ज़िंदगी का सबसे यादगार मेला

बात उन दिनों की है जब 2 रूपये की बहुत कीमत होती थी. फिल्म का टिकट मिल जाता था. छोटे छोटे बाजारों से लेकर बड़े बड़े मेलों में “हर माल 2 रुपया” वाली दुकानें सजती थीं.

यही दाम उस समय 250 ग्राम जलेबी या 250 ml गर्म दूध का होता था. मतलब कुल मिलाकर 10 रूपये में मेला घूम लेते थे. बच्चों को मेले में झूलने नहीं बल्कि धक्का मुक्की के मजे लेने जाना ही होता था.

ऐसा ही एक मेला गढ़मुक्तेश्वर में लगता है. गंगा जी के एक ओर हापुड़, गाजियाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर वाले लोग और गंगाजी के दूसरी ओर तिगरी गाँव में बिजनौर, अमरोहा, मुरादाबाद वाले लोगों के डेरे / टेंट लगते थे.

बहुत कुछ बदल गया है. अब अधिकांश लोग व्यस्तता के कारण 2 दिन के लिए जाते हैं. उस समय कम से कम 10 दिन वहीँ रहते थे. दिन भर गाना-बजाना और ताश, रात भर सदर सन्तर/मुख्य मेले की धक्का मुक्की और शॉपिंग.

फुफेरे बड़े भाई के बच्चों का मुंडन होना था. कई परिवार सामूहिक यातायात की व्यवस्था करके एक साथ गए थे. बात 1993 की है. नायक सीधे गंगा मेले में ही पहुंचा था. रात हो चुकी थी.

अगले दिन नायक अपने बड़े फुफेरे भाई के साथ नहाने के लिए गंगा जी जा रहा था. कुछ महीने पहले ही लड़की के परिवार वालों के साथ माँ बाप के ईगो की लड़ाई में रिश्ता टूटा था बेचारे का.

भाई ने पूछा कि अब क्या सोचा है? शादी तो करनी ही है न ? बड़े भाई के सामने आप मजाक में ही कुछ बोलकर टाल सकते हो, सीरियस जवाब तो शायद ही दे सको. वही हाल नायक का था.

इस प्रश्न के लिए वो तैयार ही नहीं था. बात को घुमाना था. सामने से लड़कियों का झुण्ड आ रहा था. नायक ने तपाक से कहा,” हाँ, हाँ, क्यों नहीं ? ये पीले सूट वाली जैसी लड़की मिलेगी तो कभी भी शादी कर लेंगे.” भाई ने कहा कि अगर इसी से करवा दूँ तो?

आप समझ ही गए होंगे नायक की मनोदशा. इतने भोले भी मत बनिए शादी के नाम ही उस उम्र में मुंह में पानी आ जाता है. आपके मुंह में जी लड्डू फूटे थे, वो भी याद कीजिये. हर समय मजाक अच्छा नहीं होता !

नहाकर वापिस आये तो वो पीले सूट वाली लड़की जो अब आगे नायिका कही जाएगी, केश सुखा रही थी. दिमाग को शून्य करके मत पढ़ो भाई! भावनाओं को भी समझो. कलेजे पे सांप लोटने जैसा कुछ हो रहा था.

वहीँ अगल बगल में इस नायक और नायिका के तम्बू थे. एक रात नायिका अपनी बहनों और सखियों के साथ तथा नायक अपने छोटे भाइयों के साथ एक ही ग्रुप में घूमने निकले. अरे ! ऐसे माहौल में, जबकि लड़कियां अपने ग्रुप में हों, कोई धक्का मुक्की करने नहीं जाता. आप भी पहले से ही गलत सलत सोचने बैठ गए !!

शायद ही वो “हर माल 2 रूपये” वाली कोई दुकान ऐसी बची हो, जहाँ इन सबने हाजरी न लगाई हो. उस 16 से 20 साल वाली उम्र के शौक और उर्जा पर भी ध्यान दो. नायक को एक पूरी रात, नायिका को समझने के लिए मिली. सुबह अपने टेंट में आये.

बड़े मजे में एक हफ्ता कटा. नायक नायिका रोज मिलते लेकिन वो साथ घूमने वाला मौका दोबारा न मिला.

समय बीत गया लेकिन अहसास तब हुआ जब विदा होने की बारी आई. दिल में एक अजीब सी कसक थी. एक दुःख सा था, एक अजीब सा दर्द, जिसके बारे में सुना था कि ये लाइलाज होता है. आज उसका अहसास हो रहा था. शायद इसी को कहते होंगे “Love at first sight!”

उस समय इजहार भी नहीं कर पाए लेकिन अब पिछले 20 साल से हमसफर हैं. एक साथ गुनगुनाते हुए -“मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की कसम, फिर मुझे नर्गिसी आँखों का सहारा दे दे”

लेकिन किस्मत तो देखिये कि एक साथ तो क्या, अकेले अकेले भी उसके बाद एक बार ही जा पाए उस मेले में. शायद अब कुछ बाकी नहीं रह गया वहां खरीदने को!

– प्रकाश वीर शर्मा

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