आयुर्वेद उपचार से महज़ 72 घंटों में अपने पैरों पर खड़े हो गए जयसूर्या

कहा जाता है कि सर्वप्रथम ब्रह्मा से दक्ष प्रजापति ने, दक्ष प्रजापति से अश्विनी कुमारों ने, उनसे इन्द्र ने और इन्द्र से महर्षि भारद्वाज ने आयुर्वेद का अध्ययन किया. उसके बाद से ही आयुर्वेद का परचम देश और दुनिया में लहरा रहा है.

आयुर्वेद की इसी ताकत को दुनिया ने फिर देखा है. जिस बीमारी का इलाज ऑस्ट्रेलिया का विश्वप्रसिद्ध अस्पताल भी वर्षों से नही ढूंढ पाया उसे हमारे देश के आयुर्वेद के ज्ञाता ने महज 72 घंटे में कर दिया.

आपको ध्यान होगा कुछ दिन पूर्व मैंने श्रीलंका के धाकड़ बल्लेबाज जयसूर्या की बीमारी पर लिखा था.

[वो क्रिकेटर नहीं तूफ़ान था, आता था, तबाही मचाता था, चला जाता था]

मैंने लिखा था कि श्रीलंका के पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी सनत जयसूर्या अपने कमर एवं पैर में आई कुछ गंभीर बीमारियों के चलते बिस्तर पर है और बैसाखी का सहारा लेकर चल रहे हैं.

इसके बाद जयसूर्या इस बीमारी के निदान हेतु आस्ट्रेलिया (मेलबोर्न) गए और आपरेशन भी कराया. वहाँ से आकर वे श्रीलंका के कोलंबो स्थित प्रसिद्ध नवलोक अस्पताल में भर्ती भी रहे. किन्तु उन्हें कहीं से भी राहत नहीं मिली.

जयसूर्या की इस हालत को देख उनके दोस्त भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन ने आयुर्वेद जड़ी बूटियों से इलाज करने वाले डॉ. प्रकाश टाटा से एक बार मिल लेंने की सलाह दी.

आपकीं जानकारी के लिए छिंदवाड़ा के जुन्नारदेव निवासी डॉ. प्रकाश इंडियन टाटा आयुर्वेद के बड़े जानकार माने जाते हैं.

बॉलीवुड सहित देश की नामचीन हस्तियों का इलाज आयुर्वेद के जरिए वे पूर्व में भी करते रहे हैं. कई हस्तियां उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु भी मानती हैं.

अज़हरुद्दीन की सलाह मान जयसूर्या मुम्बई आए और डॉ. टाटा के निवास स्थान पर गए. अपनी बीमारी के बारे में उन्हें बताया.

पूरी बात सुनने के बाद डॉ. टाटा ने उनका परीक्षण किया और उन्हें ठीक होने का आश्वासन दिया. जयसूर्या श्रीलंका वापस चले गए. और डॉ प्रकाश टाटा पहुंच गए पातालकोट के जंगलों में.

आपको बता दूं कि पातालकोट घाटी विभिन्न जड़ी-बूटियों से भरी हुई है. यहां औषधीय गुण वाली कई ज्ञात और अज्ञात दुर्लभ जड़ी बूटियों का भंडार है.

89 वर्गमीटर में फैला पातालकोट 1700 फुट की गहराई में है. यहां की जटिलताओं का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां सूर्य की किरण ही दोपहर में पहुंचती है. तकरीबन 500 वर्षों से भारिया जनजाति के लोग यहां निवास करते है.

तो डॉ टाटा, अपने सहयोगी वैद्यराज माखन विश्वकर्मा के साथ पातालकोट के घने जंगलों में गए और एक सप्ताह वहॉ रुककर जड़ी-बूटी तलाश की. फिर वहां से जड़ी-बूटी निज निवास लाकर छिंदवाड़ा में ही दवाईयां बनाई.

आयुर्वेद जड़ी-बूटियों की आवश्यक दवाओं को एकत्रित कर डॉ. टाटा श्रीलंका पहुंच गए. उन्होंने जयसूर्या का इलाज आयुर्वेद पद्धति से प्रारंभ किया.

हैरान करने वाली बात ये थी कि मात्र 72 घंटे के भीतर ही जयसूर्या अपने पैरों पर फिर से खड़े हो गए. जो काम ऑपरेशन नहीं कर पाया उस काम को आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. प्रकाश टाटा ने संभव कर दिखाया. जिस बीमारी को विश्व के प्रसिद्ध एलोपैथी चिकित्सक ठीक नही कर पाए उसे आयुर्वेद के नुस्खों ने चंद घंटों में कर दिखाया.

यह हम सभी के लिए सबक है. हम अपनी संस्कृति को, अपने इतिहास को भूलते जा रहे है. पश्चिम की तरफ दौड़ रहे है. लेकिन ध्यान रहे वहाँ कुछ नहीं मिलना. आत्मशांति भी यहीं है. निदान भी यहीं है.

आयुर्वेद की जय जय.

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