मनोज वाजपेयी हैं असली अय्यार

कहते हैं जब आप शिखर पर होते हैं तो वह आपकी असली परीक्षा होती है, शिखर पर चढ़ना तो बस एक कवायद होती है.

फिल्म निर्देशक नीरज पांडे ‘एम एस धोनी’ से अपने कॅरियर के शिखर पर पहुंचे थे लेकिन ‘अय्यारी’ बनाते हुए वे फिसल गए हैं.

एक निर्देशक के लिए उसकी फिल्म मास्टर पीस होती होगी लेकिन बॉक्स ऑफिस की अदालत में दर्शक ही जज होता है.

अय्यारी को हम एक औसत फिल्म कह सकते हैं और ये इन दिनों प्रदर्शित हो रही फिल्मों से काफी बेहतर है.

ये हमेशा से होता आया है कि कुछ फ़िल्में बेहतर होते हुए भी नहीं चलती या कम चलती है. एक विशेष जॉनर की फिल्म से दर्शक को कुछ ज्यादा की दरकार होती है.

‘एमएस धोनी’ की सफलता के बाद दर्शक नीरज पांडे से ज्यादा रोमांच, ज्यादा उत्तेजना की अपेक्षा कर रहा था लेकिन मनमाफिक रोमांच उसे नहीं मिला.

जहाँ तक मुझे समझ आया है, स्क्रीनप्ले की जटिलता और सांकेतिक रूप से दृश्यों को फिल्माने के कारण फिल्म दर्शक को पसंद नहीं आई है.

सेना की पृष्ठभूमि पर बनी ‘अय्यारी’ एक ऐसे फौजी की कहानी है जो अपने ही विभाग के लोगों के भ्रष्टाचार का शिकार हो जाता है.

देशभक्ति का इनाम ये मिलता है कि उसे अपनी टीम समेत फरार होना पड़ता है. सिस्टम अपनी गंदगी बरक़रार रखने के लिए ईमानदार अफसरों को राह से हटाना चाहता है.

हथियारों के सौदागर रिश्वत देकर अपनी डील करना चाहते हैं. एक ओर करप्ट सिस्टम है तो दूसरी ओर चार अफसर हैं जो देश के लिए लड़ रहे हैं. फिल्म में आदर्श सोसाइटी घोटाले का प्लॉट भी डाला गया है.

हालांकि नीरज पांडे जब तक अपनी कहानी स्पष्ट कर पाते हैं, फिल्म आधी हो चुकी होती है और दर्शक पर से निर्देशक की पकड़ ढीली हो जाती है.

कहानी के सारे टूटे सिरों को मिलाने में निर्देशक देर कर देते हैं. कहानी में सस्पेंस रखने की शैली का अतिरेक ही फिल्म पर भारी पड़ा है.

कहानी इतनी उलझी हुई है कि दर्शक आधे घंटे में रूचि खोने लगता है लेकिन कलाकारों की अदाकारी और कुछ बढ़िया सीक्वेंस के चलते हमें फिल्म पूरी तरह निराश भी नहीं करती.

मनोज वाजपेयी के अनुपम अभिनय के लिए, नसीरुद्दीन शाह के बेहतरीन एक्ट के लिए, आदिल हुसैन की अदाकारी के लिए फिल्म देखी जा सकती है.

ख़ास तौर से मनोज वाजपेयी का किरदार नीरज पांडे ने बड़ी मेहनत से बुना है और वैसे ही मनोज ने निभाया भी है.

मनोज वाजपेयी के अय्यारी वाले विभिन्न रूप फिल्म की असल यूएसपी है. कुल मिलाकर कलाकारों की अदायगी देखने के लिए फिल्म का टिकट कटवाया जा सकता है.

अनुभवहीन अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा का चयन मुख्य भूमिका के लिए करना निर्देशक की बड़ी गलती रही है. इसके अलावा रोमांचक क्लाइमेक्स की कमी अखरती है.

नीरज पांडे की फिल्म में इतना नीरस अंत देखना अच्छा नहीं लगता. कहानी की मांग थी कि इसमें एक्शन सीक्वेंस अधिक होने चाहिए थे, यहाँ भी निर्देशक से गलती हुई है.

दर्शक उनसे एक मनोरंजक और रोमांच से भरपूर फिल्म की अपेक्षा करते हैं लेकिन इस बार वे चूक गए हैं. वे अत्यंत प्रभावशाली निर्देशक हैं और अपनी गलतियों से सीखकर दोबारा वापसी करेंगे.

यदि आप मनोज वाजपेयी के प्रशंसक हैं तो तुरंत टिकट कटाइये. उनके लिए ये फिल्म देखिये, फिल्म के असली अय्यार वे ही हैं.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY