हिंदी सिनेमा के जनक : करामाती कर्मयोगी दादा साहब फाल्के

ये बात 1910 की है जब बंबई के अमरीका-इंडिया पिक्चर पैलेस में क्रिसमस के मौके पर ‘जीसस क्राइस्ट’ के जीवन पर आधारित चलते-फिरते चित्रों यानि कि मूवी ‘द लाइफ ऑफ़ क्राइस्ट’ का प्रदर्शन हो रहा था. जिसे यूँ तो देखने वाले अनेक थे लेकिन, उनके बीच में एक व्यक्ति ऐसा भी था जिसके लिये ये एकदम अविश्वसनीय ही नहीं, उसके आगे के जीवन की दिशा निर्धारित कर उसे इतिहास में सदा-सदा के लिये अमर कर देने वाला और हम सबको ‘हिंदी सिनेमा’ के रूप में अद्भुत सौगात देने वाला था.

उस समय भारत में ऐसा सोचना भी कल्पनातीत था कि जिस कहानी को वो पन्नों पर पढ़ रहे उसे हूबहू चलते-फिरते चित्रों के माध्यम से देखा भी जा सकता हैं परंतु, जब ऐसा कुछ ‘धुन्दीराज गोविंद फाल्के’ को दिखाई दिया तो फिर उन सपने देखने वाली आँखों को मानो अपने स्वप्न को साकार करने का मार्ग मिल गया था.

अपने जीवन की इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख उन्होंने विस्तृत से ‘नवयुग’ में छपे लेखों में किया हैं- “यह फिल्म मैंने पहले भी कई बार देखी थी मगर, उस दिन मुझे कुछ अलग सा अनभव हुआ.

यह एक ऐसा अनुभव था, जिसका वर्णन करना मुश्किल है. मेरी आँखों के सामने जीसस क्राइस्ट के चित्र चल रहे थे मगर, मेरी आँखे भगवान श्रीकृष्ण और भगवान श्रीराम के चित्र देख रही थी.

क्या यह संभव है? क्या हम भारत-पुत्र, कभी भारतीय चित्र परदे पर देख पाएंगे?” इस तरह ‘जीसस क्राइस्ट’ के जीवन दृश्यों में हिन्दू पौराणिक देवी-देवताओं और कथानकों की कल्पना ने उन्हें स्वदेशी फिल्मों का निर्माण करने के लिए बैचन कर दिया और जैसा कि कहते हैं सपने वो नहीं जो हम नींद में देखते बल्कि वो जो हमें सोने नहीं देते हैं तो बस, इस एक ख्वाब ने उनकी दिन-रात की नींद को ऐसा उड़ाया कि जब तक उन्होंने इसे सच न कर लिया उन्होंने देश-विदेश और जमीन-आसमान को एक कर डाला था.

3 मई 1913 को मतलब आज से 105 वर्ष पूर्व भारत की पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ रिलीज हुई थी जिसे रजत पर्दे तक लाना उनके लिये काँटों भरी राह पर चलने के समान ही था लेकिन, वे तो धुन के पक्के और मेहनती व्यक्ति थे तो उन्होंने किसी भी मुश्किल या बाधा को अपने मंजिल का अवरोध न बनने दिया.

फिल्म निर्माण के लिये जेवर गिरवी रखने की बात हो या कैमरा लेने लंदन जाने की या फिर फिल्म के लिये कलाकार चुनना हो या फिर उनको अभिनय सिखाना हो सब कुछ उन्हें खुद करना पड़ा फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.

यहाँ तक कि फिल्म में ‘तारामती’ के पात्र के लिये किसी महिला की आवश्यकता थी परंतु, उस दौर में किसी स्त्री का सिनेमा में काम करने की बात सोचना भी असंभव था तो कोई तैयार नहीं हुआ बल्कि, उन्होंने तवायफों से भी संपर्क किया लेकिन, उन्होंने भी इंकार कर दिया तब इस भूमिका के लिये उन्हें एक पुरुष ‘अन्ना सालुंके’ को लेना पड़ा जिसे भारतीय सिनेमा की प्रथम नायिका का दर्जा दिया जाता हैं.

वो भी अपनी मूंछों को कटाने आसानी से राजी नहीं हुआ तो बड़ी मुश्किल से उसे मनाया तब कहीं जाकर उनका ये सपना सच होकर हम सबके सामने आ पाया. जिसने ‘हिंदी सिनेमा’ की नींव रखी और फिल्म इंडस्ट्री के रूप में एक विशाल उद्योग खड़ा कर अनगिनत लोगों को रोज़गार मुहैया कराया इस तरह उन्होंने अनेक कीर्तिमान रचे.

पहली फिल्म बनाने, पहली फिल्म कंपनी स्थापित करने और स्वरोजगार का एक नवीनतम विकल्प देने में साथ ही देश सेवा करने का भी क्योंकि स्वदेशी के प्रति उनका लगाव भी जबर्दस्त था.

इसी देशप्रेम ने तो प्रेरणा बनकर उनको ये कारनामा करने आवश्यक ऊर्जा प्रदान की जिसकी वजह से उन्होंने अपने 20 साल के फ़िल्मी करियर में 97 फिल्में और 26 लघु फिल्में बनाकर साइन जगत को गौरवान्वित और हमको मनोरंजन का साधन दिया.

उनके जीवन की कहानी को पढ़े तो पता चलता कि वे एक कर्मयोगी थे जो अनवरत क्रियाशील रहकर कुछ न कुछ करते रहे ‘जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट’ में कला की शिक्षा ग्रहण की तो कुछ समय तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग में काम करने के बाद उन्होंने अपना प्रिटिंग प्रेस खोला और एक ‘मासिक पत्रिका’ का प्रकाशन भी किया.

फिर जब फिल्म बनाने का जुनून सर पर सवार हुआ तो उस तकनीक को सीखने विदेश तक गये और वहां से आकर अपनी फिल्म कंपनी खोली जिसके अंतर्गत फ़िल्म निर्माण, निर्देशन, पटकथा लेखन आदि विविध कार्यों की मदद से भारतीय सिनेमा को अपना योगदान दिया था.

आश्चर्य होता है जिस व्यक्ति ने हिंदी सिनेमा उद्योग को स्थापित करने में अपने जीवन की आहुति दी उन्हीं को उस स्वार्थी सिनेमा ने भूला दिया और जब वे फिल्म बनाने में असमर्थ हो गये तो उन्हें अपने जीवन का गुजारा करना भी मुश्किल हो गया तब आज ही के दिन गुमनामी के साये में ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया.

कहते हैं कि उनके अंतिम संस्कार में दर्जन भर भी लोग इकठ्ठे नहीं हुए और ना ही सिनेजगत ने कोई श्रद्धांजलि दी इससे बड़ी कृतघ्नता और क्या होगी भला? उनके प्रति हुई लापरवाही का अंदाजा हुआ शायद, तो 1969 में उनकी सौंवी जयंती पर उनके नाम से भारत सरकार ने ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ देने की घोषणा की जिसे फिल्म जगत का सर्वोच्च सम्मान माना जाता हैं और एक व्यक्ति के लिये इससे बड़ी उपलब्धि क्या होगी भला कि वो खुद एक पुरस्कार बन जाये जिसे पाने की हसरत हर एक को ललचाये और ये दिन उनकी याद दिलाये.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY