प्राप्त की थी, जिसका सच आज देश के सामने उजागर हुआ है.

उल्लेखनीय है कि 2013 में भारत के शीर्ष सौ अरबपतियों की फोर्ब्स की सूची में नीरव मोदी ने 101 करोड़ डॉलर यानि लगभग 6455 करोड़ रूपये की अपनी सम्पत्ति के साथ धमाकेदार प्रवेश करते हुए फोर्ब्स की सूची में 64वां स्थान प्राप्त किया था.

यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि 2012 में भारत के शीर्ष सौ अरबपतियों की फोर्ब्स की सूची में अन्तिम स्थान (100वां) पाने वाले होटल व्यवसायी पृथ्वीराज सिंह ओबेरॉय की सम्पत्ति 46 करोड़ डॉलर थी. अर्थात उनकी सम्पत्ति लगभग 2940 करोड़ रू थी.

यह तथ्य सबूत है कि 2012 में नीरव मोदी की सम्पत्ति कम से कम 2940 करोड़ रुपयों से भी कम थी. क्योंकि यदि इससे अधिक होती तो 2012 की सूची में उसको स्थान मिलता.

हालांकि यह तो निश्चित है कि 2012 में उसकी सम्पत्ति 2940 करोड़ रू से कम थी. हो सकता है इससे भी बहुत कम रही हो. लेकिन यदि यह ही मान लिया जाए कि 2012 में उसकी सम्पत्ति 2940 करोड़ से कुछ ही कम थी. तो भी यह आंकड़ा चौंकाता है कि 2013 में उसकी सम्पत्ति में अचानक ही लगभग 3500 करोड़ रूपयों की आशातीत वृद्धि हुई और वो 2013 में बढ़कर 6455 करोड़ रूपये हो गयी.

इसके बाद 2014 में भी नीरव मोदी की सम्पत्ति में 51 करोड़ डॉलर (लगभग 3260 करोड़ रूपयों) का प्रचण्ड उछाल आया और वो 152 करोड़ डॉलर(9715 करोड़ रू) की अपनी सम्पत्ति के आंकड़े के साथ भारत के शीर्ष 100 अरबपतियों की फोर्ब्स की सूची में एक स्थान की तरक्की के साथ 63वें स्थान पर पहुंच गया.

यानी केवल 2 वर्षों मेँ उसकी सम्पत्ति में लगभग 6760 करोड़ रूपयों की वृद्धि हुई. हालांकि यह वृद्धि 2012 में उसकी उसकी सम्पत्ति के अधिकतम अनुमानित आंकड़े के अनुसार आंकलित की गई है. (2012 में उसकी सम्पत्ति के वास्तविक आंकड़े के आधार पर यह वृद्धि और अधिक ही निकलेगी.)

अर्थात यूपीए के शासन में 2013 और 2014 में नीरव मोदी की सम्पत्ति में औसतन कम से कम 3380 करोड़ रूपये प्रतिवर्ष की वृद्धि हुईं. 26 मई 2014 को केन्द्र में मोदी सरकार बनने के बाद नीरव मोदी की सम्पत्ति में वृद्धि की रफ्तार क्या रही?

इसका आंकड़ा भी फोर्ब्स द्वारा जारी की गयी 2017 में भारत के शीर्ष 100 अरबपतियों की सूची से मिल जाता है. 2015 से 2017 तक इन तीन वर्षों में नीरव मोदी की सम्पत्ति में केवल 21 करोड़ डॉलर (लगभग 1341 करोड़ रू) की वृद्धि हुई.

इससे संपत्ति 152 करोड़ डॉलर से बढ़कर 173 करोड़ डॉलर (लगभग 11056 करोड़ रूपये) हुई और फोर्ब्स की सूची में वो 63वें स्थान से नीचे खिसक कर 85वें स्थान पर पहुंच गया.

यानि तीन वर्षों में उसकी सम्पत्ति केवल 1341 करोड़ रूपये ही बढ़ी. अर्थात उसकी सम्पत्ति औसतन 447 करोड़ रूपये प्रतिवर्ष बढ़ी.

यहां उल्लेखनीय यह है कि 26 मई 2014 में सरकार बनने के बाद मोदी सरकार ने जुलाई में बजट पेश किया था उसके बाद उसकी गतिविधियां प्रारम्भ हुई थीं. अतः 2014 तो किसी विशेष जांच पड़ताल के बिना ही निकल गया था, क्योंकि सरकार के पास इतना समय ही नहीं था. लेकिन 2015 में सरकार की नीतियों और कार्रवाई का असर दिखा था.

2015 में नीरव मोदी की सम्पत्ति बढ़ने के बजाय 12 करोड़ डॉलर (लगभग 767 करोड़ रू) घट गई थी और 140 करोड़ डॉलर (8947 करोड़) रह गयी थी. किन्तु 2016 में एकबार फिर नीरव मोदी धोखाधड़ी की बाजीगरी करने में सफल हुआ और उसकी सम्पत्ति में 34 करोड़ डॉलर (लगभग 2172 करोड़ रू) की वृद्धि हुई. और उसकी सम्पत्ति बढ़कर 174 करोड़ डॉलर (11120 करोड़ रू) हो गयी.

लेकिन नवम्बर 2016 की नोटबन्दी के बाद 2017 में एकबार फिर उसकी सम्पत्ति में कोई वृद्धि नहीं हुईं. इसके बजाय उसकी सम्पत्ति में 1 करोड़ डॉलर (63.9 करोड़ रू) की कमी आयी और वो घटकर 173 करोड़ डॉलर (11056 करोड़ रू) हो गयी. और 2017 का अंत होते होते उसपर शिकंजा कसता गया. अन्ततः जनवरी 2018 में उसकी धोखाधड़ी जालसाज़ी बैंक घोटाला पकड़ा गया.

अब ज़रा ध्यान दीजिए कि नीरव मोदी ने बैंक घोटाले का खेल यूपीए के शासन में 2011 में शुरू किया. और यूपीए शासन में 2013 और 2014 में उसकी सम्पत्ति में औसतन 3380 करोड़ रूपये प्रतिवर्ष की दर से बढ़ी.

लेकिन 2015, 2016 और 2017 में उसकी सम्पत्ति औसतन 447 करोड़ रूपये प्रतिवर्ष की दर से ही बढ़ी. अर्थात यूपीए शासन की तुलना में मोदी सरकार के शासन में प्रतिवर्ष उसकी सम्पत्ति में वृद्धि की दर में 7.5 गुना से अधिक की कमी आयी.

उल्लेखनीय यह भी है कि नीरव मोदी ने जब अपनी धोखाधड़ी जालसाज़ी की लूटयात्रा प्रारम्भ की तो यूपीए शासनकाल के दो वर्षों के दौरान उसकी सम्पत्ति लगातार 3380 करोड़ रू प्रतिवर्ष की गति से बढ़ती रही.

लेकिन उसके बाद मोदी सरकार के तीन वर्षों के शासनकाल में दो वर्ष तो उसकी सम्पत्ति बढ़ने के बजाय घटी. और केवल एक वर्ष वो सम्भवतः अपनी धोखधड़ी में सफल होकर अपनी सम्पत्ति बढ़ाने में सफल हो पाया. लेकिन उसकी सम्पत्ति की यह वृद्धि यूपीए शासनकाल में उसकी सम्पत्ति में हुई वृद्धि से लगभग सवा हज़ार करोड़ कम ही थी.

क्या नीरव मोदी की सम्पत्ति से सम्बंधित उपरोक्त आंकड़े यह गवाही नहीं दे रहे हैं कि किसके शासन में उसे कैसा संरक्षण दिया गया.

ज्ञात रहे कि मई 2014 में सत्ता संभालने के तत्काल पश्चात 2015 में मोदी सरकार ने बैंकों में व्याप्त भ्रष्टाचार के इस दलदल की सफाई के लिए व्यापक जांच पड़ताल प्रारम्भ की थी.

देश भर में फैली बैंकों की लगभग सवा लाख से अधिक ब्रान्चों की जांच पड़ताल में समय तो लगना था लेकिन परिणाम 2015 से ही मिलना प्रारम्भ हो गए थे.

उस समय बैंक ऑफ बड़ौदा की दिल्ली की एक ब्रांच में कुछ इसी तरह की धोखाधड़ी का एक मामला पकड़ा गया था जिसमें लगभग 6000 करोड़ रू फ़र्ज़ी तरीके से विदेशों में भेजे गए थे. बैंक ऑफ बड़ौदा के AGM समेत कुल 6 लोगों को गिरफ्तार किया गया था.

(डॉलर का मूल्यांकन कल 15 फरवरी 2018 के रेट (63.91 रू) के आधार पर किया गया है.)

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