जो लौटकर नहीं आता या फिर से ताज़ा नहीं होता वो है समय….

नफ़रत बहुत दिनों तक नहीं रहती, लेकिन जितनी देर रहती है, फफोलों की तरह उभर आती है कविताओं से कहानियों से और रिसती रहती है ताज़े घावों की तरह…

नफ़रत समय के साथ सूख जाती है, लेकिन कुछ निशान छोड़ जाती है, छिले हुए घुटनों पर या बचपन में माथे पर लगी किसी चोट की तरह…

फिर अकसर लोग पूछा करते हैं, ये निशान कैसा? जैसे किसी ने सूखे घाव पर जमी पपड़ी को फिर खरोंच दिया हो और घाव को ताज़ा कर दिया हो…

प्रेम बहुत दिनों तक रहता है, किसी लम्बी बीमारी की तरह जैसे किसी खास बीमारी में बुखार चढ़ता उतरता रहता है… और फिर कई दिनों तक परहेज़ करना पड़ता है. परहेज़ नहीं किया तो बीमारी लौट आती है…

जो लौटकर नहीं आता या फिर से ताज़ा नहीं होता वो है समय….

हर नफ़रत और हर प्रेम के बाद हाथ में कुछ राख रह जाती है समय की, जिसे हम देह पर मलकर साधु बन जाते हैं, बड़ी-बड़ी बातों का चोगा पहनकर घूमते रहते हैं, और जैसे ही कोई कच्ची नफ़रत या कच्चा प्रेम दिखाई पड़ता है, दबोच लेते हैं, अपनी आपबीती सुनाने और सचेत करने को…

ये जानते हुए कि जब तक खुद उस आग में नहीं जलेगा कोई तब तक कुंदन नहीं बन पाएगा.

ये जानते हुए कि ये राख सिर्फ समय के जलने से नहीं बनी बल्कि उसमें वो अनुभव भी शामिल है जो हमने खरीदे थे, अपने कलेजे को बेचकर…

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